आशीर्वाद का दिया: 25 साल की सेवा का एक दीपक, जो घर-घर नहीं जला
बुजुर्गों की कहावत याद आती है—दो टके की हांडी गई, कुत्ते की जात पहचानी गई। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के 76वें जन्मदिन और सार्वजनिक जीवन के 25 वर्ष पूरे होने पर भाजपा और कई राज्य सरकारों ने 17 सितंबर 2026 को ‘आशीर्वाद का दिया’ अभियान चलाया। मुख्यमंत्रियों, केंद्रीय मंत्रियों, पार्टी पदाधिकारियों, फिल्मी हस्तियों और अधिकारियों ने खुद दीये जलाए और दूसरों से जलवाए। दिल्ली के कर्तव्य पथ पर 1.25 लाख दीये, उज्जैन में 25 लाख से अधिक, बिहार में 20 लाख और गुजरात में करोड़ों दीयों की योजना बताई गई। प्रधानमंत्री ने इसे स्नेह की अभिव्यक्ति बताते हुए धन्यवाद दिया।
अभियान का खर्च घर के एक दीये जितना नहीं था—दीया-बाती और तेल मिलाकर दस रुपये के आसपास। कोविड काल में थाली-बर्तन बजाने और दीया जलाने का अभ्यास भी हो चुका था। फिर भी शहरों, गांवों, बाजारों, मोहल्लों और सोसाइटियों में आम घरों के दीये उतनी संख्या में दिखाई नहीं दिए जितने सरकारी और संगठित आयोजनों में दिखे।
इस बीच बिहार में बाढ़ से करीब 48 से 50 लाख लोग प्रभावित रहे। मध्य प्रदेश के बालाघाट में बैगा आदिवासी समुदाय के दो दर्जन से अधिक बच्चों की मौतें कुपोषण, खसरा और मलेरिया से जुड़ी बताई गईं। दिल्ली के सत्य निकेतन में 6 सितंबर को पीजी बिल्डिंग ढहने से दिल्ली विश्वविद्यालय के छात्रों समेत सात लोगों की मौत हुई। कुछ लोग पूछ रहे थे कि शोक के बीच जन्मदिन का जश्न कैसे मनाया जाए। जवाब यह दिया गया कि शोक का पूरा साल है, जश्न का एक दिन देश के लिए मांगा गया है। विश्व खुशहाली रिपोर्ट 2026 में भारत 116वें स्थान पर रहा, पाकिस्तान 104वें पर।
जन्म और अवतार को लेकर 2024 के चुनाव के दौरान प्रधानमंत्री के बयान फिर चर्चा में आए। उन्होंने कहा था कि मां के निधन के बाद उन्हें विश्वास हो गया कि वे जैविक जन्म की सामान्य धारणा से अलग, ईश्वर द्वारा भेजे गए हैं। हिंदू परंपरा में देवताओं के जन्मदिन भी मनाए जाते हैं। आलोचक इसे निजी जन्मदिन का सरकारी आयोजन बता रहे हैं। समर्थक कहते हैं कि राजा का जन्मदिन निजी होकर भी सार्वजनिक होता है।
80 करोड़ लोगों को पांच किलो मुफ्त राशन की योजना कोविड के वर्षों बाद भी जारी है। फिर भी एक दीये के मामले में आम भागीदारी उतनी व्यापक नहीं दिखी जितनी आयोजकों को अपेक्षित थी। व्यंग्यकार राजेंद्र शर्मा लिखते हैं कि 17 सितंबर के इस परीक्षण के बाद विश्वास टूटा है और अगली बार ऐसा न हो, इसके लिए नई व्यवस्था की जरूरत महसूस की जा रही है।
लेखक: राजेंद्र शर्मा
(व्यंग्यकार, वरिष्ठ पत्रकार और लोकलहर के संपादक)



