संपादक के कलम से…*लोकतंत्र के पहिली शर्त हे निष्पक्ष चुनाव, फेर चुनाव करइया संस्था ऊपर उठत सवाल के जवाब कोन देही?
तरुण कौशिक, संपादक सर्वव्यापी
भारत के लोकतंत्र म जनता के वोट सबले बड़े ताकत आय। एखर सहारे जनता सरकार बनाथे, सरकार बदलथे अउ अपन भविष्य के फैसला करथे। फेर जब एही वोट के पवित्रता ऊपर सवाल उठे लगथे, तब मामला खाली कोनो राजनीतिक दल के हार-जीत तक सीमित नइ रहि जावय, बल्कि पूरा लोकतांत्रिक व्यवस्था के भरोसा ऊपर सवाल खड़े हो जाथे। आज देश म कथित वोट चोरी, मतदाता सूची म गड़बड़ी अउ चुनाव आयोग के कामकाज ला लेके जेन बहस चलत हे, वोला एही नजरिया ले देखे के जरूरत हे। विपक्षी दल के वरिष्ठ नेता मन ए मामला ला लेके राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ले भेंट करे हवंय। नौ अक्टूबर 2026 के भेंट के बाद विपक्षी नेता मन कहिन कि राष्ट्रपति ह उंखर बात ला सुने हवंय अउ कथित वोट चोरी के संबंध म सबूत मांगे हवंय। विपक्षी दल मन मुख्य निर्वाचन आयुक्त ज्ञानेश कुमार ला पद ले हटाय, मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण ला रोके अउ चुनावी व्यवस्था म सुधार करे के मांग घलो रखे हवंय। अब सवाल ये उठथे कि जब चुनाव प्रक्रिया के निष्पक्षता ऊपर एतका गंभीर सवाल उठत हे, तब एखर जवाबदेही कोन तय करही अउ जनता के मन म उठत संदेह ला दूर करे के जिम्मेदारी कोन निभाही?राष्ट्रपति देश के संवैधानिक मुखिया आयं। संविधान के मर्यादा, लोकतांत्रिक परंपरा अउ संवैधानिक संस्था मन के गरिमा के रक्षा करना देश के सर्वोच्च पद के महत्वपूर्ण जिम्मेदारी म गिने जाथे। जब विपक्षी दल के नेता मन राष्ट्रपति के आगू अपन बात रखथें, तब वोला खाली राजनीतिक विरोध के नजर ले देखना उचित नइ होही। विपक्ष के आरोप सही हें कि नइ, एखर फैसला बिना जांच अउ पुख्ता सबूत के नइ करे जा सकय। फेर आरोप लगइया मन ले सबूत मांगे के संगेसंग, जिहां जरूरी होवय, उहां निष्पक्ष जांच के रास्ता घलो खुला रहना चाही। काबर कि लोकतंत्र म आरोप लगाना एक बात आय, आरोप के जांच करना दूसर बात आय अउ जांच के निष्कर्ष के आधार म कार्रवाई करना तीसरी बात आय। ए तीनों प्रक्रिया ला कानून के मुताबिक पूरा करना जरूरी हे।विपक्ष के आरोप ला बिना जांच सही मान लेना जइसने गलत होही, वइसने आरोप ला राजनीतिक कहिके खारिज कर देना घलो लोकतंत्र के हित म नइ होही। राष्ट्रपति ह सबूत मांगे हवंय, त अब विपक्ष के जिम्मेदारी बनथे कि वो कथित गड़बड़ी के दस्तावेज, मतदाता सूची म बदलाव के जानकारी, प्रभावित मतदाता मन के विवरण अउ चुनावी प्रक्रिया म कथित अनियमितता के ठोस प्रमाण पेश करय। आरोप के गंभीरता सबूत के मजबूती ले तय होथे, आरोप लगइया के राजनीतिक कद ले नइ। अगर विपक्ष के हाथ म पुख्ता सबूत हें, त ओमन ला सार्वजनिक जांच अउ संवैधानिक कार्रवाई के रास्ता अपनाना चाही। अउ अगर आरोप के समर्थन म पर्याप्त सबूत नइ मिलय, त जनता के आगू स्थिति स्पष्ट करना घलो जरूरी हे। एखर ले लोकतंत्र म तथ्य के महत्त्व बढ़ही अउ राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप के धुंध छंटही।