‘छत्तीसगढ़’ का संपादकीय : बेवजह फख्र करने वाले दुनिया को उड़ते पंछी की नजरों से देखें

अभी एक स्कूल के मिडिल और हाईस्कूल के बच्चों के बीच कुछ पत्रकारों को आमंत्रित करके मीडिया के पेशे के बारे में बच्चों को कुछ जानकारी दिलवाई गई, और उनको अपने सवालों के जवाब भी मिले। एक पत्रकार से बच्चों ने पूछा कि जब किसी दूसरे पड़ोसी देश के बारे में लिखना रहता है, तो किस तरह की दुविधा होती है? वहां जवाब दे रहे संपादक हैरान थे कि छोटे बच्चों के मन में पत्रकारिता का इतना गहरा और जटिल सवाल कैसे आया जिससे कि अधिकतर पत्रकार भी मुक्त रहते हैं। किसी और देश के साथ अपने देश के रिश्तों, मामलों, और टकराव पर लिखने वाले पत्रकार भी आमतौर पर हमारा देश, उनका देश, इस तरफ, उस तरफ जैसी भाषा लिखते हैं। जाहिर तौर पर वे एक देश के नागरिक होकर लिखते हैं, और ऐसे में दूसरे देश के बारे में उनकी लिखी गई बातें किसी निष्पक्ष या तटस्थ की लिखी हुई नहीं रह जाती, बल्कि जुड़े हुए दो देशों में से एक के नागरिक की लिखी हुई बातें रहती हैं। द्विपक्षीय मामलों में इस तरह का लिखा हुआ कोई वजन नहीं रखता, क्योंकि शांतिकाल में, सरहद से दूर, बिना किसी जंग के जब लिखा जाता है, तो किसी फौज के साथ जड़े हुए जर्नलिस्ट की तरह लिखना जरूरी नहीं रहता।
जिन लोगों को जानकारी न हो कि जंग की रिपोर्टिंग किस तरह होती है, उनके लिए यह बताना जरूरी है कि जंग में शामिल देशों में से किसी एक देश की फौज के साथ इम्बेड होकर, जडक़र ही कोई जर्नलिस्ट रिपोर्टिंग कर सकते हैं, क्योंकि दोनों तरफ के टकराव के बीच खुद होकर, अकेले जाकर रिपोर्टिंग नहीं की जा सकती। ऐसी रिपोर्टिंग के साथ इस बात का जिक्र अनिवार्य रूप से कर दिया जाता है कि संवाददाता ने किस फौज के साथ जडक़र यह रिपोर्ट की है। लेकिन शांतिकाल में सरहद से दूर बैठे विश्लेषकों के लिए यह कहीं जरूरी नहीं रहता कि वे एक देश के साथ जडक़र विश्लेषण करें या अपने विचार लिखें। वे अपने आपको किसी देश का नागरिक मानकर उस हिसाब से भी लिख सकते हैं, या अपने आपको सरहदों से ऊपर का एक निष्पक्ष, तटस्थ विश्लेषक या विचारक मानकर भी लिख सकते हैं। यह बारीकी अखबारनवीसी में भी अधिक दूर तक नहीं निभाई जाती, चीखते चैनलों को तो यह माकूल बैठ भी नहीं सकता। हमारे नियमित पाठकों ने महसूस किया होगा कि हम लंबे बरसों से बिना सरहद के किसी ओर हुए, एक वैश्विक जिम्मेदारी के साथ लिखते हैं, और जब दो देशों के मुद्दों पर लिखना होता है, तो हम उनमें से किसी भी देश के नागरिक नहीं रह जाते।
इस पर लिखने की आज इसलिए सूझ रही है कि सोशल मीडिया पर आज किसी ने यह लिखा है कि लोग बात-बात पर गर्व करने लगते हैं। किसी को किसी शहर में पैदा होने या रहने का गर्व रहता है, किसी को अपनी भाषा या बोली का, किसी को किसी देश का नागरिक होने, या किसी जात-धरम का होने का गर्व रहता है। ऐसे छोटे-छोटे गर्व करते हुए लोग यह भूल जाते हैं कि वे इस विशाल धरती के एक बड़े छोटे हिस्से के ही नागरिक हैं। जो भारत दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र कहलाता है, उस भारत का भूभाग भी दुनिया में बड़ा विशाल दिखता है। लेकिन लोगों को यह समझना चाहिए कि धरती की कुल जमीन का कुल 2.4 फीसदी ही भारत में हैं। और अगर हम जमीन और पानी दोनों की पूरी सतह को ले लें, तो भारत का पूरा इलाका 0.64 फीसदी है। दूसरी तरफ लोगों ने कई बार ऐसी तस्वीरें देखी होंगी जिनमें इस आकाशगंगा के अलग-अलग ग्रहों को आकार के हिसाब से दिखाया गया है, और उनमें पृथ्वी नाम का यह ग्रह कितनी छोटी गोली सरीखा दिखता है! फिर उस गोली के 0.64 फीसदी इलाके पर भारत है, और 140 करोड़ से अधिक आबादी में से एक ही कोई एक व्यक्ति है। अपने आपको जब दुनिया की हकीकत की विशालता के मुकाबले देखा जाए, तभी यह समझ पड़ता है कि छोटी-छोटी बातों पर गर्व करना कितना बेबुनियाद है। दुनिया भर के ग्रहों का संसार इतना विशाल है, और इंसानों की जानकारी से परे भी जाने कितनी ही आकाशगंगाएं और हो सकती है, इन सबके बीच एक इंसान समंदर के सैकड़ों किलोमीटर के तट पर रेत के एक कण से अधिक कुछ नहीं है, और कण होने का गर्व है कि वह एक चट्टान जितना बड़ा है!
