छत्तीसगढ़

सुप्रीम कोर्ट की फटकार और फॉर्म 6 विवाद: क्या है पूरा मामला और कैसे होता है वोटर रजिस्ट्रेशन?

नई दिल्ली: फॉर्म 6 भारत में मतदाता सूची में किसी व्यक्ति का नाम शामिल कराने के लिए इस्तेमाल किया जाने वाला वैधानिक आवेदन है। ख़ासकर पहली बार मतदान करने वाले युवाओं के लिए यह बेहद महत्वपूर्ण है। लेकिन हाल ही में ऑनलाइन रजिस्ट्रेशन प्रक्रिया में जोड़े गए एक अतिरिक्त घोषणा-पत्र को लेकर बड़ा विवाद खड़ा हो गया है। इसमें आवेदक या उसके माता-पिता और दादा-दादी का पिछली मतदाता सूची में नाम होने के बारे में जानकारी मांगी गई थी। इस बदलाव को वास्तव में किसने मंज़ूरी दी और क्या इसके पीछे कोई राजनीतिक मंशा थी, यह मामला अब सीधे सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) के विचाराधीन है।

फॉर्म 6 का असल इस्तेमाल और नियम

फॉर्म 6 में योग्य मतदाता के रजिस्ट्रेशन के लिए ज़रूरी जानकारी ली जाती है, जैसे— नाम, जन्मतिथि, पता और अन्य संबंधित विवरण। यह फॉर्म ‘रजिस्ट्रेशन ऑफ इलेक्टर्स रूल्स, 1960’ के तहत निर्धारित है। इसलिए इसे महज़ एक साधारण ऑनलाइन फॉर्म नहीं माना जा सकता जिसे चुनाव आयोग (Election Commission of India) अपनी सुविधा के अनुसार स्वतंत्र रूप से बदल सके।

चुनाव आयोग के नियमों के अनुसार, कोई भी भारतीय नागरिक जो चार कटऑफ तारीखों— 1 जनवरी, 1 अप्रैल, 1 जुलाई या 1 अक्टूबर में से किसी एक को 18 वर्ष की आयु पूरी कर चुका है या करने वाला है, वह फॉर्म 6 के ज़रिए आवेदन कर सकता है। बशर्ते वह संबंधित निर्वाचन क्षेत्र का निवासी हो और किसी अन्य आधार पर अयोग्य न हो।

समझें कटऑफ का गणित: अगर आप 15 फ़रवरी 2026 को 18 साल के होते हैं, तो 1 जनवरी को आपकी उम्र 17 साल थी, लेकिन 1 अप्रैल तक आप 18 साल के हो चुके होंगे। इसलिए 1 अप्रैल 2026 आपकी पहली क्वॉलिफाइंग डेट होगी। आपको अपना रजिस्ट्रेशन कराने के लिए जनवरी 2027 तक का इंतज़ार नहीं करना होगा।

ऑनलाइन रजिस्ट्रेशन प्रक्रिया में क्या बदलाव किया गया?

हालिया मीडिया रिपोर्ट्स और पड़ताल के अनुसार, ईसीआईनेट (ECInet) रजिस्ट्रेशन पोर्टल पर ‘एसआईआर’ (Special Intensive Revision – SIR) से जुड़ा एक अतिरिक्त सेक्शन जोड़ा गया था। इसमें आवेदकों को नीचे दिए गए तीन विकल्पों में से कोई एक चुनना था:

  • क्या आवेदक का नाम पिछली एसआईआर के दौरान तैयार मतदाता सूची में था?
  • क्या माता-पिता या दादा-दादी का नाम उस पिछली मतदाता सूची में था?
  • क्या आवेदक के माता-पिता या दादा-दादी का नाम उस पिछली सूची में नहीं था?

हालांकि इस सेक्शन को स्पष्ट रूप से ‘अनिवार्य’ नहीं लिखा गया था, लेकिन इसका जवाब दिए बिना आवेदक अपना ऑनलाइन आवेदन जमा ही नहीं कर सकता था। जवाब के आधार पर आवेदक या उसके रिश्तेदारों से पुरानी मतदाता सूची से जुड़े विवरण (जैसे रिश्तेदार का नाम, ईपीआईसी नंबर, राज्य, ज़िला, विधानसभा क्षेत्र आदि) मांगे जा सकते थे। इस अतिरिक्त सवाल के कारण कई ऐसे परिवारों के लिए अनिश्चितता पैदा हो गई जिनका नाम पुरानी मतदाता सूचियों में दर्ज नहीं था।

बदलाव किसने किया और राजनीतिक विवाद क्यों बढ़ा?

विवाद के केंद्र में दो अहम सवाल हैं: ऑनलाइन पोर्टल पर ये अतिरिक्त शर्तें किसने जोड़ीं और फॉर्म 6 जैसे वैधानिक दस्तावेज़ में बदलाव का असल अधिकार किसके पास है?

