संपादक की कलम से..*लोकतंत्र की गरिमा से खिलवाड़ कब तक? अशोभनीय बयानबाजी और आपत्तिजनक वीडियो पर अब न्यायपालिका की सख्ती जरूरी।
तरुण कौशिक, संपादक सर्वव्यापी
राजनीति में विचारों का मतभेद लोकतंत्र की खूबसूरती है, लेकिन जब यही मतभेद अशोभनीय बयानबाजी, अभद्र भाषा, व्यक्तिगत चरित्र हनन और आपत्तिजनक वीडियो पोस्ट करने तक पहुंच जाएं, तब यह केवल राजनीतिक मर्यादा का सवाल नहीं रह जाता, बल्कि सामाजिक और संवैधानिक चिंता का विषय बन जाता है।आज देश की राजनीतिक परिस्थितियों में एक चिंताजनक प्रवृत्ति तेजी से दिखाई दे रही है। सत्ता पक्ष हो या विपक्ष, केंद्रीय स्तर के नेता हों या राज्यों के राजनीतिक चेहरे, कुछ लोगों द्वारा सार्वजनिक मंचों और सोशल मीडिया पर ऐसी भाषा का इस्तेमाल किया जा रहा है, जो लोकतांत्रिक मूल्यों और सार्वजनिक जीवन की मर्यादा के अनुरूप नहीं है। राजनीतिक विरोध के नाम पर अशोभनीय टिप्पणियां करना, आपत्तिजनक वीडियो तैयार कर सोशल मीडिया पर प्रसारित करना और किसी व्यक्ति की प्रतिष्ठा को ठेस पहुंचाने वाली सामग्री साझा करना आखिर किस प्रकार की राजनीतिक संस्कृति को जन्म दे रहा है?सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या राजनीति में अब शालीनता, संयम और जिम्मेदारी के लिए कोई स्थान नहीं बचा है? क्या लोकप्रियता हासिल करने और राजनीतिक लाभ लेने के लिए किसी भी स्तर तक गिर जाना उचित माना जाएगा? सोशल मीडिया पर लाखों लोग नेताओं को देखते और सुनते हैं। ऐसे में सार्वजनिक पदों पर बैठे व्यक्तियों की भाषा और आचरण का समाज पर सीधा प्रभाव पड़ता है। विशेषकर युवा पीढ़ी के सामने जब जिम्मेदार पदों पर बैठे लोग ही अभद्रता को राजनीतिक हथियार बनाते दिखाई देते हैं, तब समाज में स्वस्थ संवाद की अपेक्षा कैसे की जा सकती है?यह भी समझना होगा कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता भारतीय संविधान का महत्वपूर्ण अधिकार है, लेकिन यह अधिकार असीमित नहीं है। किसी की गरिमा, निजता, प्रतिष्ठा और कानून के दायरे का सम्मान करना भी उतना ही आवश्यक है। आलोचना लोकतंत्र का अधिकार है, लेकिन अपमान, चरित्र हनन और जानबूझकर भ्रामक या आपत्तिजनक सामग्री प्रसारित करना लोकतांत्रिक स्वतंत्रता का पर्याय नहीं हो सकता।ऐसी परिस्थितियों में अब न्यायपालिका को भी कानून के दायरे में रहकर कड़ा और स्पष्ट रुख अपनाने की आवश्यकता है। न्यायपालिका की जिम्मेदारी केवल विवादों का निपटारा करना नहीं, बल्कि संविधान प्रदत्त अधिकारों और नागरिकों की गरिमा की रक्षा करना भी है। जहां किसी व्यक्ति की प्रतिष्ठा, निजता या सामाजिक सौहार्द को नुकसान पहुंचाने वाली सामग्री कानून का उल्लंघन करती हो, वहां निष्पक्ष जांच, त्वरित सुनवाई और दोष सिद्ध होने पर कानून के अनुरूप कठोर कार्रवाई सुनिश्चित होनी चाहिए।हालांकि न्यायपालिका की सक्रियता का अर्थ राजनीतिक अभिव्यक्ति पर अंकुश लगाना नहीं होना चाहिए। बल्कि इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना होना चाहिए कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और संवैधानिक मर्यादा के बीच संतुलन बना रहे तथा कानून सभी पर समान रूप से लागू हो।देश को आज ऐसी राजनीति की आवश्यकता है, जहां नेता अपने विचारों, नीतियों और जनहित के कार्यों के आधार पर एक-दूसरे से मुकाबला करें, न कि अभद्र भाषा और आपत्तिजनक वीडियो के माध्यम से। लोकतंत्र की मजबूती नेताओं की आवाज की ऊंचाई से नहीं, बल्कि उनके विचारों की गंभीरता और आचरण की शालीनता से तय होती है।अंततः सवाल किसी एक राजनीतिक दल, नेता या विचारधारा का नहीं, बल्कि देश की लोकतांत्रिक संस्कृति और संवैधानिक व्यवस्था की प्रतिष्ठा का है। यदि सार्वजनिक जीवन में मर्यादा बनाए रखने की जिम्मेदारी निभाने वाले ही मर्यादाएं तोड़ने लगें, तो आम नागरिक किससे आदर्श की अपेक्षा करेगा?अब समय आ गया है कि राजनीतिक दल अपने नेताओं और प्रवक्ताओं के आचरण के लिए जवाबदेही तय करें, सोशल मीडिया मंच आपत्तिजनक और गैरकानूनी सामग्री पर नियमानुसार कार्रवाई करें तथा न्यायपालिका कानून के उल्लंघन के मामलों में निष्पक्षता के साथ सख्ती दिखाए।लोकतंत्र में असहमति का अधिकार है, अभद्रता का विशेषाधिकार नहीं। राजनीति में विरोध होना चाहिए, विद्वेष नहीं। अभिव्यक्ति की आजादी होनी चाहिए, लेकिन संविधान और कानून की मर्यादा के भीतर। यही एक स्वस्थ, सभ्य और सशक्त भारत की पहचान होनी चाहिए।
