सरकारी जमीन पर सालों पुराना कब्जा भी कानूनी हक नहीं देता

भिलाई स्टील प्लांट की जमीन पर चल रही दुकानों से जुड़ी नौ याचिकाएं खारिज की हाईकोर्ट ने
छत्तीसगढ़ संवाददाता
बिलासपुर, 4नवंबर।छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने साफ कहा है कि सरकारी या सार्वजनिक जमीन पर नियमों के खिलाफ कब्जा कर लेने से किसी को कानूनी अधिकार नहीं मिल जाता। भले ही कब्जाधारी ने वहां पक्का निर्माण कर लिया हो,वर्षों से कारोबार चला रहा हो या बिजली बिल जैसे शुल्क नियमित रूप से जमा किए हों,इससे जमीन पर उसका वैध दावा नहीं बनता।
जस्टिस ए.के. प्रसाद की सिंगल बेंच ने इस टिप्पणी के साथ भिलाई स्टील प्लांट (बीएसपी) की जमीन पर लंबे समय से दुकानें और व्यावसायिक प्रतिष्ठान चला रहे कारोबारियों की नौ याचिकाएं खारिज कर दीं।
वर्ष1976में बीएसपी ने खुर्सीपार में व्यावसायिक इस्तेमाल के लिए कुछ भूखंड आवंटित किए थे। बाद में मूल आवंटियों के बजाय दूसरे लोगों ने इन पर कब्जा कर दुकानें और अन्य व्यावसायिक गतिविधियां शुरू कर दीं। इसे अवैध कब्जा मानते हुए बीएसपी ने सार्वजनिक परिसर (अनधिकृत कब्जाधारियों की बेदखली) अधिनियम, 1971के तहत कार्रवाई शुरू की।
याचिकाकर्ताओं का तर्क था कि वे कई वर्षों से इन परिसरों में कारोबार कर रहे हैं। वे किराया,लाइसेंस फीस,बिजली बिल और संपत्ति कर भी नियमित रूप से जमा करते रहे हैं। इसलिए उनके खिलाफ पहले जारी किए गए बेदखली आदेशों पर अब अमल नहीं किया जाना चाहिए।
इसके जवाब में बीएसपी ने बताया कि मूल आवंटन की शर्तों में जमीन का कब्जा किसी तीसरे व्यक्ति को सौंपने,उसे किराये पर देने या कारोबारी साझेदारी करने पर रोक थी। इसके बावजूद मूल आवंटियों ने दूसरे लोगों को जमीन पर कब्जा दे दिया। बीएसपी का कहना था कि ऐसे हस्तांतरण से कब्जा लेने वालों को कोई कानूनी अधिकार नहीं मिल सकता।
हाईकोर्ट ने बीएसपी की दलील स्वीकार करते हुए कहा कि आवंटन की शर्तों के उल्लंघन में जमीन का हस्तांतरण करने से उसे हासिल करने वाले व्यक्ति को कोई कानूनी हक नहीं मिलता। लंबे समय तक कारोबार करना या विभिन्न शुल्क जमा करना भी अवैध कब्जे को वैध नहीं बना सकता। इसी आधार पर अदालत ने सभी नौ याचिकाएं खारिज कर दीं।
इसी मामले में एक कारोबारी ने बीएसपी के अधिकारी के खिलाफ अवमानना याचिका भी दायर की थी। उसका आरोप था कि हाईकोर्ट ने8अप्रैल2022को परिसर में यथास्थिति बनाए रखने का आदेश दिया था,लेकिन19अप्रैल को उसे बेदखल कर दिया गया।
हाईकोर्ट ने कहा कि यह साबित नहीं हुआ कि अधिकारी ने जानबूझकर अदालत के आदेश की अनदेखी की थी। इस आधार पर अवमानना याचिका भी खारिज कर दी गई।



