सूरजपुर पुलिस परिवार के 3 क़ातिलों को फांसी, चौथे को उम्रकैद, 288 पेज के फैसले की ख़ास बातें

पत्नी और 12 वर्षीय बेटी की हत्या पर बड़ा फैसला, 2 बरी
सूरजपुर, 9 अक्टूबर (छत्तीसगढ़)। के चर्चित सूरजपुर दोहरे हत्याकांड में जिला एवं अपर सत्र न्यायाधीश (फास्ट ट्रैक कोर्ट) आनंद प्रकाश वारियाल की अदालत ने 3 दोषियों को दोहरे हत्याकांड के लिए मौत की सजा सुनाई है, जबकि चौथे दोषी को उम्रकैद की सजा दी गई है। अदालत ने 29 अगस्त 2026 को दोषसिद्धि का फैसला सुनाया था और 8 अक्टूबर 2026 को सभी दोषियों को सजा के बिंदु पर सुनवाई के बाद दंड निर्धारित किया। मौत की सजा पाए तीनों दोषियों के मामले में फैसला पुष्टि के लिए छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट भेजा गया है।
मामला 13 अक्टूबर 2024 की रात का है। अभियोजन के अनुसार सूरजपुर निवासी शिकायतकर्ता की पत्नी और उसकी 12 वर्षीय बेटी की हत्या कर दी गई थी। मामले की जांच के दौरान पुलिस ने हत्या, आपराधिक साजिश, घर में रात के समय घुसने, साक्ष्य मिटाने समेत कई गंभीर धाराओं के तहत आरोप लगाए और कुल 6 आरोपियों के खिलाफ मुकदमा चला। अदालत ने अभियोजन के 51 गवाहों के बयान और बड़ी संख्या में दस्तावेजी, फोरेंसिक, डीएनए तथा अन्य साक्ष्यों का परीक्षण किया।
रात में घर पहुंचा था परिवार का मुखिया
अदालत के फैसले में दर्ज अभियोजन की कहानी के अनुसार शिकायतकर्ता 13 अक्टूबर 2024 की रात करीब 12 बजे अपने घर लौटा। घर पहुंचने पर उसने पाया कि उसकी पत्नी और बेटी घर में नहीं थीं। घर के भीतर सामान अस्त-व्यस्त था और खून के निशान मिले। दरवाजे के साथ भी छेड़छाड़ के संकेत मिले थे।
शिकायतकर्ता ने तत्काल पुलिस को सूचना दी। इसके बाद पुलिस ने घटनास्थल का निरीक्षण किया और आसपास के क्षेत्र में तलाश शुरू की। अगले दिन गांव पीड़ा-जुर के आसपास दोनों के शव मिलने की सूचना मिली। पुलिस ने शवों को कब्जे में लेकर पोस्टमार्टम कराया।
फैसले में दर्ज चिकित्सकीय साक्ष्यों के अनुसार दोनों शवों पर गंभीर चोटों के निशान थे। पोस्टमार्टम करने वाले चिकित्सकों ने चोटों की प्रकृति और उनकी गंभीरता के बारे में अदालत में बयान दिए। महिला के शरीर पर कई धारदार हथियार से किए गए घाव पाए गए थे। बच्ची के शरीर पर भी कई चोटें और धारदार हथियार के घाव पाए गए। अदालत के रिकॉर्ड में दोनों मौतों को हिंसक और गंभीर चोटों से हुई मृत्यु माना गया।
कार में मिले दोनों मृतकों के खून के निशान
अदालत ने अभियोजन के उस साक्ष्य को विशेष महत्व दिया जिसमें आरोपी कुलदीप साहू की कार से दोनों मृतकों के खून के निशान मिलने की बात सामने आई। फैसले में कहा गया कि कार से मिले रक्त के नमूनों की डीएनए जांच में दोनों मृतकों से उनका संबंध पाया गया। आरोपी कुलदीप के डीएनए से भी संबंधित जैविक साक्ष्य मिलने की बात फैसले में दर्ज है।
