जम्मू-कश्मीर विधानसभा ने पूर्ण राज्य का दर्जा तत्काल बहाल करने का प्रस्ताव पारित किया, भाजपा ने वॉकआउट किया

जम्मू-कश्मीर विधानसभा ने 28 सितंबर 2026 को केंद्र शासित प्रदेश को पूर्ण राज्य का दर्जा तत्काल और आवश्यक रूप से बहाल करने की मांग वाला प्रस्ताव ध्वनिमत से पारित कर दिया। प्रस्ताव मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने 25 सितंबर को पेश किया था। मतदान के समय भारतीय जनता पार्टी के विधायक सदन से बाहर चले गए।
प्रस्ताव में कहा गया है कि 26 जून 2000 और 6 नवंबर 2024 को सदन द्वारा पारित प्रस्तावों के अतिरिक्त, यह सदन भारत सरकार से जम्मू-कश्मीर का पूर्ण राज्य का दर्जा तत्काल और आवश्यक रूप से बहाल करने का आग्रह करता है तथा इसे केंद्र सरकार को भेजने का संकल्प करता है।
अगस्त 2019 में जम्मू-कश्मीर पुनर्गठन अधिनियम के तहत तत्कालीन राज्य का विभाजन कर जम्मू-कश्मीर और लद्दाख दो केंद्र शासित प्रदेश बनाए गए थे। जम्मू-कश्मीर को विधानसभा वाला केंद्र शासित प्रदेश बनाया गया। 2024 में विधानसभा चुनाव के बाद उमर अब्दुल्ला के नेतृत्व में निर्वाचित सरकार बनी। वर्तमान व्यवस्था में निर्वाचित सरकार मौजूद है, लेकिन पूर्ण राज्य के समान संवैधानिक और प्रशासनिक अधिकार उपलब्ध नहीं हैं।
मुख्यमंत्री ने कहा कि प्रस्ताव केवल राज्य के दर्जे तक सीमित है। उन्होंने सदस्यों से अनुच्छेद 370 और अनुच्छेद 35ए जोड़ने वाले संशोधन न दबाने का आग्रह किया। कई सदस्यों ने संशोधन पेश किए थे, जिन्हें बाद में वापस ले लिया गया। उमर अब्दुल्ला ने कहा कि चुनाव के बाद सर्वोच्च न्यायालय ने राज्य का दर्जा जल्द बहाल करने की बात कही थी और अब दो वर्ष बीत चुके हैं। उन्होंने यह भी कहा कि राज्य का दर्जा बहाल करने को उग्रवाद समाप्त होने से जोड़ने पर निर्णय अनिश्चितकाल तक टल सकता है।
भारतीय जनता पार्टी ने कहा कि वह पूर्ण राज्य का दर्जा देने के पक्ष में है, लेकिन प्रस्ताव में वर्ष 2000 के स्वायत्तता प्रस्ताव और वर्ष 2024 के विशेष संवैधानिक दर्जे वाले प्रस्ताव का उल्लेख स्वीकार नहीं किया जा सकता। भाजपा विधायक सदन के बीच में पहुंचे, नारेबाजी की और कागजात फाड़े। उन्होंने अध्यक्ष अब्दुल रहीम राथर के विरुद्ध प्रस्ताव पेश करने की कोशिश की। अध्यक्ष ने कहा कि ऐसे प्रस्ताव के लिए निर्धारित प्रक्रिया और निर्धारित अवधि का पालन आवश्यक है। कुछ विधायकों को सदन से बाहर निकाला गया। भाजपा की अनुपस्थिति में प्रस्ताव ध्वनिमत से पारित हुआ।
प्रस्ताव पर चर्चा से पहले मुख्य सचिव अटल डुल्लू और विधि सचिव अचल सेठी ने विधानसभा सचिवालय को पत्र लिखकर विषय को न्यायिक विचाराधीन बताते हुए प्रस्ताव आगे न बढ़ाने की बात कही। अध्यक्ष ने इसे सदन के कामकाज में असामान्य हस्तक्षेप बताया। मुख्यमंत्री, जो विधि विभाग भी देखते हैं, ने कहा कि उन्हें इन पत्रों की पहले से जानकारी नहीं थी।
विधानसभा का प्रस्ताव स्वयं राज्य का दर्जा बहाल नहीं करता। यह निर्वाचित सदन की ओर से केंद्र सरकार के समक्ष रखी गई औपचारिक मांग है। राज्य का दर्जा बहाल करने के लिए संसद और केंद्र सरकार की ओर से आवश्यक संवैधानिक तथा विधायी प्रक्रिया पूरी करनी होगी। पूर्ण राज्य का दर्जा और 2019 से पहले की विशेष संवैधानिक व्यवस्था अलग विषय हैं। सदन की बहस में दोनों संदर्भ एक साथ आने से राजनीतिक मतभेद तीखे हुए।
अब आगे की दिशा केंद्र सरकार की प्रतिक्रिया, संवैधानिक प्रक्रिया और राजनीतिक संवाद पर निर्भर करेगी।



