छत्तीसगढ़

‘छत्तीसगढ़’ का संपादकीय : गांव-गांव में खुले विपन्न कॉलेजों से उच्च शिक्षा कभी उत्कृष्ट न होगी

छत्तीसगढ़ की खबर है कि राजधानी रायपुर में पांच हजार परीक्षार्थियों के बैठने लायक एक बड़ा परीक्षा केन्द्र बनाया जा रहा है जिसमें प्रतियोगी परीक्षाएं हो सकेंगी। आज जगह-जगह परीक्षा केन्द्र बनते हैं, कहीं पर स्कूलों के कुर्सी-टेबिल पर भी बड़े-बड़े परीक्षार्थियों को बैठना पड़ता है, और भी कई तरह की असुविधाएं होती हैं। बड़े परीक्षा केन्द्र का इंतजाम करना भी अधिक आसान होगा। लेकिन इसके साथ-साथ एक दूसरी खबर यह है कि प्रदेश में बहुत से ऐसे कॉलेज हैं जहां कोई दाखिला नहीं हुआ है, उससे भी अधिक कॉलेज ऐसे हैं जहां बहुत कम संख्या में, कुछ दर्जन छात्र-छात्राओं ने ही दाखिला लिया है। गांवों के कॉलेजों की हालत भी खराब है। गांव-शहर, कस्बे, कई जगहों पर सरकारी कॉलेज राजनीतिक घोषणा करने के लिए शुरू हो जाते हैं, और सरकारी स्कूलों की इमारतों में एक-दो कमरे खाली करवाकर कॉलेज शुरू कर दिया जाता है। पढ़ाने वाले प्राध्यापक और लडक़े-लड़कियां शौचालयों के लिए भी तरस जाते हैं। अब ऐसे में यह चर्चा भी हो रही है कि कॉलेज जहां पर पर्याप्त छात्र-छात्राओं को आकर्षित नहीं कर पा रहे, उन्हें किस तरह पास के किसी और कॉलेज में विलीन कर दिया जाए। स्कूलों को तो ऐसा किया जा चुका है, और उसकी वजह से शिक्षकों की जरूरत भी घट गई है, लेकिन कॉलेजों के बारे में एक तरफ तो जगह-जगह से नए खोलने की मांग होती है, और दूसरी तरफ अब उनके बंद होने की नौबत आ रही है। ऐसे में सरकार और समाज को यह सोचना चाहिए कि राजनीतिक वाहवाही के लिए लुभावनी घोषणा करते हुए बहुत छोटी जगहों पर कॉलेज खोलना क्या सचमुच ही नौजवान पीढ़ी का भला कर रहा है?

आज हालत यह है कि एक-दो नियमित सहायक प्राध्यापकों के साथ दर्जन भर अतिथि व्याख्याता तैनात करके कॉलेज खोल दिए जा रहे हैं। उनमें न विषयों को पढ़ाने का कोई ठिकाना है, और न ही अतिथि व्याख्याताओं के भरोसे किसी उत्कृष्टता का कोई काम हो सकता। इन सबसे परे एक और विचित्र बात उच्च शिक्षा में चल रही है, नई शिक्षा नीति के तहत इतने किस्म की गतिविधियां हर कॉलेज को करवानी है, और उनकी रिपोर्ट राज्य सरकार या केन्द्र सरकार को भेजनी है कि कॉलेज शिक्षकों का बहुत सा समय ऐसे कामों में ही लग जाता है। फिर कुछ विषयों के व्याख्याता या प्राध्यापक साल खत्म होने तक नहीं मिल पाते। जिन विषयों की पढ़ाई ही शुरू नहीं हुई है, उनके सेमेस्टर के इम्तिहान का वक्त आ जाता है। ऐसे में जिस सोच के चलते राजधानी में विशाल परीक्षा केन्द्र बनाने की योजना है, वैसी ही सोच से जिला मुख्यालयों पर ऐसे बड़े और सुविधा-संपन्न कॉलेज-हॉस्टल बनाने चाहिए जहां रहकर नई पीढ़ी ढंग की पढ़ाई कर सके। जहां लाइब्रेरी हो, प्रयोगशाला, खेल के मैदान हों, जहां पर्याप्त शिक्षक-प्रशिक्षक हों, और जहां थोड़ी-बहुत उत्कृष्टता की उम्मीद की जा सके। आज किसी स्कूल भवन के दो कमरों में अतिथि व्याख्याताओं के भरोसे चलते हुए कॉलेजों से किसी उत्कृष्टता की उम्मीद उनकी अतिसीमित क्षमता के साथ ज्यादती होगी।

आज हर संभाग में विश्वविद्यालय खुल गए हैं, क्योंकि किसी इलाके की आम जनता को संतुष्ट करने का यह एक अच्छा तरीका माना जाता है कि वहां विश्वविद्यालय खोल दिया जाए, और फिर किसी स्थानीय विभूति के नाम पर नामकरण करके किसी समुदाय के वोट पा लिए जाएं। आज एक तरफ तो ऑनलाईन काम बढ़ते चल रहा है, एक समय पूरे छत्तीसगढ़ में कुल एक विश्वविद्यालय था, तब विश्वविद्यालय की एक प्रशासनिक शाखा जगदलपुर में खोली गई थी, ताकि कागजी कामकाज के लिए छात्र-छात्राओं को उतनी दूर से न आना पड़े। लेकिन अब तो सारा काम ऑनलाईन हो सकता है, और कोई भी विश्वविद्यालय अगर किसी को व्यक्तिगत रूप से आने को कहे, तो उसका यही मतलब होगा कि विश्वविद्यालय निकम्मा है। अब ऐसा वक्त आ गया है कि विश्वविद्यालयों की संख्या में कम की जा सकती है, लेकिन वह एक अलोकप्रिय राजनीतिक फैसला होगा, और स्थानीय अस्मिता की भावनाओं को चोट भी पहुंचाएगा। इसलिए हम उस बारे में अभी कुछ नहीं कहते, लेकिन इतना जरूर कहते हैं कि प्रदेश में जिला मुख्यालय स्तर से नीचे के कॉलेज को महत्व देना बंद करना चाहिए। अगर उच्च शिक्षा में उत्कृष्टता लानी है, तो नौजवान छात्र-छात्राओं को जिला मुख्यालय में रहकर पढऩे की बेहतर सहूलियत देनी चाहिए, धीरे-धीरे गांवों के कॉलेज खुद ही बंद हो जाएंगे। आज भी शहरों के अच्छे-खासे कॉलेज से पढक़र निकलने वाले लोगों का भी कोई अच्छा भविष्य नहीं दिखता है। मौजूदा व्यवस्था में भी उत्कृष्टता बहुत बढ़ाने की जरूरत है, और आज जहां ढांचागत कमजोरियां हैं, उन पर और अधिक मेहनत करना बेकार है। उत्कृष्टता के केन्द्र गली-गली, गांव-गांव नहीं खोले जा सकते, उसके लिए चुनिंदा केन्द्रों को ही विकसित किया जा सकता है। पूरी दुनिया में उच्च शिक्षा का बीती कई सदियों का इतिहास देखें तो भी इतने बड़े-बड़े विश्वविद्यालय रहते थे कि उनमें कई देशों के छात्र-छात्राएं पढऩे के लिए आते थे। जो लोग अपने ही जिला मुख्यालय तक न जा सकें, उनके ऊपर सरकार को उच्च शिक्षा का पैसा बर्बाद करना भी नहीं चाहिए

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