बिलासपुर में अफसरों की पदस्थापना का कैसा है गणित? साल-दो साल में वापसी, तो कहीं दो से पांच साल तक जमे रहने का सिलसिला!
तरुण कौशिक, संपादक सर्वव्यापी
न्यायधानी बिलासपुर जिले में राज्य प्रशासनिक सेवा के अधिकारियों की पदस्थापना और स्थानांतरण की व्यवस्था को लेकर एक बार फिर सवाल खड़े हो रहे हैं। जिले में कुछ अधिकारियों की पदस्थापना के बाद साल-दो साल के भीतर दोबारा वापसी होने की चर्चा है, वहीं दूसरी ओर कुछ अधिकारी ऐसे भी बताए जा रहे हैं, जो लगातार दो से पांच वर्ष तक जिले में विभिन्न महत्वपूर्ण पदों पर पदस्थ रहे हैं। ऐसे में प्रशासनिक व्यवस्था में स्थानांतरण की नीति, कार्यकाल की अवधि और अधिकारियों की पदस्थापना के आधार को लेकर चर्चा होना स्वाभाविक है। सवाल यह है कि क्या जिले में अधिकारियों की पदस्थापना के लिए कोई समान और स्पष्ट मापदंड अपनाया जा रहा है, अथवा अलग-अलग अधिकारियों के मामले में अलग-अलग परिस्थितियों के अनुसार निर्णय लिए जा रहे हैं?राज्य प्रशासनिक सेवा के अधिकारियों में नारायण प्रसाद गवेल और बजरंग वर्मा सहित अन्य नामों को लेकर यह चर्चा सामने आती रही है कि कुछ अधिकारी अपेक्षाकृत कम अंतराल में फिर से बिलासपुर जिले में पदस्थ हो जाते हैं। प्रशासनिक व्यवस्था में अधिकारियों की वापसी अपने आप में किसी अनियमितता का प्रमाण नहीं है, क्योंकि शासन की आवश्यकता, अधिकारियों का अनुभव, उपलब्ध रिक्त पद और प्रशासनिक परिस्थितियां पदस्थापना के निर्णय को प्रभावित कर सकती हैं। लेकिन जब किसी जिले में अधिकारियों की वापसी और लंबे समय तक लगातार पदस्थ रहने के अलग-अलग उदाहरण सामने आते हैं, तब इन निर्णयों के पीछे लागू मापदंडों को समझना जरूरी हो जाता है।दूसरी ओर, जिले में अतिरिक्त कलेक्टर ज्योति पटेल और शिवकुमार बनर्जी सहित तहसीलदार प्रकाश साहू, विभोर यादव, राहुल शर्मा और आकाश गुप्ता जैसे अधिकारियों के लंबे समय तक पदस्थ रहने को लेकर भी चर्चा की जा रही है। उपलब्ध जानकारी के अनुसार, इनमें कुछ अधिकारियों का कार्यकाल दो से पांच वर्ष तक बताया जा रहा है। हालांकि, प्रत्येक अधिकारी की वास्तविक पदस्थापना अवधि, पद परिवर्तन, स्थानांतरण आदेश और बीच के अंतराल की पुष्टि आधिकारिक अभिलेखों से किया जाना आवश्यक है। इसके बावजूद यह विषय प्रशासनिक पारदर्शिता और स्थानांतरण व्यवस्था की समीक्षा के लिहाज से महत्वपूर्ण है।स्थानांतरण नीति पर उठते सवालशासकीय व्यवस्था में स्थानांतरण केवल एक नियमित प्रशासनिक प्रक्रिया नहीं है, बल्कि इसका सीधा संबंध कार्यप्रणाली, जवाबदेही और आम नागरिकों को मिलने वाली सेवाओं से भी होता है। राजस्व विभाग, तहसील कार्यालय और जिला प्रशासन के विभिन्न पदों पर तैनात अधिकारियों के निर्णयों का असर आम नागरिकों के रोजमर्रा के कामकाज पर पड़ता है। जमीन से संबंधित प्रकरण, नामांतरण, सीमांकन, राजस्व विवाद, प्रमाण-पत्र और अन्य प्रशासनिक मामलों में अधिकारियों की भूमिका महत्वपूर्ण होती है। ऐसे में किसी अधिकारी का लंबे समय तक एक ही जिले में पदस्थ रहना हो या कम अंतराल में उसी जिले में दोबारा पदस्थापना होना, दोनों ही परिस्थितियों में प्रशासनिक निर्णयों की पारदर्शिता और औचित्य पर चर्चा की गुंजाइश रहती है।यह भी ध्यान देने योग्य है कि लंबे समय तक एक ही स्थान पर पदस्थ रहने का अर्थ अपने आप में किसी प्रकार की गड़बड़ी नहीं है। अनुभवी अधिकारियों की निरंतरता से प्रशासनिक कामकाज में स्थिरता भी बनी रह सकती है। वहीं, आवश्यकता के अनुरूप स्थानांतरण से नई कार्यशैली और नई जिम्मेदारियों को अवसर मिल सकता है। इसलिए वास्तविक प्रश्न केवल किसी अधिकारी के कार्यकाल की अवधि नहीं, बल्कि यह है कि पदस्थापना और स्थानांतरण के निर्णय किन नियमों, परिस्थितियों और प्रशासनिक आवश्यकताओं के आधार पर लिए जा रहे हैं।*क्या सभी अधिकारियों के लिए समान मापदंड हैं?