दैनिक ‘छत्तीसगढ़’ का संपादकीय : दिल्ली में आंदोलन के पहले ही सरकार की ऐसी असाधारण और अभूतपूर्व तैयारी का राज क्या है?
चुनाव आयोग के मतदाता पुनरीक्षण अभियान में देश में जो तबाही हुई है उसके खिलाफ कॉकरोच जनता पार्टी ने आज दिल्ली में एक बड़े प्रदर्शन की घोषणा की थी, लेकिन उसके पहले से जिस तरह दिल्ली पहुंचने वाली दर्जनों ट्रेनों को रद्द कर दिया गया, 50 से अधिक मेट्रो स्टेशनों को बंद कर दिया गया, दसियों हजार सुरक्षाकर्मियों को तैनात किया गया, इंटरनेट और मोबाइल फोन को बंद किया गया, और दिल्ली से दूर-दूर तक राज्यों में ट्रेनों से उतारकर नौजवानों को गिरफ्तार किया गया, वह सब कुछ एकदम ही अभूतपूर्व और असाधारण है। कल जब ये सारी तैयारियां सामने आ रही थीं, तो कुछ बड़े सीनियर वकील सुप्रीम कोर्ट पहुंचे, और मुख्य न्यायाधीश ने सरकार की इतनी कड़ी कार्रवाई पर यह भी कहा कि मक्खी मारने के लिए हथौड़े का इस्तेमाल किया जाता दिख रहा है। कॉकरोच जनता पार्टी के नौजवानों को जिस तरह दूसरे शहरों में, या दिल्ली पहुंचते विमानों से गिरफ्तार किया गया, नजरबंद किया गया, या हिरासत में लिया गया, वह भी पहली बार होती कार्रवाई दिख रही थी।
अब कुछ लोग ऐसे रहते हैं जिन्हें अपराध कथाओं पर भरोसा रहता है। ऐसे लोग कॉकरोच जनता पार्टी के पहले दिन से ही यह कहते आ रहे हैं कि इन तिलचट्टों का केन्द्र सरकार के साथ कुछ घालमेल है। दरअसल देश में जब यूपीए सरकार थी, और 2014 के आम चुनाव के पहले तो सामाजिक आंदोलनकारी के रूप में अन्ना हजारे को सामने रखकर केजरीवाल ने एक बड़ा मोर्चा खोला था, और बाद में दिल्ली विधानसभा के चुनाव के समय इंडिया अंगेस्ट करप्शन नाम के आंदोलन को आम आदमी पार्टी नाम के राजनीतिक दल में बदल दिया गया था, तब भी कई लोगों को यह लगा था कि यूपीए सरकार के खिलाफ एक बड़ा आंदोलन खड़ा करवाकर, चुनाव में उसे कांग्रेस के खिलाफ इस्तेमाल किया गया था। उस वक्त केजरीवाल के आंदोलन और पार्टी को सत्तारूढ़ पार्टी के खिलाफ इस्तेमाल किया गया था, लेकिन आज कॉकरोच जनता पार्टी को लेकर कुछ लोगों का शक इसका उल्टा है। अपराध और साजिश की थ्योरी पर भरोसा करने वाले लोग यह मानते हैं कि कॉकरोच जनता पार्टी चाहे सार्वजनिक रूप से मोदी सरकार, और उसके चुनाव आयोग के खिलाफ अभियान चला रही है, लेकिन वह कुल मिलाकर कांग्रेस को कमजोर कर रही है, इंडिया-गठबंधन को कमजोर कर रही है। मोदी और चुनाव आयोग के खिलाफ ही तो राहुल गांधी की अगुवाई में देश का विपक्ष आंदोलन चला रहा है। इसके समानांतर अगर तिलचट्टों का एक आंदोलन चल रहा है, तो विपक्ष के हिस्से आने वाली किसी भी किस्म की शोहरत या वाहवाही तो दोनों खेमों में बंट जाएगी। इसलिए कुछ लोगों का यह भी मानना है कि पिछली बार कॉकरोच जनता पार्टी के आंदोलन के बाद शिक्षामंत्री धर्मेन्द्र प्रधान को जो इस्तीफा देना पड़ा था, वैसा बलिदान तो हर सरकार को किसी न किसी नाराजगी को शांत करने के लिए देना ही पड़ता है। अभी भी हो सकता है कि मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे से ही नौबत शांत हो सके, लेकिन ऐसे में कांग्रेस और बाकी विपक्ष को वाहवाही न मिले, इसलिए कामयाबी का ताज पहनाने को कॉकरोच का सिर सामने पेश कर दिया गया है।