दूसरी ओर, मुख्य निर्वाचन आयुक्त ज्ञानेश कुमार के भूमिका ला लेके उठत सवाल मन ला घलो गंभीरता ले देखे के जरूरत हे। भारत निर्वाचन आयोग एक स्वतंत्र संवैधानिक संस्था आय, जेखर ऊपर लोकसभा, विधानसभा अउ राष्ट्रपति-उपराष्ट्रपति के चुनाव कराय के जिम्मेदारी हे। ए संस्था के काम सिरिफ चुनाव के तारीख घोषित करना अउ मतदान कराना नइ आय, बल्कि मतदाता के भरोसा बनाय रखना घलो आय। चुनाव आयोग के निष्पक्षता खाली निष्पक्ष होय ले नइ, बल्कि ओकर कामकाज म निष्पक्षता साफ दिखे ले घलो साबित होथे। जनता ला ये भरोसा होना चाही कि आयोग के फैसला कोनो राजनीतिक दल के फायदा या नुकसान ला देख के नइ, बल्कि संविधान अउ कानून के मुताबिक लिए जाथे।ज्ञानेश कुमार ला लेके विपक्षी दल मन जेन सवाल उठा रहे हें, ओमन के स्वतंत्र अउ निष्पक्ष जांच होना चाही। फेर ए बात ला घलो समझना जरूरी हे कि कोनो संवैधानिक पदाधिकारी ऊपर आरोप लग जाय भर ले ओला पद ले हटाय के फैसला नइ करे जा सकय। पद ले हटाय के एक संवैधानिक प्रक्रिया हे, जेमा तय नियम, आरोप के प्रकृति अउ जरूरी सबूत के महत्त्व होथे। मुख्य निर्वाचन आयुक्त ला हटाय के प्रक्रिया सामान्य सरकारी कर्मचारी या अधिकारी मन के प्रक्रिया ले अलग अउ कठिन रखे गे हे। ए व्यवस्था के मकसद चुनाव आयोग ला राजनीतिक दबाव ले बचाना आय। फेर सवाल ये घलो हे कि अगर कोनो संवैधानिक संस्था के मुखिया ऊपर लगातार गंभीर सवाल उठत रहय, त ओखर जवाबदेही तय करे के प्रभावी व्यवस्था कतेक पारदर्शी ढंग ले काम करथे?यही जगा जनता के मन म एक अउ सवाल उठथे कि विवाद बढ़े के बाद घलो मुख्य निर्वाचन आयुक्त ज्ञानेश कुमार ला पद ले नइ हटाय जाय के कारण का हे? का आरोप के समर्थन म पर्याप्त सबूत अभी तक सामने नइ आए हें? का संवैधानिक प्रक्रिया के तहत पद ले हटाय बर जरूरी शर्त पूरा नइ होवत हे? या फेर कानून म तय प्रक्रिया ए मामला म तत्काल कार्रवाई करे के अनुमति नइ देवत हे? ए सवाल मन के जवाब अनुमान लगाके नइ, बल्कि संविधान, कानून अउ उपलब्ध तथ्य के आधार म देना चाही। काबर कि बिना पुख्ता जानकारी के सरकार, राष्ट्रपति या निर्वाचन आयोग के मंशा ऊपर सीधा आरोप लगाना उचित नइ होही।