छत्तीसगढ़

‘छत्तीसगढ़’ का संपादकीय : अपने लिए हवन करने वाला भारत आज ट्रम्प को सांप का सिर दिख रहा है?

छत्तीसगढ़ का संपादकीय : अपने लिए हवन करने वाला भारत आज ट्रम्प को सांप का सिर दिख रहा है?

अमरीका की कई अलग-अलग किस्म की ख़बरें हैं जो कि भारत के लिए फि़क्र की बात हैं। वहाँ राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रम्प वोटर लिस्ट की जांच करवा रहे हैं, जिसमें वहाँ बसे हुए 21 लाख भारतवंशी वोटरों में से करीब 10 फ़ीसदी के नाम वोटर लिस्ट से कट गए हैं। ट्रम्प ने अपने इस कार्यकाल में भारतवंशियों के खिलाफ वीजा, या वर्क परमिट जैसे कई मामलों में नुकसान पहुंचाने का काम किया है। नतीजा यह है कि भारत अमरीका के बीच काम करने वाले भारतीय कामगारों का वर्तमान और भविष्य दोनों डांवाडोल बने हुए हैं। इसके अलावा तरह-तरह के टैरिफ लगाकर ट्रंप ने भारत की हालत खराब की हुई है। भारत की अपनी अर्थव्यवस्था पर अभी अमरीकी टैरिफ का असर नहीं दिख रहा है, लेकिन एक देश की अर्थव्यवस्था से परे जब अलग-अलग कारोबारियों की अर्थव्यवस्था देखें जिनका कि अमरीका के साथ निर्यात का रिश्ता था, तो ऐसे बहुत से कारोबारियों का हालत खराब है, नतीजतन उनके मजदूरों और कामगारों की हालत भी खराब है। पिछले राष्ट्रपति चुनाव में भारतवंशी लोगों ने बहुमत से भारतवंशी राष्ट्रपति पद प्रत्याशी कमला हैरिस का साथ दिया था, और उस वक्त से ट्रंप ने भारतवंशियों के खिलाफ एक गांठ बांधकर रखी हुई थी। अब वोटर लिस्ट को लेकर जितने किस्म के तरीके अमरीका में इस्तेमाल हो रहे हैं, वे भारत में चुनाव आयोग के इस्तेमाल किए जा रहे नाजायज तरीकों को कड़ी टक्कर दे रहे हैं। अब इससे कुछ परे देखें, तो अमरीका में श्रम मंत्री ने कल ही भारत की कई बड़ी आईटी कंपनियों को कर्मचारियों को लेकर एक कार्यक्रम से निलंबित कर दिया है। ट्रंप सरकार ने भारतीय कंपनियों पर धोखाधड़ी का आरोप लगाया है। इनमें इंफोसिस, टाटा, विप्रो, एचसीएल जैसी कंपनियां है, जिन्हें अमरीका के स्थायी कामगार प्रमाणन कार्यक्रम से सस्पेंड कर दिया गया है। इन पर आरोप है कि ये अमरीकी कामगारों को काम देने के बजाय बाहर से सस्ते कामगार लाकर उन्हें काम पर लगा रही थीं। लेकिन श्रम मंत्री ने यह घोषणा करते हुए कहा कि आज राष्ट्रपति ट्रंप, उपराष्ट्रपति, और सरकार की ताकत से हम सांप के सिर को अलग कर रहे हैं। भारत में लोग अमरीकी श्रम मंत्री की इस भाषा को देखकर हक्का-बक्का हैं। भारत के बड़े-बड़े पत्रकार कह रहे हैं कि उन्हें यह याद नहीं पड़ता कि अमरीका में पिछली बार भारत से जुड़ी हुई किसी चीज को सांप का सिर कब कहा गया था?

भारत और अमरीका के बीच कारोबार करने वाले लोग इससे निराश हैं, क्योंकि इससे भारत के आईटी कारोबार, भारत की अर्थव्यवस्था, और भारत-अमरीका के बीच दोनों जगह बसे हुए लाखों परिवारों की जिंदगी पर फर्क पडऩे जा रहा है। ट्रंप बीते कम से कम एक साल में सौ बार से अधिक बार भारत को बेइज्जत कर चुका है। अब ट्रंप का मंत्री भारत को सांप की मुंडी कह रहा है, और उसे काटने की बात कर रहा है। यह नौबत बहुत ही खराब है, और भारत और अमरीका के बीच 1971 के बांग्लादेश निर्माण के बाद इतनी शर्मनाक नौबत बाद में और कभी आई हुई हमें याद नहीं पड़ती। उस वक्त भी पाकिस्तान से पूर्वी पाकिस्तान वाले हिस्से को दबंगई से फौजी कार्रवाई करके इंदिरा गांधी ने अलग करवा दिया था, और अमरीकी नौसेना के बेड़े के हिंद महासागर पहुंचने से भी वे डरी नहीं थीं, इसलिए अमरीका से रिश्ते कड़वे होने पर भी उसका बहुत बड़ा एक फायदा भारत को बांग्लादेश की शक्ल में मिला था। एक वक्त भारत ने परमाणु विस्फोट करके अमरीका की नाराजगी की कोई भी परवाह किए बिना अपनी ऐतिहासिक ताकत खड़ी की थी, और अमरीकी धमकियां आती-जाती रहीं, भारत ने उसकी परवाह नहीं की थी। लेकिन आज की वैश्विक स्थितियां बदली हुई हैं। आज भारत और अमरीका के रिश्ते ऐसा लगता है कि अमरीका के रहम-ओ-करम पर अधिक टिके हुए हैं। और तो और कल भारत में कारोबार करने के लिए बेताब और ऊतारू अमरीकी कारोबारी एलन मस्क ने भारत सरकार की शान के खिलाफ एक बहुत ही घटिया बात कही कि ऐसा लगता है कि भारत में अंबानी का राज है। इसके पहले किसी भी अमरीकी, या विदेशी कारोबारी की इतनी हिम्मत नहीं हुई थी कि वह भारत सरकार के खिलाफ ऐसी रद्दी बात कह सके। एलन मस्क को और कुछ नहीं, तो कम से कम इस बात का लिहाज तो करना था कि भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अपने अमरीका प्रवास के दौरान एलन मस्क के बच्चों के साथ खेलते हुए, उन्हें भारत से ले गए तोहफे देते हुए दिख रहे थे, और यह सरकारी बैठकों से परे एक बिल्कुल ही निजी स्तर का काम उन्होंने किया था। लेकिन जैसा बद्तमीज डॉनल्ड ट्रम्प है, वैसे का वैसा उसका भूतपूर्व, और शायद भावी भी, दोस्त एलन मस्क है, जो कि भारत में धंधा भी करना चाहता है, और भारत की शान के खिलाफ बकवास भी कर रहा है।