इसके अलावा घटनास्थल से दरवाजे की टूटी हुई कुंडी और अन्य सामग्री बरामद की गई। अदालत ने माना कि इन साक्ष्यों को आरोपी कुलदीप के मेमोरेंडम बयान में बताए गए घटनाक्रम से जोड़कर देखा जा सकता है।
अदालत ने फिंगरप्रिंट और पाम प्रिंट, डीएनए रिपोर्ट, घटनास्थल से मिले सामान, खून से सने कपड़े, कार से मिले साक्ष्य और आरोपियों के आचरण को भी परिस्थितिजन्य साक्ष्यों की कड़ी का हिस्सा माना।
चार आरोपियों को हत्या का दोषी माना
फैसले के निष्कर्ष में अदालत ने कहा कि अभियोजन ने कुलदीप साहू, फूल सिंह, चंद्रकांत चौधरी और आर्यन विश्वकर्मा के खिलाफ दोहरे हत्याकांड में पर्याप्त और विश्वसनीय साक्ष्य पेश किए।
अदालत के अनुसार कुलदीप साहू, फूल सिंह और चंद्रकांत चौधरी अपराध के समय घर के भीतर मौजूद थे और उन्होंने आपराधिक साजिश तथा साझा मंशा के तहत दोनों हत्याओं को अंजाम दिया। अदालत ने कहा कि घर में रात के समय जबरन प्रवेश किया गया और धारदार हथियार का इस्तेमाल किया गया।
आर्यन विश्वकर्मा की भूमिका को अदालत ने अलग तरीके से देखा। फैसले के अनुसार वह घर के भीतर नहीं गया था और घटनास्थल के बाहर था, लेकिन अदालत ने उसे आपराधिक साजिश और साझा उद्देश्य में शामिल माना। इस आधार पर उसे भी हत्या की साजिश में दोषी ठहराया गया।
बलात्कार के आरोप में अदालत ने महत्वपूर्ण अंतर किया
फैसले में अदालत ने अभियोजन की ओर से लगाए गए यौन अपराधों के आरोपों को एक समान रूप से स्वीकार नहीं किया। अदालत ने माना कि प्रमुख मृतका के साथ कुलदीप साहू द्वारा बलात्कार किए जाने का अभियोजन पक्ष ने पर्याप्त प्रमाण दिया है और इस दौरान फूल सिंह तथा चंद्रकांत चौधरी की मौजूदगी तथा भूमिका को भी अदालत ने अपने निष्कर्ष में दर्ज किया।
लेकिन अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि 12 वर्षीय बच्ची के साथ गैंग पेनिट्रेटिव सेक्सुअल असॉल्ट या उसके जीवित रहते यौन अपराध किए जाने का आरोप पर्याप्त साक्ष्य से साबित नहीं हुआ।
अदालत ने यह भी माना कि दोनों मृतकों को कार में ले जाते समय उनके जीवित होने की बात अभियोजन साबित नहीं कर सका। इसी तरह बच्ची के साथ छेड़छाड़, कपड़े उतारने, अपहरण या यौन अपराधों से संबंधित कई आरोपों को भी अदालत ने प्रमाणित नहीं माना।
इसी वजह से चारों आरोपियों को बीएनएस की कई धाराओं और पॉक्सो कानून की कुछ धाराओं से बरी किया गया।
दो आरोपियों को सभी प्रमुख आरोपों से राहत
मामले में कुलदीप साहू, फूल सिंह, चंद्रकांत चौधरी और आर्यन विश्वकर्मा के अलावा सूरज साहू और नीलकेश्वर साहू भी आरोपी थे।
