क्या इलेक्ट्रिक कारों में ज्यादा होती है मोशन सिकनेस? यात्रियों की शिकायतों पर क्या कहती है रिसर्च

इलेक्ट्रिक वाहनों (EV) की लोकप्रियता दुनिया भर में तेजी से बढ़ रही है। इन्हें शांत, पर्यावरण के अनुकूल और कम संचालन लागत वाला विकल्प माना जाता है। लेकिन कुछ यात्रियों का दावा है कि इलेक्ट्रिक कारों में सफर करते समय उन्हें पारंपरिक पेट्रोल या डीजल कारों की तुलना में अधिक मोशन सिकनेस, मितली और चक्कर जैसा महसूस होता है।
नॉर्थ लंदन की 24 वर्षीय लोला बेयर्ड का कहना है कि उन्हें पहले कभी कार में सफर के दौरान कोई परेशानी नहीं हुई थी। हालांकि, उनके बॉयफ्रेंड द्वारा इलेक्ट्रिक वाहन खरीदने के बाद लंबी यात्राओं के दौरान उन्हें बार-बार मितली महसूस होने लगी। कई बार स्थिति इतनी खराब हो गई कि सफर बीच में रोकना पड़ा।
लोला अकेली नहीं हैं। कुछ अन्य यात्रियों और अभिभावकों ने भी बताया कि इलेक्ट्रिक कारों में सफर के दौरान उन्हें या उनके बच्चों को मोशन सिकनेस की समस्या ज्यादा महसूस होती है। वहीं, कई ईवी मालिकों का कहना है कि उन्हें ऐसी कोई परेशानी नहीं होती और उनका अनुभव पूरी तरह सामान्य है।
क्या सचमुच ईवी में ज्यादा होती है मोशन सिकनेस?
विशेषज्ञों का कहना है कि इस विषय पर शोध अभी शुरुआती चरण में है। कुछ प्रारंभिक अध्ययनों और विशेषज्ञों के अनुभवों से संकेत मिलता है कि कुछ लोगों को इलेक्ट्रिक वाहनों में मोशन सिकनेस अधिक महसूस हो सकती है, लेकिन अभी तक ऐसा कोई निर्णायक वैज्ञानिक प्रमाण उपलब्ध नहीं है जो सभी मामलों में इस संबंध को साबित कर सके।
मोशन सिकनेस पर काम कर चुके शोधकर्ताओं के अनुसार, फिलहाल उपलब्ध जानकारी का बड़ा हिस्सा यात्रियों के व्यक्तिगत अनुभवों पर आधारित है। इस विषय पर व्यापक और दीर्घकालिक वैज्ञानिक अध्ययन अभी सीमित हैं।
मोशन सिकनेस होती क्यों है?
विशेषज्ञों के अनुसार, मोशन सिकनेस तब होती है जब शरीर की विभिन्न इंद्रियों से मिलने वाले संकेत एक-दूसरे से मेल नहीं खाते।
हमारा मस्तिष्क मुख्य रूप से तीन स्रोतों से जानकारी प्राप्त करता है:
- आंखों से मिलने वाले दृश्य संकेत
- अंदरूनी कान का संतुलन तंत्र
- शरीर की गतिविधियों को महसूस करने वाले संवेदन तंत्र
जब इनमें से किसी एक प्रणाली से मिलने वाला संकेत बाकी संकेतों से अलग होता है, तो मस्तिष्क भ्रमित हो सकता है और मितली, चक्कर या उल्टी जैसी समस्याएं पैदा हो सकती हैं।
उदाहरण के लिए, यदि कोई व्यक्ति कार में बैठकर फोन देख रहा हो और बाहर का दृश्य न देख पा रहा हो, तो आंखों और शरीर से मिलने वाले संकेतों में अंतर पैदा हो सकता है, जिससे मोशन सिकनेस होने की संभावना बढ़ जाती है।
इलेक्ट्रिक कारों में यह समस्या क्यों बढ़ सकती है?
