संभल हिंसा: सुप्रीम कोर्ट ने मुल्ला अफरोज पर लगा NSA किया रद्द, यूपी सरकार पर 10 लाख का जुर्माना

नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को संभल हिंसा मामले में एक बड़ा और अहम फैसला सुनाया है। शीर्ष अदालत ने मामले के मुख्य आरोपी बताए गए मुल्ला अफरोज की राष्ट्रीय सुरक्षा कानून (NSA) के तहत एहतियातन हिरासत (प्रिवेंटिव डिटेंशन) को रद्द कर दिया है। इसके साथ ही, कोर्ट ने शक्तियों के दुरुपयोग और गैर-कानूनी तरीके से हिरासत का आदेश जारी करने को लेकर उत्तर प्रदेश सरकार पर 10 लाख रुपये का जुर्माना भी लगाया है。
हिरासत को लेकर सुप्रीम कोर्ट की सख्त टिप्पणी
जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस शील नागू की पीठ ने इस मामले की सुनवाई करते हुए स्पष्ट किया कि केवल पुलिस के सामने या कोर्ट से बाहर किए गए कथित कबूलनामे के आधार पर किसी व्यक्ति को राष्ट्रीय सुरक्षा कानून (NSA) के तहत हिरासत में नहीं रखा जा सकता। कोर्ट ने कहा कि हिरासत में लेने वाले अधिकारियों को अन्य प्रासंगिक परिस्थितियों और सबूतों पर विचार करना चाहिए था। कोर्ट ने पाया कि अधिकारियों ने संबंधित कड़ियों को जोड़ने की बजाय अपनी शक्तियों का गलत इस्तेमाल किया है, जिसे अदालत ने कठोर शक्तियों का अवैध इस्तेमाल करार दिया।
क्या है संभल हिंसा का पूरा मामला?
नवंबर 2024 में, उत्तर प्रदेश के संभल स्थित शाही जामा मस्जिद के कोर्ट के आदेश पर हुए सर्वे के दौरान भारी हिंसा भड़क गई थी, जिसमें चार लोगों की मौत हो गई थी। इस हिंसा के करीब 54 दिन बाद पुलिस ने मुल्ला अफरोज को गिरफ्तार किया था और उसे मामले का मास्टरमाइंड बताया गया था।
गिरफ्तारी के बाद पुलिस कस्टडी में दिए गए कबूलनामे के आधार पर कार्रवाई हुई, लेकिन बाद में इलाहाबाद हाई कोर्ट ने अफरोज को जमानत दे दी थी। हालांकि, जमानत मिलने के बाद 13 अक्टूबर 2025 को प्रशासन ने उसके खिलाफ एनएसए (NSA) के तहत नजरबंदी का आदेश पारित कर दिया। जब इलाहाबाद हाई कोर्ट ने इस डिटेंशन ऑर्डर को सही ठहराया, तो अफरोज ने फैसले को चुनौती देते हुए सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया。
सुप्रीम कोर्ट में याचिकाकर्ता की दलील
सुप्रीम कोर्ट में याचिकाकर्ता मुल्ला अफरोज की तरफ से दलील दी गई कि हिंसा के दौरान पुलिस ने खुद गोलियां चलाई थीं और इस महत्वपूर्ण पहलू की कोई निष्पक्ष जांच नहीं की गई। इसके अलावा, सुप्रीम कोर्ट के पूर्व फैसलों का हवाला देते हुए यह तर्क दिया गया कि बिना किसी ठोस सबूत के केवल इस आशंका के आधार पर कि व्यक्ति दोबारा अपराध कर सकता है, उसे प्रिवेंटिव डिटेंशन (एहतियातन हिरासत) में रखना कानूनन गलत है। कोर्ट ने इन दलीलों पर गौर करते हुए हाई कोर्ट का फैसला पलट दिया और अफरोज की हिरासत रद्द कर दी。



