‘छत्तीसगढ़’ का संपादकीय : सबको मालूम है भीतर के मेवे की हकीकत लेकिन, दिल के बहलाने को यह दिखावा पैकिंग अच्छी है

संपन्न या ताकतवर तबकों के बीच दीवाली के मौके पर तोहफों का आवागमन व्यस्त शहरों के ट्रैफिक सरीखा रहता है। किसी बंगले के बाहर कितनी गाडिय़ां रूक रही हैं, कितने लोग पैकेट लिए भीतर जा रहे हैं, इससे भी उस बंगले की ताकत पता लगती है, और किन बंगलों से गाडिय़ों में पैकेट भर-भरकर दूसरी जगहों के लिए रवाना किए जाते हैं, उससे भी पता लगता है कि उनका कितने बड़े-बड़े लोगों से वास्ता पड़ता है। यह तो दुनिया का रीति-रिवाज है, और अखबारों के संपादक दूसरों को चाहे दीवाली पर तोहफे न भेजें, उनके पास तो आते ही हैं, वे भी अपने अखबार के वजन के मुताबिक कम या अधिक महत्वपूर्ण व्यक्ति रहते हैं। अगली दीवाली ठीक से आई भी नहीं है, लेकिन संपन्न और ताकतवर इलाकों में घूरों पर तोहफों की पैकिंग के ढेर लगने लगे हैं, और गाडिय़ों में म्युनिसिपल के लिए कचरा उठाने वाले मजदूर-कर्मचारी उन्हें गाडिय़ों में लादने के पहले कुछ छंटाई भी कर लेते हैं कि शायद उनमें से कुछ तरह का कचरा बिक सके। हालांकि तोहफों के अधिक कचरे का सिलसिला सिर्फ अधिक संपन्न लोगों के बीच ही रहता है, मध्यम वर्ग और उसके नीचे के लोग अगर एक-दूसरे को कुछ देते भी हैं, तो वह बहुत ही मामूली पैकिंग में आता-जाता है।
अब जिस तरह फैशन के सामानों की पैकिंग अंधाधुंध रहती है, क्योंकि पैकिंग अपने आपमें लोगों को आकर्षित करती है, और संतुष्ट करती है कि उन्होंने सचमुच ही कुछ अच्छा सामान लिया है, ठीक उसी तरह भारी पैकिंग में पहुंचने वाले सामानों से भी कुछ लोगों को कुछ देर के लिए अच्छा लग सकता है कि उन्होंने कुछ अच्छा पाया है, लेकिन यह फील-गुड अहसास थोड़ी ही देर में गायब होने लगता है जब दो किलो के बक्से में से कांच की चार शीशियां कोई आधा-पौन किलो वजन की निकलती हैं, और उनके भीतर से पाव-डेढ़ पाव मेवा निकलता है। पैकिंग का वह बक्सा छाती पर बोझ बन जाता है क्योंकि खूबसूरत बक्से को आसानी से फेंका भी नहीं जा सकता, खाली शीशियों या प्लास्टिक डिब्बों का लंबे समय तक कोई अधिक इस्तेमाल भी नहीं रहता। ऐसे में त्यौहार के दो-चार दिन निकलने के बाद अधिकतर लोगों को यह समझ पड़ता है कि खाने वाले सामान की लागत इस पैकिंग के भीतर पैकिंग की एक चौथाई भी नहीं रहती। संपन्नता जितनी अधिक रहती है, बर्बादी उतनी ही अधिक होती है।
क्या किया जाए? समाज में शान-शौकत दिखाने के लिए आजकल अतिसंपन्न तबका शादी, उद्घाटन, गृहप्रवेश, या भूमिपूजन के कार्ड देने जाता है, तो वह कार्ड एक बक्से की तरह रहता है, और उसके भीतर कार्डतले मेवा-मिठाई भी भरे रहते हैं। उनमें भी वही अनुपात रहता है, कार्ड वाले बक्से की लागत का चौथाई हिस्सा भी खाने लायक चीजों पर खर्च नहीं होता, तीन चौथाई या उससे अधिक खर्च दिखावे का होता है। हमारा तजुर्बा है कि संपन्न और अतिसंपन्न तबकों में से कुछ ऐसे रहते हैं जो कि बिना औपचारिक रिश्तों वाले करीबी लोगों को जब दीवाली का तोहफा भेजते हैं, तो उसमें कम से कम पैकिंग में अधिक से अधिक सामान भेजते हैं, और मेवा-मिठाई का पैकिंग के साथ ऐसा अनुपात लोगों को सुहाता भी है। आजकल कम से कम एक तबका ऐसा हो गया है जो अंधाधुंध पैकिंग में जरा सा माल पाकर मन ही मन खौलने लगता है कि क्या इतने ही पैसों से सीधे-सीधे मेवे के पैकेट नहीं भेजे जा सकते थे?
दिखावे से परे यह भी सोचने की जरूरत है कि दीवाली जैसे बड़े त्यौहार के वक्त हिन्दुस्तान के तकरीबन पूरे ही हिस्से में मेवा-मिठाई, या दूसरे किस्म के तोहफों का जो आदान-प्रदान चलता है, वह पर्यावरण पर कितना बड़ा बोझ है? पैकिंग का कोई भी सामान धरती पर कार्बन बढ़ाए बिना तैयार नहीं होता। कागज हो, पुट्ठा या प्लास्टिक हो, उस पर तरह-तरह की रासायनिक स्याही हो, सिंथेटिक रिबिन हो, या जो कुछ भी हो, उन सबको बनाने में धरती पर प्रदूषण बढ़ता ही है। क्या त्यौहार ऐसे होने चाहिए कि घूरों पर इतना सारा गैरजरूरी कचरा बढ़ जाए? त्यौहारों पर नदियों और तालाबों में प्रतिमाओं और पूजन-सामग्री का प्रदूषण अंधाधुंध बढ़ जाए? इन सबके साथ कहीं दूध, कहीं घी, तो कहीं कोई और हवन-पूजन सामग्री पानी में विसर्जित की जाती है, और वह पानी के प्राणियों की मौत की वजह भी बनती है। तो क्या त्यौहार ऐसे रहने चाहिए? अभी पिछले कुछ हफ्तों में कुछ त्यौहारों के प्रतिमा-विसर्जन के ऐसे भयानक वीडियो सामने आए हैं जिनमें उथले पानी में चारों तरफ प्रतिमाओं के कंकाल पड़े हुए हैं, न वे डूब रहे हैं, न गल रहे हैं, और न ही उनका कोई इस्तेमाल ही किया जा सकता है। बड़ी प्रतिमाएं मिट्टी की बनना शायद मुश्किल रहता है, इसलिए वे सरकारी रोक-टोक के बावजूद प्लास्टर ऑफ पेरिस की बनाई जाती हैं, और पानी में घुलती ही नहीं। ठीक इसी तरह त्यौहारों के तोहफों की पैकिंग घूरों पर जाती है, लेकिन वह बाकी कचरे के साथ इस बुरी तरह मिल जाती है कि उसकी री-साइकिलिंग आसान नहीं रहती। वैसे भी अलग-अलग किस्म की, अलग-अलग सामग्री से बनी हुई पैकिंग से दुबारा कुछ बना पाना मुश्किल रहता है।