कानूनन, जनप्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950 की धारा 28 के तहत केवल केंद्र सरकार ही चुनाव आयोग से परामर्श के बाद नियमों में बदलाव कर सकती है। इसके लिए बाकायदा आधिकारिक अधिसूचना और संसदीय प्रक्रिया ज़रूरी होती है। लेकिन मौजूदा विवादित ऑनलाइन बदलाव के लिए ऐसा कोई क़ानूनी संशोधन नहीं किया गया।

आरोप है कि मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) ज्ञानेश कुमार ने अन्य दो चुनाव आयुक्तों (विवेक जोशी और सुखबीर सिंह संधू) की आपत्तियों को दरकिनार करते हुए यह बदलाव लागू किया। लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने इसे लेकर मुख्य चुनाव आयुक्त पर निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि ज्ञानेश कुमार ने फॉर्म 6 में ग़ैर-क़ानूनी और एकतरफ़ा तरीक़े से बदलाव कर अपने पद का दुरुपयोग किया है।

सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयोग के दावों की हवा निकाली

विवाद बढ़ने पर चुनाव आयोग ने 26 सितंबर 2026 को एक प्रेस नोट जारी कर दावा किया कि एसआईआर के लिए फॉर्म 6 के साथ मांगे गए इस अतिरिक्त घोषणा-पत्र को सुप्रीम कोर्ट ने अपने पूर्व के आदेश में बरकरार रखा है।

हालांकि, 5 अक्टूबर 2026 को सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत ने चुनाव आयोग के इस दावे को सिरे से खारिज कर दिया। चीफ़ जस्टिस ने स्पष्ट शब्दों में कहा, “हमने किसी संशोधित फॉर्म 6 को मंज़ूरी नहीं दी है। यह बिल्कुल स्पष्ट है। जब अदालत में रिकॉर्ड पेश किए जाएंगे, तो हम देखना चाहेंगे कि इसे किसने संशोधित किया।”

सुप्रीम कोर्ट अब इस मामले से जुड़े रिकॉर्ड और मंज़ूरी की पूरी प्रक्रिया की गहन जांच कर रहा है।

फॉर्म 7 और फॉर्म 8 क्या हैं और इनका इस्तेमाल कब होता है?

मतदाता सूची की प्रक्रियाओं को सुचारू बनाने के लिए फॉर्म 6 के अलावा फॉर्म 7 और फॉर्म 8 भी बेहद अहम हैं:

फॉर्म 7 (नाम हटाने या आपत्ति दर्ज कराने के लिए)

इस फॉर्म का उपयोग निम्नलिखित तीन मुख्य परिस्थितियों में होता है:

  • मतदाता सूची में पहले से दर्ज किसी व्यक्ति का नाम हटाने का अनुरोध करना (मृत्यु हो जाने, नागरिकता न रहने या व्यक्ति के स्थायी रूप से शिफ्ट हो जाने की स्थिति में)।
  • किसी अन्य व्यक्ति का नाम मतदाता सूची में शामिल किए जाने पर आपत्ति जताना।
  • स्वयं का नाम मतदाता सूची से हटाने का अनुरोध करना (जैसे- एक से अधिक जगह नाम होने पर)।

फॉर्म 8 (रजिस्ट्रेशन में बदलाव और अपडेट के लिए)

यह फॉर्म मौजूदा रजिस्टर्ड मतदाताओं की जानकारी अपडेट करने के लिए है। इसके चार मुख्य मक़सद हैं:

  • निवास स्थान बदलना (Shift of Residence): यदि आप पटना से नोएडा शिफ्ट हो गए हैं, तो नया फॉर्म 6 भरने के बजाय फॉर्म 8 भरकर अपना रजिस्ट्रेशन नए पते पर ट्रांसफर करवाएं।
  • विवरण में सुधार (Correction of Entries): मतदाता सूची या वोटर आईडी में नाम, उम्र या पते की ग़लती ठीक कराना (एक बार में अधिकतम चार सुधार संभव)।
  • वोटर आईडी कार्ड बदलना (Replacement of EPIC): यदि कार्ड खो गया है या ख़राब हो गया है, तो बिना जानकारी बदले नया कार्ड प्राप्त करना।
  • विकलांगता की जानकारी दर्ज करना: चुनावी रिकॉर्ड में अपनी विकलांगता की स्थिति अपडेट कराना।

एक नज़र में: मतदाता से जुड़े ज़रूरी फॉर्म

  • फॉर्म 6: पहली बार वोटर के रूप में रजिस्ट्रेशन कराने के लिए।
  • फॉर्म 7: वोटर लिस्ट से नाम हटाने या किसी नाम पर आपत्ति दर्ज कराने के लिए।
  • फॉर्म 8: पता बदलने, जानकारी सुधारने, नया कार्ड बनवाने या विकलांगता दर्ज कराने के लिए।

नवीन कुमार

झारखंड के परिवेश से जुड़े रहे हैं। पहाड़, जंगल और छोटे कस्बों की जिंदगी उन्होंने करीब से देखी है। परिवार में सादगी और मेहनत का मूल्य सिखाया गया। वे लोगों से मिलना, उनकी बात सुनना और स्थानीय मेलों-त्योहारों में शामिल होना पसंद करते हैं। उनकी पहचान सीधेपन और जमीन से जुड़े रहन-सहन से है।

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