*बिलासपुर जिले में पदस्थापना से जुड़ी चर्चा के बीच सबसे महत्वपूर्ण सवाल यही है कि क्या राज्य शासन और संबंधित विभाग अधिकारियों के कार्यकाल को लेकर समान मापदंड अपनाते हैं? यदि किसी अधिकारी को एक जिले में लंबे समय तक बनाए रखने का प्रशासनिक औचित्य है, तो क्या दूसरे अधिकारियों के मामले में भी समान परिस्थितियों के आधार पर निर्णय लिया जाता है? और यदि किसी अधिकारी की पूर्व पदस्थापना के कुछ ही समय बाद उसी जिले में दोबारा नियुक्ति की जाती है, तो क्या इसके पीछे विभागीय आवश्यकता अथवा विशेष प्रशासनिक कारण दर्ज किए जाते हैं?इन सवालों का उत्तर अनुमान या चर्चाओं से नहीं, बल्कि आधिकारिक स्थानांतरण आदेशों, पदस्थापना विवरण और संबंधित विभागों के अभिलेखों से मिलना चाहिए। राज्य प्रशासनिक सेवा के अधिकारियों की पदस्थापना का इतिहास सामने आने पर यह स्पष्ट हो सकता है कि किस अधिकारी ने किस अवधि में कौन-सा पद संभाला, कितने समय तक जिले में सेवाएं दीं और किन परिस्थितियों में दोबारा पदस्थापना हुई।*जवाबदेही के लिए जरूरी है पारदर्शिता*जिला प्रशासन की विश्वसनीयता बनाए रखने के लिए यह आवश्यक है कि अधिकारियों की पदस्थापना और स्थानांतरण से संबंधित निर्णय पारदर्शी हों। यदि किसी अधिकारी को निर्धारित या प्रचलित कार्यकाल से अधिक समय तक पदस्थ रखा जाता है, तो उसके पीछे प्रशासनिक कारण स्पष्ट होने चाहिए। इसी तरह, किसी अधिकारी की कम अंतराल में दोबारा नियुक्ति होती है, तो उसकी परिस्थितियों को भी समझा जाना चाहिए। इससे न केवल अनावश्यक अटकलों पर विराम लगेगा, बल्कि शासन की स्थानांतरण व्यवस्था के प्रति लोगों का भरोसा भी मजबूत होगा।बिलासपुर जैसे महत्वपूर्ण जिले में प्रशासनिक पदों पर अधिकारियों की तैनाती का प्रभाव व्यापक होता है। इसलिए इस विषय को किसी व्यक्ति विशेष के पक्ष या विरोध के रूप में देखने के बजाय एक संस्थागत सवाल के रूप में देखा जाना चाहिए। आखिरकार, प्रशासनिक व्यवस्था का उद्देश्य अधिकारियों की पदस्थापना को लेकर चर्चा पैदा करना नहीं, बल्कि जनता को बेहतर, निष्पक्ष और समयबद्ध सेवाएं उपलब्ध कराना है।*शासन से अपेक्षा, सामने आए पदस्थापना का पूरा ब्यौरा*अब जरूरत इस बात की है कि संबंधित विभाग बिलासपुर जिले में राज्य प्रशासनिक सेवा के अधिकारियों, अतिरिक्त कलेक्टरों और तहसीलदारों की पदस्थापना का विवरण स्पष्ट करें। इसमें अधिकारियों की जिले में पहली नियुक्ति की तारीख, स्थानांतरण की तारीख, पुनः पदस्थापना, वर्तमान पद और संबंधित आदेशों का विवरण शामिल हो। इससे यह समझने में मदद मिलेगी कि किन अधिकारियों का कार्यकाल लंबा रहा है और किन अधिकारियों की वापसी अपेक्षाकृत कम अंतराल में हुई है।नारायण प्रसाद गवेल, बजरंग वर्मा, ज्योति पटेल, शिवकुमार बनर्जी, प्रकाश साहू, विभोर यादव, राहुल शर्मा और आकाश गुप्ता सहित अन्य अधिकारियों की पदस्थापना का तथ्यात्मक विवरण सामने आने से इस विषय पर अधिक स्पष्ट तस्वीर बन सकेगी। फिलहाल, संबंधित अधिकारियों के कार्यकाल और पदस्थापना संबंधी सभी विवरणों की स्वतंत्र आधिकारिक पुष्टि जरूरी है। किसी अधिकारी के लंबे समय तक पदस्थ रहने या दोबारा नियुक्त होने मात्र से किसी अनुचित लाभ अथवा अनियमितता का निष्कर्ष निकालना उचित नहीं होगा।आखिर में सवाल वही- पदस्थापना का आधार क्या है?बिलासपुर में अधिकारियों की पदस्थापना को लेकर उठ रही चर्चा प्रशासनिक व्यवस्था के लिए एक महत्वपूर्ण सवाल छोड़ती है। यदि स्थानांतरण शासन की आवश्यकता के अनुसार होते हैं, तो उनके पीछे के मापदंडों को स्पष्ट करने में संकोच क्यों होना चाहिए? और यदि लंबे कार्यकाल तथा कम अंतराल में पुनः पदस्थापना के अलग-अलग उदाहरण मौजूद हैं, तो उनका तथ्यात्मक परीक्षण क्यों नहीं किया जाना चाहिए? प्रशासनिक पारदर्शिता का तकाजा है कि इन सवालों का जवाब आधिकारिक दस्तावेजों और स्पष्ट तथ्यों के आधार पर सामने आए, ताकि चर्चा के स्थान पर वास्तविक स्थिति जनता के सामने हो और शासन की स्थानांतरण व्यवस्था की निष्पक्षता पर भरोसा कायम रहे।
