धान खरीदी की व्यवस्था पर पूर्व विधायक विनोद ने उठाए सवाल, किसानों के हितों की अनदेखी का लगाया आरोप।
तरुण कौशिक, संपादक सर्वव्यापी
छत्तीसगढ़ में धान खरीदी और किसानों को 3100 रुपये प्रति क्विंटल की दर से भुगतान के मुद्दे पर सियासत गरमाने लगी है। महासमुंद के पूर्व विधायक एवं छत्तीसगढ़ के पूर्व संसदीय सचिव विनोद सेवन लाल चंद्राकर ने प्रदेश की विष्णुदेव साय सरकार पर निशाना साधते हुए आरोप लगाया है कि सरकार 3100 रुपये प्रति क्विंटल में धान खरीदी का दावा तो कर रही है, लेकिन जमीनी स्तर पर ऐसी व्यवस्था बनाई जा रही है, जिससे हजारों किसान अपना धान बेचने से वंचित रह सकते हैं। उन्होंने इसे किसानों के साथ अन्याय बताते हुए सरकार की धान खरीदी नीति पर सवाल खड़े किए हैं। विनोद चंद्राकर के अनुसार, छत्तीसगढ़ की अर्थव्यवस्था में किसानों और कृषि का महत्वपूर्ण स्थान है। प्रदेश के लाखों किसान अपनी सालभर की मेहनत, खेती की लागत और परिवार की आर्थिक जरूरतों को पूरा करने के लिए धान की फसल पर निर्भर रहते हैं। ऐसे में धान खरीदी की व्यवस्था ऐसी होनी चाहिए, जिससे प्रत्येक पात्र किसान को अपनी उपज बेचने का पर्याप्त अवसर मिल सके। यदि खरीदी की प्रक्रिया में ऐसी बाधाएं आती हैं कि किसान अपनी उपज बेच ही नहीं पाते, तो समर्थन मूल्य और घोषित दर का लाभ सीमित रह जाएगा। पूर्व विधायक ने आरोप लगाया कि सरकार की नीतियों और धान खरीदी की व्यवस्था के कारण किसानों के सामने संकट की स्थिति बन सकती है। उन्होंने आशंका जताई कि यदि समय रहते व्यवस्था में सुधार नहीं किया गया, तो बड़ी संख्या में किसानों को अपनी उपज बेचने के लिए परेशान होना पड़ेगा। किसानों को केवल आकर्षक घोषणाओं से नहीं, बल्कि ऐसी पारदर्शी और व्यावहारिक व्यवस्था से राहत मिलेगी, जिसमें उनकी पूरी उपज की खरीदी सुनिश्चित करने की दिशा में प्रभावी कदम उठाए जाएं। उन्होंने कहा कि खेती पहले ही बढ़ती लागत, खाद-बीज, कृषि उपकरणों, मजदूरी और अन्य खर्चों के दबाव से जूझ रही है। ऐसे में धान बेचने में परेशानी किसानों की आर्थिक स्थिति को और कमजोर कर सकती है। किसान महीनों तक मेहनत करके फसल तैयार करते हैं और खरीदी के मौसम में उन्हें अपनी उपज का उचित मूल्य मिलने की उम्मीद रहती है। यदि इसी समय खरीदी संबंधी प्रक्रियाएं उनके लिए परेशानी का कारण बनती हैं, तो सरकार की किसान हितैषी नीतियों पर सवाल उठना स्वाभाविक है। चंद्राकर के आरोपों के बीच अब धान खरीदी की व्यवस्था को लेकर सरकार की जवाबदेही भी चर्चा के केंद्र में है। किसानों को वास्तविक लाभ पहुंचाने के लिए आवश्यक है कि खरीदी केंद्रों की क्षमता, पंजीकृत किसानों की संख्या, टोकन व्यवस्था और खरीदी की समय-सीमा के बीच उचित समन्वय सुनिश्चित किया जाए। साथ ही, किसी भी पात्र किसान को केवल व्यवस्थागत खामियों के कारण अपनी उपज बेचने के अवसर से वंचित न होना पड़े। **अब सवाल यह है कि 3100 रुपये प्रति क्विंटल की दर से धान खरीदी का दावा किसानों के लिए वास्तविक राहत में कितना बदल पाएगा?** विनोद चंद्राकर के आरोपों ने सरकार के सामने यह चुनौती खड़ी की है कि वह धान खरीदी की व्यवस्था को लेकर किसानों की आशंकाओं का समाधान करे और यह सुनिश्चित करे कि मेहनतकश अन्नदाताओं को अपनी उपज बेचने के लिए अनावश्यक परेशानियों का सामना न करना पड़े।

