महिला सुरक्षा: दिल्ली-एनसीआर की घटनाओं पर सुप्रीम कोर्ट की सख्ती और जमीनी हकीकत

महिला सुरक्षा को लेकर देश में कागजी व्यवस्था के साथ-साथ ज़मीनी जवाबदेही की सख्त जरूरत है। सड़क खुली है, बाजार खुला है, बस चल रही है, पार्क खुला है, फिर भी बेटी के लिए रास्ता सुरक्षित क्यों नहीं है?
संविधान की परीक्षा और नागरिकों के अधिकार
यह प्रश्न किसी एक शहर, एक सरकार, एक पुलिस थाने या किसी एक अपराधी का नहीं है। यह भारतीय गणराज्य की उस संवैधानिक प्रतिज्ञा की परीक्षा है, जिसमें प्रत्येक नागरिक को समानता, स्वतंत्रता और गरिमा के साथ जीने का अधिकार दिया गया है। संविधान का अनुच्छेद 14 समानता की गारंटी देता है। अनुच्छेद 15 लिंग के आधार पर भेदभाव से सुरक्षा देता है। अनुच्छेद 21 जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता की रक्षा करता है। इन अधिकारों का अर्थ केवल इतना नहीं कि राज्य बेटी को जीवित रहने दे, अर्थ यह भी है कि वह सार्वजनिक जीवन में भय से सिकुड़कर न जिए। जिस सड़क पर बेटे का रास्ता है, उसी सड़क पर बेटी का अधिकार भी है। फिर बार-बार ऐसा क्यों हो रहा है कि लड़की घर से निकलती है तो परिवार की चिंता उसके कदमों से पहले चलने लगती है?
सर्वोच्च न्यायालय का स्वतः संज्ञान और हालिया घटनाएं
28 सितंबर 2026 को सर्वोच्च न्यायालय ने दिल्ली-एनसीआर में हाल की बलात्कार और यौन हिंसा की घटनाओं पर स्वतः संज्ञान लिया। न्यायालय के समक्ष यह प्रश्न भी आया कि 2012 के निर्भया कांड के लगभग चौदह वर्ष बाद सार्वजनिक सुरक्षा की व्यवस्थाओं में वास्तविक बदलाव कितना आया है। यह किसी आरोपी की दोषसिद्धि का निर्णय नहीं है। यह उससे बड़ा प्रश्न है कि क्या हमारी व्यवस्था अपराध होने के बाद सक्रिय होने से आगे बढ़कर अपराध की संभावना को पहले पहचानने और घटाने में सक्षम हुई है? दिल्ली के आस्था कुंज पार्क की हाल की घटना में 17 वर्षीय किशोरी के साथ कथित सामूहिक दुष्कर्म का मामला सामने आया। आरोपियों पर स्वयं को पुलिसकर्मी बताकर किशोरी और उसके मित्र को अलग करने का आरोप है। इसी तरह दिल्ली-एनसीआर में चलती स्लीपर बस में नाबालिग से कथित सामूहिक दुष्कर्म का मामला भी सामने आया। इन घटनाओं को लेकर सर्वोच्च न्यायालय ने व्यापक सार्वजनिक सुरक्षा और कानून-व्यवस्था की कार्यप्रणाली पर प्रश्न उठाए हैं। पत्रकारिता की पहली जिम्मेदारी है, आरोप को आरोप ही लिखना, न्यायिक निष्कर्ष को आरोप से अलग रखना और पीड़िता की पहचान की रक्षा करना। लेकिन दूसरी जिम्मेदारी उससे भी बड़ी है, घटना के पीछे छिपे व्यवस्था के छेद को पहचानना। समस्या यह नहीं कि व्यवस्था बिल्कुल नहीं है, समस्या यह है कि वह अंतिम छोर तक कितनी पहुँचती है।
संस्थागत ढांचा और बजट का उपयोग
