FCRA बिल पर सरकार का रुख: विदेशी फंड से बनी संपत्तियों के प्रबंधन में कानूनी निश्चितता, दक्षता और जवाबदेही बढ़ेगी

नई दिल्ली: विदेशी अंशदान (विनियमन) संशोधन विधेयक 2026 में संपत्ति प्रबंधन संबंधी प्रावधानों को लेकर सरकार का कहना है कि प्रस्तावित व्यवस्थित ढांचा विदेशी फंड से बनी संपत्तियों के प्रबंधन में कानूनी निश्चितता, प्रशासनिक दक्षता और जवाबदेही को बढ़ाता है। कानून मंत्रालय ने इसे मौजूदा कानून में सुधार बताया है।
एफसीआरए यानी फॉरेन कॉन्ट्रिब्यूशन (रेगुलेशन) अमेंडमेंट बिल में पंजीकरण रद्द होने, सरेंडर करने या समाप्त होने पर विदेशी योगदान और उससे बनी संपत्तियों के निपटान का प्रावधान सबसे ज्यादा चर्चा में रहा है। सरकार का स्पष्टीकरण है कि यह व्यवस्था नई नहीं है। एफसीआरए 2010 की धारा 15 में पहले से ही पंजीकरण रद्द या सरेंडर होने पर ऐसी संपत्तियों का निर्धारित प्राधिकरण में निहित होने का प्रावधान है।
मौजूदा कानून में क्या कमी थी
मंत्रालय ने संसद की संयुक्त समिति को बताया कि मौजूदा कानून संपत्ति के स्वामित्व का प्रावधान तो करता है, लेकिन इस अधिकार की प्रकृति, अवधि और अंतिमता के बारे में स्पष्ट नहीं बताता। पिछले एक दशक में करीब 20 हजार पंजीकरण रद्द हुए और लगभग 15 हजार समाप्त माने गए। इससे हजारों करोड़ रुपये की विदेशी योगदान वाली संपत्तियां और बैंक बैलेंस कानूनी अनिश्चितता में फंस गए। राज्य सरकारें इन संपत्तियों का कब्जा लेने, रखरखाव या प्रबंधन करने में प्रशासनिक कठिनाइयों का सामना कर रही थीं।
सरकार का तर्क है कि बिना विस्तृत प्रक्रिया के ये संपत्तियां अनिश्चित काल तक हिरासत में पड़ी रह सकती हैं। नया विधेयक इसी अंतर को भरने के लिए नामित प्राधिकरण (Designated Authority) का प्रावधान करता है।
प्रस्तावित व्यवस्था कैसे काम करेगी
पंजीकरण रद्द होने, सरेंडर करने या नवीनीकरण न होने पर विदेशी अंशदान और उससे बनी संपत्तियां पहले अस्थायी रूप से नामित प्राधिकरण के पास निहित होंगी। यदि संस्था निर्धारित अवधि में अपना पंजीकरण बहाल करा लेती है तो सारी संपत्तियां और बचा हुआ फंड पूरी तरह वापस कर दिया जाएगा।
पंजीकरण बहाल न होने पर ही संपत्तियां स्थायी रूप से निहित होंगी। ऐसी स्थिति में इन्हें सार्वजनिक उद्देश्यों के लिए केंद्र या राज्य सरकार के विभागों को हस्तांतरित किया जा सकता है या बेचा जा सकता है। बिक्री से मिली राशि भारत की समेकित निधि में जमा होगी। धार्मिक स्थलों की धार्मिक पहचान बनाए रखने का प्रावधान भी रखा गया है।
सरकार ने यह भी स्पष्ट किया है कि केवल विदेशी योगदान से बनी संपत्तियां ही इस व्यवस्था के दायरे में आएंगी। संस्था की पूरी संपत्ति जब्त नहीं की जाएगी। मिश्रित फंड से बनी संपत्तियों के मामले में घरेलू हिस्से की वापसी का तंत्र भी प्रस्तावित है।
सरकार का रुख
गृह मंत्रालय का कहना है कि यह ढांचा विदेशी योगदान की पारदर्शिता, ट्रेसबिलिटी और जवाबदेही सुनिश्चित करने के लिए लाया गया है। विदेशी फंड प्राप्त करना प्रतिबंधित नहीं है। पात्र संस्थाएं पंजीकरण या पूर्व अनुमति के बाद विदेशी अंशदान स्वीकार कर सकती हैं। विधेयक का उद्देश्य मौजूदा कानूनी और प्रशासनिक अंतरालों को दूर करना है, न कि वैध सामाजिक, शैक्षणिक या धार्मिक गतिविधियों को रोकना।
संस्थाओं के पास पुनरीक्षण और न्यायिक अपील का अधिकार भी रहेगा। सरकार का दावा है कि स्पष्ट प्रक्रिया से संपत्तियों के दुरुपयोग की संभावना कम होगी और प्रबंधन में निश्चितता आएगी।