अदालत ने सूरज साहू और नीलकेश्वर साहू को संबंधित आरोपों से बरी कर दिया। अदालत ने माना कि अभियोजन उनके खिलाफ यह साबित करने में सफल नहीं रहा कि उन्होंने मुख्य आरोपियों को अपराध करने, भागने या साक्ष्य मिटाने में आवश्यक मदद की थी।
अदालत के निष्कर्ष के अनुसार सूरज साहू के खिलाफ ऐसा पर्याप्त साक्ष्य नहीं मिला कि उसने मुख्य आरोपी कुलदीप की सहायता की हो। इसी तरह उसके मेमोरेंडम से हत्या में प्रयुक्त प्रमुख हथियार की बरामदगी भी प्रमाणित नहीं हुई।
इस प्रकार अदालत ने अभियोजन के पूरे मामले को सभी आरोपियों के खिलाफ एक जैसा स्वीकार नहीं किया, बल्कि प्रत्येक आरोपी की भूमिका और उपलब्ध साक्ष्य को अलग-अलग परखा।
कुलदीप के खिलाफ एक और आरोप भी साबित
अदालत ने कुलदीप साहू को छत्तीसगढ़ राज्य सुरक्षा अधिनियम की धारा 14 के तहत भी दोषी पाया। फैसले के अनुसार घटना के समय वह उस क्षेत्र से निष्कासित किए जाने के आदेश के बावजूद सूरजपुर जिले के क्षेत्र में पाया गया था।
अदालत ने उसके खिलाफ इस आरोप को भी अलग से साबित माना।
3 दोषियों को फांसी क्यों?
सजा तय करते समय अदालत ने केवल अपराध की गंभीरता ही नहीं, बल्कि दोषियों की भूमिका, अपराध का तरीका, पीड़ितों की स्थिति, पूर्व आपराधिक गतिविधियों और दोषियों की उम्र सहित कई परिस्थितियों पर विचार किया।
अदालत ने इसे दोहरे हत्याकांड का मामला माना और कहा कि अपराध की प्रकृति अत्यंत गंभीर और क्रूर थी। विशेष रूप से 12 वर्षीय बच्ची की हत्या को अदालत ने अत्यंत गंभीर परिस्थितियों में रखा।
फैसले में तीन दोषियोंकुलदीप साहू, फूल सिंह और चंद्रकांत चौधरीके पूर्व आपराधिक मामलों का भी उल्लेख किया गया है। अदालत ने उनके पूर्व रिकॉर्ड और वर्तमान अपराध की परिस्थितियों को सजा तय करने में महत्वपूर्ण माना।
अदालत ने यह भी दर्ज किया कि घटना के बाद आरोपियों ने साक्ष्य छिपाने और खुद को कानूनी कार्रवाई से बचाने का प्रयास किया।
अभियोजन ने दोषियों के लिए मृत्युदंड की मांग की थी। बचाव पक्ष ने उनकी कम उम्र, परिवार और सुधार की संभावना सहित कई आधारों पर मौत की सजा न देने का अनुरोध किया।
अदालत ने मृत्युदंड और उम्रकैद से जुड़े सुप्रीम कोर्ट के विभिन्न फैसलों का अध्ययन करने के बाद यह विचार किया कि मामला रेयरेस्ट ऑफ रेयर श्रेणी में आता है या नहीं।
अंततः अदालत ने कुलदीप साहू, फूल सिंह और चंद्रकांत चौधरी को दो हत्याओं के लिए मृत्युदंड दिया।
तीनों की मौत की सजा हाईकोर्ट की पुष्टि के अधीन
यह महत्वपूर्ण है कि ट्रायल कोर्ट द्वारा सुनाई गई मौत की सजा अंतिम रूप से लागू होने वाली सजा नहीं है। अदालत ने तीनों दोषियों को दी गई मृत्युदंड की सजा की पुष्टि के लिए मामला छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट भेजने का निर्देश दिया है।