महिला सुरक्षा के नाम पर देश में संस्थागत ढाँचा मौजूद है। निर्भया कोष के अंतर्गत वित्त वर्ष 2024-25 तक करोड़ों रुपये आवंटित और उपयोग किए गए हैं। इसी व्यवस्था के अंतर्गत आपातकालीन प्रतिक्रिया प्रणाली 112, महिला हेल्पलाइन 181, वन स्टॉप सेंटर, त्वरित न्यायालय, महिला सहायता डेस्क, सुरक्षित शहर परियोजनाएँ, साइबर फोरेंसिक प्रयोगशालाएँ तथा परिवहन सुरक्षा जैसी योजनाएँ समर्थित हैं। इसलिए यह कहना कि सरकार ने महिला सुरक्षा के लिए कुछ नहीं किया, तथ्यों के विपरीत होगा। लेकिन यहीं से अगला और अधिक असुविधाजनक प्रश्न पैदा होता है कि व्यवस्था तो बनी, पर क्या वह सही से काम कर रही है? कैमरा लगा होना और कैमरे की निगरानी होना दो अलग बातें हैं। हेल्पलाइन का नंबर उपलब्ध होना और संकट की घड़ी में प्रभावी सहायता मिलना दो अलग बातें हैं। महिला सहायता डेस्क का बोर्ड लगा होना और पीड़िता को संवेदनशील, प्रशिक्षित तथा त्वरित सहायता मिलना दो अलग बातें हैं। बस में सुरक्षा उपकरण होना और किसी संकट के समय उस व्यवस्था का काम करना दो अलग बातें हैं। चुनौती अब केवल व्यवस्था बनाने की नहीं, बल्कि उसे जमीन पर जीवित रखने की है। सुरक्षा का पहला प्रमाण बजट नहीं, बेटी का निर्भय व्यवहार है।
सार्वजनिक जीवन की गुणवत्ता और जोखिम-आधारित पुलिसिंग
किसी शहर को सुरक्षित घोषित करने का सबसे सरल तरीका यह नहीं कि उसके पास कितने कैमरे हैं। देखना यह चाहिए कि शाम को कॉलेज से लौटती लड़की क्या सोचती है। क्या वह निर्भय होकर बस में बैठती है? क्या वह सुनसान रास्ते से गुजरते समय सहायता की व्यवस्था जानती है? क्या उसके परिवार को हर शाम यह पूछना पड़ता है-“कहाँ पहुँची?” क्या वह किसी पार्क में बैठने से पहले यह सोचती है कि वहाँ कोई देख भी रहा है या नहीं? यदि नागरिक स्वतंत्रता का उपयोग करने से पहले नागरिक भय की गणना करने लगे, तो समस्या केवल अपराध की नहीं रहती, बल्कि यह सार्वजनिक जीवन की गुणवत्ता की हो जाती है और यही संविधान की असली परीक्षा है। अपराध के बाद पुलिस की गति महत्वपूर्ण है, लेकिन अपराध से पहले व्यवस्था की चौकसी उससे भी अधिक महत्वपूर्ण है। कौन से स्थान बार-बार शिकायतों के केंद्र बन रहे हैं? कहाँ प्रकाश व्यवस्था खराब है? कहाँ स्कूल-कॉलेज से लौटने वाली छात्राओं को सुरक्षित परिवहन नहीं मिलता? पुलिसिंग को केवल घटना-आधारित नहीं, बल्कि जोखिम-आधारित होना होगा। अपराध होने से पहले पुलिस की उपस्थिति बढ़ाना ही असली रोकथाम है।
कानून, न्याय की गति और दोषसिद्धि
हमारे देश में कानून कठोर है, लेकिन अब सवाल उसकी निश्चितता और गति का है। भारतीय न्याय संहिता (BNS), 2023 में बलात्कार और सामूहिक बलात्कार सहित यौन अपराधों के लिए विशिष्ट और कठोर प्रावधान हैं। हर घटना के बाद केवल कानून को और कठोर करने की बात कहना पूरा समाधान नहीं है। अपराधी के मन में भय केवल दंड की अवधि से नहीं पैदा होता, बल्कि तब पैदा होता है जब उसे विश्वास हो कि पकड़े जाने की संभावना निश्चित है, साक्ष्य सुरक्षित रहेंगे, मुकदमा अनिश्चितकाल तक नहीं खिंचेगा और दोष सिद्ध होने पर त्वरित दंड मिलेगा। महिला सुरक्षा को पुलिस, अभियोजन, फोरेंसिक, न्यायपालिका और प्रशासन सभी की संयुक्त जिम्मेदारी मानना होगा। असल सवाल यह है कि कितने मामलों की जांच समय पर पूरी हुई और कितने मामलों में दोष सिद्ध होने पर दंड मिला? जो मामला वर्षों तक लंबित रहता है, उसकी कीमत पीड़िता, उसके परिवार और न्याय व्यवस्था की विश्वसनीयता को चुकानी पड़ती है।