भारत के संविधान के अनुच्छेद 324 चुनाव आयोग ला चुनाव के देखरेख, निर्देशन अउ नियंत्रण के जिम्मेदारी देथे। मुख्य निर्वाचन आयुक्त ला पद ले हटाय के संबंध म अनुच्छेद 324(5) म सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश ला हटाय बर निर्धारित प्रक्रिया जइसने संवैधानिक सुरक्षा के प्रावधान हे। एखर मतलब ये आय कि मुख्य निर्वाचन आयुक्त ला केवल राजनीतिक विरोध या इस्तीफा के मांग के आधार म पद ले नइ हटाय जा सकय। एखर बर संसद म निर्धारित प्रक्रिया अउ कानून म तय शर्त मन के पालन जरूरी हे। ए व्यवस्था के उद्देश्य पदाधिकारी ला सरकार के मनमानी ले बचाना आय, ताकि चुनाव आयोग स्वतंत्र रूप ले काम कर सकय। फेर स्वतंत्रता के मतलब जवाबदेही ले मुक्ति नइ होवय। संवैधानिक सुरक्षा के संग-संग पारदर्शिता, निष्पक्षता अउ जनता के भरोसा बनाय रखना घलो जरूरी हे।ए मामला म एक महत्वपूर्ण सवाल ये घलो आय कि राष्ट्रपति के भूमिका का हो सकथे? राष्ट्रपति संवैधानिक व्यवस्था के भीतर काम करथें। वो हर आरोप के आधार म सीधे कोनो पदाधिकारी ला पद ले हटाय के फैसला नइ कर सकंय। मुख्य निर्वाचन आयुक्त ला हटाय के मामला म संविधान के निर्धारित प्रक्रिया के पालन जरूरी हे। राष्ट्रपति के आगू विपक्ष अपन शिकायत रख सकथे, ज्ञापन सौंप सकथे अउ उपलब्ध सबूत प्रस्तुत कर सकथे। फेर कार्रवाई के रास्ता संवैधानिक प्रावधान मन के मुताबिक ही तय होही। एखर सेती राष्ट्रपति ह सबूत मांगे हवंय, त एला आरोप के सही साबित हो जाना नइ समझे जाना चाही। एखर मतलब ये हो सकथे कि मामला ला तथ्य के आधार म परखे के जरूरत हे।लोकतंत्र म विपक्ष के भूमिका घलो कम महत्त्वपूर्ण नइ आय। विपक्ष सरकार के कामकाज ऊपर सवाल उठाथे, जनता के समस्या ला सामने लाथे अउ संवैधानिक संस्था मन के कामकाज म कमी दिखे, त ओकर ध्यान खींचथे। फेर विपक्ष के जिम्मेदारी ये घलो आय कि ओखर आरोप तथ्य आधारित होवय अउ जनता के भरोसा ला मजबूत करे। वोट चोरी जइसन गंभीर आरोप लगाय के बाद सबूत पेश करना जरूरी हो जाथे। अगर विपक्ष के लगे प्रमाण हें, त ओमन ला संबंधित संवैधानिक संस्था अउ न्यायालय के सामने रखे जाना चाही। सड़क के आंदोलन जनता के ध्यान खींच सकथे, फेर अंतिम निष्कर्ष जांच, सबूत अउ कानून के आधार म ही निकलना चाही।एखर संग सरकार के जिम्मेदारी घलो तय होथे। सरकार ला ये कहिके अपन जिम्मेदारी ले बांचे के कोशिश नइ करना चाही कि चुनाव आयोग स्वतंत्र संस्था आय अउ सरकार के ओकर कामकाज म कोनो हस्तक्षेप नइ हे। संवैधानिक संस्था के स्वतंत्रता के सम्मान करना जरूरी हे, फेर जनता के मन म उठत सवाल के जवाब देना घलो लोकतांत्रिक जिम्मेदारी आय। अगर मतदाता सूची म नाम काटे जाय, नाम जोड़े जाय या विशेष गहन पुनरीक्षण के प्रक्रिया ला लेके शिकायत आवत हे, त संबंधित तथ्य सार्वजनिक करे के व्यवस्था होना चाही। मतदाता मन ला अपन नाम के स्थिति जांचे के सुविधा, शिकायत दर्ज करे के सरल तरीका अउ शिकायत के समयबद्ध निराकरण मिलना चाही। जेन मतदाता के नाम गलती ले कट गे हे, ओला कानून के मुताबिक सुधार के मौका मिलना चाही। एखर ले चुनाव प्रक्रिया ऊपर जनता के भरोसा मजबूत होही।