छत्तीसगढ़

‘छत्तीसगढ़’ का संपादकीय : किसी देश-प्रदेश में फैलती, फलती-फूलती आस्था चिकित्सा किसकी असफलता बताती है?

सरकारी और निजी दोनों तरह के अस्पतालों में मरीजों के साथ होने वाली धोखाधड़ी की खबरों से अखबार पटे हुए हैं। यह भी तब है जब सरकार से भी इश्तहार मिलते हैं, और बड़े अस्पतालों से तो मिलते ही हैं। बड़े अस्पताल शायद सबसे बड़े विज्ञापनदाताओं के आधा दर्जन कारोबार में से एक होंगे, लेकिन उसके बाद भी सुप्रीम कोर्ट से लेकर केन्द्र सरकार तक, दवा कंपनियों से लेकर अस्पतालों में गैरजरूरी जांच, ऑपरेशन, और अंधाधुंध बिलिंग को लेकर इतना कुछ सामने आ रहा है कि इश्तहारी अखबारों को भी इन खबरों को छापना पड़ रहा है। इन दिनों दवा कंपनियों के फर्जी रेट को लेकर सुप्रीम कोर्ट भी हैरान है कि किस तरह छह सौ और सात सौ गुना (फीसदी नहीं, गुना), दाम पर अस्पताल दवाइयों की बिलिंग कर रहे हैं, और मनचाहे दाम छापकर कंपनियां बाजार में दवाएं उतार रही हैं। जब सारे तथ्य सुप्रीम कोर्ट के सामने आए तो जजों को समझ ही नहीं आया कि देश में यह चल क्या रहा है। लेकिन इलाज के अधिकतर इंतजाम देश में ऐसे हैं जो कि जजों को हैरान कर सकते हैं। हम तो राज्यों में भी इलाज के सरकारी इंतजाम में इतने बड़े-बड़े गड्ढे देखते हैं कि जिनमें जनता के टैक्स की पूरी ही रकम डूब जाती है, और वे आकाशगंगा के ब्लैकहोल की तरह सब कुछ समा लेते हैं।

केन्द्र और राज्य सरकारों ने गरीब और बाकी मरीजों के इलाज के लिए तरह-तरह की योजनाएं बनाई हुई हैं। सरकारी अस्पतालों में डॉक्टर और बाकी कर्मचारी इन योजनाओं में छेद ढूंढकर फर्जी इलाज दर्ज करते रहते हैं, और इन योजनाओं के तहत मिलने वाली प्रोत्साहन राशि को हर महीने लाखों तक ले जाते हैं। ऐसी मोटी नाजायज कमाई करने वाले सरकारी डॉक्टर और दूसरे कर्मचारियों के पकड़ाए जाने पर भी उन पर कोई कार्रवाई नहीं होती। हमने कुछ बरस पहले छत्तीसगढ़ में देखा है कि किस तरह सरकारी स्वास्थ्य बीमा योजना के कार्ड की रकम लूटने के लिए राजधानी रायपुर के दर्जनभर अस्पतालों में दलालों के माध्यम से गांव-गांव तक जाल बिछाया था, और वहां से नौजवान उम्र की महिलाओं को लाकर बिना जरूरत उनके गर्भाशय निकाले जा रहे थे, ताकि बीमा की रकम अस्पताल वसूल कर सके। इंसान की देह के साथ ऐसी खिलवाड़ धड़ल्ले से चली, और कई सर्जनों की डॉक्टरी पर रोक भी लगाई गई थी। लेकिन साल-छह महीने की रोक के बाद वे सब फिर कामकाज में लग गए, और गांवों से लाई गई भोली-भाली महिलाएं बिना जरूरत, बिना उम्र आए गर्भाशय खो बैठीं क्योंकि कुछ लोगों को उससे कमाई हो सकती थी।

देश में डॉक्टरी के धंधे का हाल यह है कि सरकार इलाज बीमा मुहैया न कराए, तो अधिकतर आबादी इलाज नहीं करा पाएगी। सरकारें अपने अस्पतालों को लगातार कमजोर करती चल रही हैं ताकि निजी अस्पतालों का कारोबार बढ़े, और धीरे-धीरे सरकारें अपने इलाज बीमा कार्ड से निजी अस्पतालों में भी इलाज की छूट देती जा रही हैं। यह पूरा सिलसिला इतना भयानक है कि एक बार कोई बीमार पड़े, तो सरकारी इलाज से गुजरते हुए उसका भरोसा पूरी सरकार पर से उठ जाने का ही अधिक आसार रहता है। अगर निजी अस्पताल में जाएं, तो सरकारी कार्ड रहने पर भी उसे लूटने का बड़ा खतरा अधिकतर अस्पतालों में रहता है। अगर निजी खर्च से इलाज करवाएं तो अस्पताल मामूली सी दवाइयों के सैकड़ों गुना अधिक दाम वसूलते हैं, और बाहर से दवाई खरीदकर लाने की छूट नहीं देते। एक पुरानी कहावत इस सिलसिले में याद आती है, जबरा मारे भी, और रोने भी न दे। निजी अस्पतालों में से बहुत सारे ऐसे रहते हैं जो गैरजरूरी जांच करवाते हैं, अगर मरीज का निजी स्वास्थ्य बीमा है, और उस पर मोटी रकम बाकी है, तो गैरजरूरी बड़े ऑपरेशन का खतरा भी बने रहता है। सरकार, बीमा कंपनी, या अपनी जेब, किसी से भी बड़े भुगतान की उम्मीद अगर रहती है, तो फिर छोटे इलाज होने की संभावना खत्म हो जाती है।

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