यानी हाईकोर्ट की पुष्टि के बाद ही मृत्युदंड पर आगे की कार्रवाई हो सकती है। दोषियों को हाईकोर्ट में अपील का अधिकार भी है। फैसले की प्रति दोषियों को नि:शुल्क देने और जेल के माध्यम से अपील दायर करने की सुविधा उपलब्ध कराने का निर्देश भी अदालत ने दिया है।
आर्यन विश्वकर्मा को उम्रकैद
चौथे दोषी आर्यन विश्वकर्मा को अदालत ने मृत्युदंड नहीं दिया। उसे उम्रकैद की सजा सुनाई गई है।
अदालत ने सजा तय करते समय उसकी उम्र और भूमिका पर विशेष ध्यान दिया। फैसले के अनुसार घटना के समय आर्यन की उम्र 20 वर्ष थी। वह घर के अंदर नहीं गया था और अपराध स्थल पर उसकी भूमिका बाकी तीन दोषियों से अलग थी।
अदालत ने यह भी ध्यान में रखा कि उसके खिलाफ कोई पूर्व आपराधिक इतिहास साबित नहीं हुआ था और उसकी प्रोबेशन रिपोर्ट भी देखी गई। इन्हीं परिस्थितियों को उसके पक्ष में महत्वपूर्ण शमनकारी परिस्थिति माना गया और उसे तीन अन्य दोषियों की तरह मृत्युदंड नहीं दिया गया।
आर्यन को हत्या से संबंधित धाराओं, आपराधिक साजिश और साक्ष्य मिटाने से संबंधित अपराधों में उम्रकैद समेत अन्य सजाएं दी गईं। उसकी सभी सजाएं साथ-साथ चलेंगी।
अलग-अलग धाराओं में अलग सजा
कुलदीप साहू को दो हत्याओं के लिए बीएनएस की धारा 103(1) के तहत दो बार मृत्युदंड दिया गया। इसके अलावा बलात्कार, रात में घर में घुसने, साक्ष्य मिटाने, आपराधिक साजिश तथा राज्य सुरक्षा अधिनियम के तहत भी अलग-अलग सजाएं और जुर्माने लगाए गए।
कुलदीप पर लगाए गए जुर्मानों में 25,000 रुपये, 20,000 रुपये, 20,000 रुपये, 5,000 रुपये, 20,000 रुपये और 5,000 रुपये शामिल हैं। विभिन्न धाराओं में जुर्माना नहीं देने पर अतिरिक्त कठोर कारावास का प्रावधान किया गया है।
फूल सिंह और चंद्रकांत चौधरी को भी दो हत्याओं के लिए मृत्युदंड तथा संबंधित अन्य धाराओं में उम्रकैद और अन्य सजाएं दी गई हैं।
आर्यन विश्वकर्मा को संबंधित धाराओं में उम्रकैद और 3 वर्ष के कठोर कारावास की सजाएं दी गई हैं। अदालत ने सभी सजाओं को एक साथ चलाने का निर्देश दिया है।
पीड़ित परिवार को मुआवजे की सिफारिश
अदालत ने केवल दोषियों को सजा देने तक मामला सीमित नहीं रखा। फैसले में जिला विधिक सेवा प्राधिकरण, सूरजपुर को मृतकों के परिवार को उचित और पर्याप्त मुआवजा देने पर विचार करने की सिफारिश की गई है।
अदालत ने कहा कि मुआवजा तय करते समय मामले की परिस्थितियों तथा पीड़ितों के लिए लागू नियमों और दिशा-निर्देशों को ध्यान में रखा जाए। यदि परिवार को पहले ही किसी सरकारी योजना या विधिक सेवा प्राधिकरण के माध्यम से अंतरिम अथवा अंतिम मुआवजा मिला हो तो उसे भी ध्यान में रखा जाए।
अदालत ने यह भी निर्देश दिया कि जब्त की गई कई वस्तुओं को अपील की अवधि समाप्त होने के बाद नियमों के अनुसार नष्ट या वापस किया जाए। इनमें रक्त के नमूने, बाल, खून से सने सामान, दरवाजे की टूटी कुंडी, चाकू और अन्य फोरेंसिक सामग्री शामिल हैं।