हम ऐसी दोनों नौबतों में से किसी के साथ नहीं हैं, हो सकता है कि यह केन्द्र सरकार के साथ कॉकरोच पार्टी की एक मिलीजुली कुश्ती हो, और यह भी हो सकता है कि कॉकरोच पार्टी ईमानदारी से मोदी सरकार के खिलाफ हो। राजनीति में हमेशा दो और दो चार नहीं होता, दो और दो तीन या पांच भी हो सकते हैं। इससे परे मुद्दे की बात यह है कि केन्द्र सरकार के मातहत चलने वाली दिल्ली की पुलिस के आज के इंतजाम की कोई पुरानी मिसाल नहीं है। अब किसी आंदोलन की विशालता या विकरालता को देखे बिना ही उसे रोकने और कुचलने के लिए अगर इतनी बड़ी तैयारी की गई है, तो उससे यह भी हो सकता है कि आंदोलन शुरू होने के पहले ही कामयाब दिखने लगे, और यह समझ पडऩे लगे कि राहुल गांधी की अगुवाई वाला विपक्षी आंदोलन इसके मुकाबले कहीं नहीं था। आज दिल्ली में जितने बड़े पैमाने पर जितनी घेराबंदी हुई है, पड़ोसी राज्यों में जगह-जगह कार्रवाई हुई है, हजारों लोगों को गिरफ्तार कर लिया गया है, या हिरासत में रखा गया है, किसी आंदोलन में इतनी बड़ी कार्रवाई इसके पहले याद नहीं पड़ती है।
जनता में जागरूकता चाहे विपक्षियों के किसी संगठन से आए, या बिल्कुल ही नए नौजवानों के आंदोलन से आए, जागरूकता जरूरी है। विपक्ष और कॉकरोच, इन दोनों की ताजा मांगें मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ है, और मतदाता सूची पुनरीक्षण में देश के करोड़ों लोगों के नाम काट देने के खिलाफ है। इस तरह इन दोनों का एजेंडा एक साथ न होकर भी एक है। देश के कुछ प्रमुख सामाजिक कार्यकर्ता, कुछ बड़े वकील, और बहुत से वर्तमान और भूतपूर्व जज चुनाव आयोग के तौर-तरीकों के खिलाफ हैं, दूसरी तरफ जैसा कि किसी भी लोकतंत्र में होता है, बहुत से भूतपूर्व लोग चुनाव आयोग की आलोचना के खिलाफ भी खड़े हैं। अच्छी बात यही है कि चुनाव आयोग बहस के केन्द्र में है, और उसके सारे तौर-तरीके अब इतनी अधिक बारीकी से देखे जा रहे हैं कि कुछ महीने पहले इसी आयोग द्वारा किए गए दुनिया के सबसे बड़े मतदातासंहार को भी सुप्रीम कोर्ट हल्का-फुल्का मान रहा था, अब शायद इन दोनों आंदोलनों के चलते हुए सुप्रीम कोर्ट को अपने चश्मे का नंबर बदलना पड़ा है, और अब उसे समझ आ रहा है कि चुनाव आयोग तो उसके नाम का बेजा इस्तेमाल करके वोटरों को गाजर-मूली की तरह काटने के लिए तलवारबाजी कर रहा था। अब सुप्रीम कोर्ट चुनाव आयोग के तौर-तरीकों और फैसलों से हाथ धो रहा है, लेकिन यह सिलसिला इतना लेट हो चुका है कि कई राज्यों में लोकतंत्र लेट चुका है।

