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स्पीकर के लिए समय-सीमा तय करने की मांग पर सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी- ‘पहले हमें खुद आईना देखना चाहिए’

नई दिल्ली: दल-बदल और विधायकों की अयोग्यता पर विधानसभा अध्यक्ष (स्पीकर) द्वारा फैसला लेने में होने वाली देरी का मुद्दा एक बार फिर सुप्रीम कोर्ट पहुंच गया है। इस मामले में वरिष्ठ वकील कपिल सिब्बल ने जब स्पीकर के लिए एक सख्त समय-सीमा निर्धारित करने की मांग की, तो सुप्रीम कोर्ट की बेंच ने एक आत्ममंथन करने वाली टिप्पणी की। कोर्ट ने कहा कि किसी अन्य संवैधानिक संस्था के लिए समय-सीमा तय करने से पहले न्यायपालिका को खुद “आईना देखना चाहिए।”

क्या है पूरा मामला?

वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने पश्चिम बंगाल के 10 बागी विधायकों की अयोग्यता याचिका से जुड़े मामले में सुप्रीम कोर्ट के समक्ष यह दलील दी। उन्होंने कोर्ट का ध्यान इस “पैटर्न” की ओर खींचा कि स्पीकर अक्सर अयोग्यता के मामलों पर महीनों तक कोई फैसला नहीं लेते हैं। सिब्बल ने ऐसे मामलों (जैसे महाराष्ट्र का शिवसेना विवाद) का हवाला देते हुए मांग की कि न्यायपालिका को इस राजनीतिक पैटर्न की जांच करनी चाहिए और स्पीकर के लिए अयोग्यता पर फैसला लेने की एक सख्त समय-सीमा तय करनी चाहिए।

सुप्रीम कोर्ट की अहम टिप्पणी

सिब्बल की इन दलीलों पर सुनवाई करते हुए बेंच ने स्पष्ट किया कि मुकदमों को निपटाने में देरी की खामी केवल स्पीकर या विधायिका में ही नहीं है, बल्कि न्यायपालिका भी इससे अछूती नहीं है।

पीठ (जस्टिस जॉयमाल्या बागची) की ओर से टिप्पणी करते हुए कहा गया, “हमें कोई भी निर्देश जारी करने से पहले आईना देखना चाहिए। ऐसे कई मामले हैं, जिनका न्यायपालिका को भी तेजी से निपटारा करना चाहिए… लेकिन हम इसमें बहुत ही ज्यादा चूक कर रहे हैं।”

अयोग्यता मामलों में देरी का ‘पैटर्न’

संविधान की 10वीं अनुसूची (दल-बदल विरोधी कानून) के तहत विधायकों की अयोग्यता पर फैसला लेने का विशेषाधिकार स्पीकर के पास होता है। कानून में फैसला लेने की कोई स्पष्ट समय-सीमा नहीं होने के कारण, अक्सर राजनीतिक हितों के चलते इन मामलों को महीनों या वर्षों तक लंबित रखा जाता है। सुप्रीम कोर्ट की यह हालिया टिप्पणी दर्शाती है कि अदालत किसी अन्य संस्था पर सख्त नियम थोपने से पहले अपनी खुद की न्यायिक देरी और लंबित मामलों को लेकर भी पूरी तरह से सचेत है।

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