51 गवाहों और फोरेंसिक साक्ष्यों पर आधारित फैसला
यह मामला केवल प्रत्यक्षदर्शी गवाही पर आधारित नहीं था। अदालत ने अभियोजन के 51 गवाहों के बयान, पोस्टमार्टम रिपोर्ट, डीएनए जांच, फिंगरप्रिंट और पामप्रिंट रिपोर्ट, एफएसएल रिपोर्ट, सीसीटीवी और मोबाइल से जुड़े रिकॉर्ड, जब्ती पंचनामे तथा अन्य दस्तावेजों की जांच की।
अदालत ने विशेष रूप से परिस्थितिजन्य साक्ष्यों की पूरी कड़ी पर विचार किया। फैसले में कहा गया कि हत्या के मामलों में प्रत्यक्षदर्शी उपलब्ध न होने की स्थिति में परिस्थितिजन्य साक्ष्य के आधार पर भी दोषसिद्धि हो सकती है, लेकिन उसके लिए परिस्थितियों की पूरी कड़ी ऐसी होनी चाहिए जिससे अपराध के अलावा किसी अन्य संभावना के लिए उचित आधार न बचे।
इस मामले में अदालत ने डीएनए, कार में मिले रक्त, घटनास्थल के साक्ष्य, आरोपियों की गतिविधियों, उनके बयानों और अन्य परिस्थितियों को एक-दूसरे से जोड़ते हुए चार आरोपियों की भूमिका स्थापित मानी।
अदालत ने सभी आरोपों को स्वीकार नहीं किया
इस फैसले की एक महत्वपूर्ण बात यह भी है कि अदालत ने अभियोजन की हर दलील को स्वीकार नहीं किया। जहां पर्याप्त साक्ष्य नहीं मिला, वहां आरोपियों को बरी किया गया।
विशेष रूप से पॉक्सो कानून की कई धाराओं, गैंगरेप से जुड़े आरोपों, हथियार कानून की एक धारा तथा मृतकों को जीवित अवस्था में कार में ले जाने और कुछ यौन अपराधों से जुड़े आरोपों को अदालत ने प्रमाणित नहीं माना।
इस तरह अदालत का फैसला मुख्य रूप से दोहरे हत्याकांड, आपराधिक साजिश, साझा मंशा, रात में घर में घुसने और साक्ष्य मिटाने से जुड़े उन आरोपों पर आधारित है जिन्हें अदालत ने उपलब्ध साक्ष्यों से साबित माना।
फैसले का अगला चरण
8 अक्टूबर 2026 के फैसले के बाद कुलदीप साहू, फूल सिंह और चंद्रकांत चौधरी की मौत की सजा की पुष्टि के लिए पूरा रिकॉर्ड हाईकोर्ट भेजा जाएगा। सभी दोषी फिलहाल हिरासत में हैं। अदालत ने उन्हें फैसले और सजा की प्रति उपलब्ध कराने तथा यदि वे अपील करना चाहें तो जेल के माध्यम से छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट में अपील की सुविधा देने का निर्देश दिया है।
इस प्रकार सूरजपुर के इस बहुचर्चित दोहरे हत्याकांड में ट्रायल कोर्ट की कार्यवाही पूरी हो गई है, लेकिन तीन मौत की सजाओं पर अंतिम न्यायिक निर्णय अभी हाईकोर्ट की पुष्टि और उसके बाद उपलब्ध अपीलीय प्रक्रिया पर निर्भर करेगा।
स्रोत : सूरजपुर जिला एवं अपर सत्र न्यायालय का 29 अगस्त 2026 का निर्णय तथा 8 अक्टूबर 2026 का सजा आदेश। फैसले के शुरुआती हिस्से में मामले, आरोपियों और अभियोजन की ओर से प्रस्तुत 51 गवाहों का विवरण दिया गया है। (इस फ़ैसले से समाचार को chatgpt से बनवाया गया है।)