विशेषज्ञों ने कुछ संभावित कारणों की पहचान की है जो इलेक्ट्रिक वाहनों में मोशन सिकनेस को बढ़ा सकते हैं।
1. इंजन की आवाज और कंपन का अभाव
पारंपरिक पेट्रोल और डीजल वाहनों में इंजन की आवाज और कंपन लगातार महसूस होते हैं। हमारा मस्तिष्क वर्षों से इन संकेतों को वाहन की गति और गतिविधि से जोड़ता आया है।
इलेक्ट्रिक वाहनों में इंजन बेहद शांत होता है और कंपन भी काफी कम महसूस होते हैं। ऐसे में कुछ यात्रियों को वाहन की गति का अनुमान लगाने में कठिनाई हो सकती है, जिससे इंद्रियों के बीच तालमेल प्रभावित हो सकता है।
2. रीजेनरेटिव ब्रेकिंग
इलेक्ट्रिक वाहनों की एक प्रमुख तकनीक रीजेनरेटिव ब्रेकिंग है। इसमें ड्राइवर के एक्सेलरेटर से पैर हटाते ही वाहन की गति कम होने लगती है और ऊर्जा दोबारा बैटरी में संग्रहित होती है।
कुछ यात्रियों को यह धीमापन अपेक्षा से अधिक तेज महसूस हो सकता है। बार-बार होने वाला हल्का एक्सेलरेशन और डीसेलेरेशन शरीर में असहजता पैदा कर सकता है, जिससे मितली की शिकायत बढ़ सकती है।
3. तेज एक्सेलरेशन
अधिकांश इलेक्ट्रिक वाहन कम समय में तेज गति पकड़ने की क्षमता रखते हैं। यदि वाहन बार-बार तेजी से गति बढ़ाए और घटाए, तो संवेदनशील यात्रियों में मोशन सिकनेस की संभावना बढ़ सकती है।
हालांकि, विशेषज्ञों का यह भी कहना है कि आधुनिक ईवी में सॉफ्टवेयर और ड्राइविंग सिस्टम लगातार बेहतर हो रहे हैं, जिससे वाहन की गति को अधिक स्मूद तरीके से नियंत्रित किया जा सकता है।
ड्राइविंग स्टाइल भी हो सकता है कारण
कुछ उद्योग विशेषज्ञों का मानना है कि समस्या केवल वाहन की तकनीक नहीं, बल्कि ड्राइविंग शैली से भी जुड़ी हो सकती है। अचानक एक्सेलरेशन, बार-बार ब्रेक लगाना या आक्रामक ड्राइविंग किसी भी वाहन में यात्रियों को असहज कर सकती है।
कई इलेक्ट्रिक वाहनों में रीजेनरेटिव ब्रेकिंग की तीव्रता को कम या अधिक करने का विकल्प भी उपलब्ध होता है, जिससे सफर को अधिक आरामदायक बनाया जा सकता है।
किन लोगों को ज्यादा खतरा होता है?
विशेषज्ञों के अनुसार, कुछ लोगों में स्वाभाविक रूप से मोशन सिकनेस की संभावना अधिक होती है।
- बच्चे
- महिलाएं
- मोशन सिकनेस का पारिवारिक इतिहास रखने वाले लोग
- चक्कर या वर्टिगो जैसी समस्याओं से प्रभावित व्यक्ति
शोधकर्ताओं का कहना है कि बच्चों में मोशन सिकनेस आमतौर पर 8 से 10 वर्ष की आयु के आसपास अधिक दिखाई देती है और उम्र बढ़ने के साथ कई लोगों में यह समस्या कम हो जाती है।
मोशन सिकनेस कम करने के उपाय
विशेषज्ञ यात्रियों को कुछ सरल उपाय अपनाने की सलाह देते हैं:
- सामने की ओर देखें और दूर के स्थिर बिंदु पर ध्यान केंद्रित करें
- यात्रा के दौरान फोन या किताब देखने से बचें
- संभव हो तो आगे वाली सीट पर बैठें
- पीछे बैठने की स्थिति में बीच वाली सीट चुनें ताकि सामने का दृश्य दिखाई दे
- सिर को हेडरेस्ट से टिकाकर स्थिर रखें
- सीट को थोड़ा पीछे झुका लें
- खिड़की खोलकर ताजी हवा लें
- यात्रा से पहले पर्याप्त नींद लें और शरीर को हाइड्रेट रखें
- बहुत अधिक तला-भुना या भारी भोजन करने से बचें
- जरूरत पड़ने पर चिकित्सकीय सलाह से मोशन सिकनेस की दवा लें
भविष्य में समाधान संभव
ऑटोमोबाइल और मोबिलिटी विशेषज्ञों का मानना है कि यदि आगे की रिसर्च इलेक्ट्रिक वाहनों और मोशन सिकनेस के बीच स्पष्ट संबंध स्थापित करती है, तो वाहन निर्माता इस समस्या को कम करने के लिए नए समाधान विकसित कर सकते हैं।
इन समाधानों में अधिक स्मूद एक्सेलरेशन, उन्नत रीजेनरेटिव ब्रेकिंग सिस्टम, बेहतर सस्पेंशन ट्यूनिंग, कृत्रिम ध्वनि संकेत और यात्रियों को वाहन की गति का बेहतर एहसास कराने वाले फीचर्स शामिल हो सकते हैं।
फिलहाल उपलब्ध वैज्ञानिक जानकारी यह संकेत देती है कि कुछ यात्रियों को इलेक्ट्रिक वाहनों में मोशन सिकनेस अधिक महसूस हो सकती है, लेकिन इस विषय पर अभी और व्यापक शोध की आवश्यकता है। विशेषज्ञों के अनुसार, वाहन की तकनीक, ड्राइविंग शैली और व्यक्ति की व्यक्तिगत संवेदनशीलता, तीनों मिलकर इस अनुभव को प्रभावित कर सकते हैं।