ऐसा भी नहीं कि भारत अमरीका का मोहताज होकर गिड़गिड़ाते हुए खड़ा है। वह ब्रिक्स देशों के संगठन में अपनी मौजूदगी दमदारी से दर्ज करा रहा है, और यह संगठन अमरीकी दादागिरी, और उसके एकाधिकार के खिलाफ अधिकतर अमरीका-विरोधी देशों का एक संगठन है जिसमें चीन, रूस, और ईरान जैसे देश हैं, जिसमें ब्राजील है, जिसे कि अमरीका तरह-तरह की धमकी देते आया है। अभी दो दिन पहले ही भारतीय विदेश मंत्री जयशंकर ने भारत और रूस के रिश्तों को लेकर एक बड़ी बात कही थी कि जब कोई भारत के साथ नहीं थे, उस वक्त भी रूस भारत के साथ खड़ा हुआ था। भारत का यह स्वतंत्र रुख ट्रम्प को कुछ अधिक ही आहत करते दिख रहा है, और इसीलिए उसे आज भारत सांप के सिर की तरह दिख रहा है जिसे वह अपनी पूरी ताकत से कुचलना चाहता है।

यह एक बड़ा मौका भारत के सामने है कि उसे अमरीकी गुंडई से बाहर निकलने के बारे में सोचना चाहिए, भारत के सामान, और यहां के कामगार, इन सबके लिए अमरीका से परे के देशों में बाजार ढूंढना चाहिए, और यह भी समझना चाहिए कि आज तो अमरीका के सबसे करीबी रहे हुए कनाडा, और योरप के दूसरे देश भी अमरीका से परे अपने भविष्य को न सिर्फ तलाश रहे हैं, बल्कि गढ़ भी रहे हैं। कोई आपका दोस्त देश तभी कहला सकता है जब वह आपको सांप न समझे। आज भारत में अमरीका से परे देखने के लिए, लुक बियॉन्ड यूएस पर अमल करना शुरू कर दिया दिखता है। भारत के निर्यात बाजार के लिए यह बहुत जरूरी था, और ट्रंप की बदमिजाजी और बदसलूकी की वजह से भारत इस विकल्प पर कुछ जल्दी पहुंच पाया है। भारत को अब बार-बार, अबकी बार ट्रम्प सरकार जैसे नारों से परे अपने खुद के भविष्य को देखना चाहिए। जिस ट्रम्प ने परमाणुशक्ति संपन्न भारत को कदम-कदम पर नीचा दिखाने में कोई कसर नहीं रखी, उस ताकतवर देश को अपनी ताकत का अहसास करना चाहिए, और अमरीका से परे कारोबार, सैनिक गठबंधन, हर मोर्चे पर विकल्प ढूंढने चाहिए। ब्रिक्स देशों के सम्मेलन में भारत और चीन के बीच का फासला घटा है, और यह बात ट्रम्प और अमरीका के लिए फिक्र की हो सकती है। लेकिन ट्रम्प जैसे बददिमाग तानाशाह के तजुर्बे के बाद अब दुनिया यह मानकर चलती है कि किसी को भी बेफिक्र और सर्वशक्तिमान बने रहने देने के बहुत से खतरे रहते हैं, और दुनिया को ऐसे खतरे से बचना चाहिए। भारत और चीन अगल-बगल के पड़ोसी हैं, कम से कम भारत की तो अधिकतर फौजी तैयारियां चीन को ध्यान में रखकर होती हैं, या फिर चीनी असर वाले पाकिस्तान को लेकर। आज पाकिस्तान से सीधे बेहतर रिश्तों का माहौल नहीं है, लेकिन भारत को चीन के साथ अपनी दुश्मनी तो घटानी चाहिए, और चीन को अमरीका के कुछ मायनों में विकल्प की तरह देखने की संभावना ढूंढनी चाहिए।

फिलहाल अमरीका अपनी बददिमागी में वहां काम कर रहे बहुत ही काबिल और हुनरमंद हिंदुस्तानियों से छुटकारा पाना चाहता है, भारतवंशी लोगों के काम छीनना चाहता है, इससे ये कामगार तो कहीं न कहीं काम पा लेंगे, खुद अमरीका की अर्थव्यवस्था इस चक्कर में जिस बुरी तरह चौपट होगी, उससे वह ट्रम्प के विसर्जन के बाद भी नहीं सुधर पाएगी। फिलहाल तो ट्रम्प का बाकी कार्यकाल भारतवंशियों को सांस थामकर गुजारना होगा।

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