चुनाव आयोग ला घलो अपन कामकाज म ए बात के ध्यान रखना चाही कि ओकर फैसला मन के कारण साफ-साफ जनता के सामने आवय। अगर कोनो राजनीतिक दल आयोग के निष्पक्षता ऊपर सवाल उठाथे, त आयोग तथ्य अउ दस्तावेज के आधार म जवाब दे सकथे। अगर आरोप गलत हें, त पारदर्शी जानकारी ले भ्रम दूर हो सकथे। अउ अगर कोनो प्रक्रिया म गलती सामने आवय, त ओला स्वीकार करके सुधार करना संस्था के कमजोरी नइ, बल्कि ओकर मजबूती के चिन्ह होही। संवैधानिक संस्था मन के गरिमा केवल अधिकार ले नइ बनय, बल्कि जिम्मेदारी निभाय के तरीका ले बनथे।आज जरूरत ए बात के हे कि देश के राजनीतिक दल मन वोट के सवाल ला केवल सत्ता हासिल करे के लड़ाई बनाय के बजाय लोकतंत्र के भरोसा बचाय के विषय मानंय। सत्ताधारी दल ला विपक्ष के हर सवाल ला राजनीति कहिके खारिज नइ करना चाही अउ विपक्ष ला घलो हर चुनावी हार या असहमति ला वोट चोरी के प्रमाण बताय ले बचना चाही। जनता के वोट के सम्मान तब्बे होही, जब हर मतदाता ला समान अधिकार मिलय, मतदाता सूची म गलती के सुधार होवय, चुनाव आयोग स्वतंत्र अउ निष्पक्ष दिखय अउ चुनावी विवाद के समाधान पारदर्शी तरीका ले होवय।राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ले विपक्षी नेता मन के भेंट ए बहस ला एक नवा मोड़ देय हे। अब सबले जरूरी बात ये आय कि विपक्ष अपन दावा के समर्थन म ठोस सबूत पेश करय, निर्वाचन आयोग आरोप मन के तथ्यात्मक जवाब देवय अउ जिहां जांच जरूरी होवय, उहां कानून के मुताबिक निष्पक्ष जांच होवय। ज्ञानेश कुमार ला पद ले हटाय के सवाल के फैसला राजनीतिक नारा या जनभावना के दबाव म नइ, बल्कि संविधान म निर्धारित प्रक्रिया अउ प्रमाण के आधार म होना चाही। ए मामला म दोष साबित होथे, त कानून के मुताबिक कार्रवाई होना चाही; अउ आरोप साबित नइ होवय, त स्थिति ला स्पष्ट करके जनता के संदेह दूर करना चाही।आखिर म सवाल ज्ञानेश कुमार के पद म बने रहना या हटना भर के नइ आय। असली सवाल ये आय कि का देश के हर नागरिक ला अपन वोट के ताकत ऊपर पूरा भरोसा हे? का हर राजनीतिक दल ला ये विश्वास हे कि चुनाव आयोग बिना भेदभाव के काम करत हे? अउ का चुनावी प्रक्रिया ऊपर उठत सवाल मन के जवाब तथ्य, पारदर्शिता अउ निष्पक्ष जांच के माध्यम ले मिलत हे? अगर ए सवाल मन के संतोषजनक जवाब नइ मिलय, त लोकतंत्र के भरोसा कमजोर होही। अउ अगर सबूत के आधार म निष्पक्ष जांच होथे, गलती मिलथे त सुधार होथे अउ दोष साबित होथे त कार्रवाई होथे, त लोकतंत्र अउ मजबूत होही। काबर कि लोकतंत्र के असली ताकत केवल चुनाव कराय म नइ, बल्कि हर नागरिक के ए भरोसा म बसे हे कि ओकर एक वोट के कीमत बराबर हे अउ ओकर अधिकार के रक्षा हर हालत म होही।