मीडिया, समाज और नाबालिग पीड़िता की सुरक्षा
नाबालिग पीड़िता के मामले में मीडिया और समाज की जिम्मेदारी और बढ़ जाती है। पॉक्सो (POCSO) अधिनियम की धारा 23 मीडिया में बच्चे की पहचान उजागर करने पर सख्त रोक लगाती है। नाम, पता, फोटो, विद्यालय या पड़ोस की जानकारी प्रकाशित नहीं की जा सकती। डिजिटल युग में किसी अपराध का वीडियो बनाकर प्रसारित करना पीड़िता के लिए घटना के बाद भी हिंसा को जारी रखने जैसा है। वीडियो आगे भेजने वाला व्यक्ति यह तर्क नहीं दे सकता कि उसने स्वयं अपराध नहीं किया, क्योंकि ऐसा करना पीड़िता के भय और सामाजिक अपमान को बढ़ाता है। समाज की सबसे बड़ी भूल है बेटी की स्वतंत्रता को ही खतरा मान लेना। “शाम से पहले घर आ जाना”, “अकेले मत जाना” जैसी सलाहों में माता-पिता की चिंता है, लेकिन यदि पूरी सामाजिक व्यवस्था का समाधान लड़की की आजादी सीमित करने में बदल जाए, तो यह सही नहीं है। लड़की का पार्क में बैठना, बस में अकेले यात्रा करना या रात की पाली में काम करना अपराध नहीं है। अपराध वह है जो अपराधी करता है। संस्कार आवश्यक हैं, सम्मान, सहमति और मर्यादा की शिक्षा बचपन से दी जानी चाहिए, लेकिन केवल संस्कार की कमी को अपराध का कारण मान लेना अधूरा है। संस्कार भीतर से रोकता है, कानून बाहर से सीमा खींचता है, और व्यवस्था उस सीमा को लागू करती है। हमें इन तीनों की जरूरत है।
मापी जा सकने वाली जवाबदेही और सुरक्षित समाज का निर्माण
अब केवल नए नारे नहीं, मापी जा सकने वाली जवाबदेही चाहिए। हर संवेदनशील सार्वजनिक स्थान का सुरक्षा मानचित्र बने। खराब प्रकाश व्यवस्था और जोखिम वाले स्थानों की निगरानी हो। सार्वजनिक परिवहन में सुरक्षा मानकों का परीक्षण हो। पुलिस थाने में महिला सहायता डेस्क प्रशिक्षित मानव सहायता केंद्र बने। सुरक्षा को परिणामों से मापा जाना चाहिए: कितनी सड़कें सुरक्षित हुईं? कितनी शिकायतों पर समयबद्ध कार्रवाई हुई? यदि जांच में लापरवाही या सुरक्षा व्यवस्था में चूक पाई जाती है, तो संबंधित अधिकारियों की जवाबदेही भी तय होनी चाहिए। न तो भीड़ का न्याय, न प्रशासन की ढाल, बल्कि केवल कानून का शासन स्थापित होना चाहिए। सुरक्षित शहर वह नहीं जहाँ लड़कियों को जल्दी घर लौटना पड़े, बल्कि सुरक्षित शहर वह है जहाँ उन्हें लौटने की जल्दी नहीं, बल्कि व्यवस्था पर विश्वास हो। सुरक्षित समाज वह है जो अपराधी से कहे कि तुम्हारी वजह से किसी नागरिक की स्वतंत्रता कम नहीं होगी। लोकतंत्र की असली परीक्षा संसद के भीतर नहीं, बल्कि उस सड़क पर होती है जहाँ रात में घर लौट रही अकेली लड़की को डर न लगे, और उसके माता-पिता को यह विश्वास हो कि भारत का संविधान उसके साथ चल रहा है।



