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तिरुचिरापल्ली के पास 1200 साल पुराना स्वास्तिक कुआं, पल्लव राजा दंतिवर्मन के काल में बना

तमिलनाडु के तिरुचिरापल्ली जिले में तिरुवेल्लराई गांव के पास एक लगभग 1200 वर्ष पुराना कुआं स्थित है, जिसका आकार ऊपर से देखने पर स्वास्तिक जैसा दिखता है। हाल में सामने आए ड्रोन फुटेज के बाद यह पल्लव कालीन जल प्रबंधन और वास्तुकला का उदाहरण फिर चर्चा में आया है।

स्थानीय रूप से इसे मारपिडुगु पेरुंगिनारु कहा जाता है। यह कुआं प्रसिद्ध पुंडरीकाक्ष पेरुमल मंदिर के निकट है और चारों दिशाओं से सीढ़ियों के जरिए कुएं तक पहुंचा जा सकता है।

कब और किसने बनवाया

यह कुआं पल्लव राजा दंतिवर्मन के शासनकाल में बनवाया गया था। शिलालेख के अनुसार निर्माण कार्य राजा के शासन के चौथे वर्ष में शुरू हुआ और पांचवें वर्ष में पूरा हुआ। दंतिवर्मन का शासनकाल लगभग आठवीं-नौवीं शताब्दी माना जाता है, इसलिए यह संरचना करीब 800 ईस्वी के आसपास की है।

निर्माण कंबन अरायन ने कराया था। वे आलंबक्कम निवासी विसैयनल्लूलान के छोटे भाई थे और पल्लव काल के एक प्रमुख निर्माणकर्ता माने जाते हैं। कुएं के पत्थरों पर अंकित अभिलेख में यही जानकारी दर्ज है।

स्वास्तिक आकार क्यों बनाया गया

कुएं की सबसे बड़ी विशेषता इसका नक्शा है। चारों ओर से सीढ़ियां इस तरह बनाई गई हैं कि पूरी संरचना स्वास्तिक का रूप ले लेती है। इससे एक ही समय में कई लोग अलग-अलग दिशाओं से पानी भर सकते थे और भीड़ कम होती थी।

यह डिजाइन केवल प्रतीकात्मक नहीं, बल्कि व्यावहारिक भी था। दक्षिण भारत में मंदिरों से जुड़े तालाब और कुओं की परंपरा लंबे समय से रही है। तिरुवेल्लराई का यह कुआं उसी परंपरा का एक दुर्लभ और स्पष्ट उदाहरण है।

ऐतिहासिक महत्व

तिरुवेल्लराई तिरुचिरापल्ली से लगभग 20 से 25 किलोमीटर दूर है। यहां पुंडरीकाक्ष पेरुमल मंदिर और आसपास की चट्टानों में काटे गए मंदिर पल्लव काल की धार्मिक और स्थापत्य गतिविधि को दर्शाते हैं। स्वास्तिक कुआं उसी परिसर के ऐतिहासिक परिदृश्य का हिस्सा है।

अभिलेखों से पता चलता है कि कुएं का नाम मारपिडुगु पेरुंगिनारु रखा गया था। बाद की शताब्दियों में भी इस क्षेत्र में मरम्मत और रखरखाव के काम होते रहे। आज यह संरचना प्राचीन भारतीय जल व्यवस्था की समझ और पत्थर की इंजीनियरिंग का जीवंत प्रमाण मानी जाती है।

ड्रोन से लिए गए दृश्यों में चारों दिशाओं की सीढ़ियां और कुएं का पूरा आकार साफ दिखाई देता है। इसी वजह से यह ऐतिहासिक स्थल अब व्यापक चर्चा में है।

अनीता शर्मा

एक संवेदनशील और शांत स्वभाव की महिला हैं। घर-परिवार के बीच रहकर उन्होंने ज़िंदगी के छोटे-छोटे पड़ावों को करीब से देखा है। उन्हें सुबह की सैर, घर के आंगन में बैठकर चाय पीना और पुरानी पत्रिकाएँ पढ़ना पसंद है। वे आसपास के लोगों के सुख-दुख को दिल से महसूस करती हैं। उनकी सोच साफ और सीधी है — जो दिखे, वही कहें, बिना बढ़ा-चढ़ाए।

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