संपादक की कलम से….गरीब की थाली में अंधेरा, अमीरों के आंगन में दीपों की जगमगाहट! आखिर किसके लिए है दीपावली?त्योहारों की चमक-दमक के बीच भूख, महंगाई और आर्थिक असमानता का कड़वा सच; मंत्रियों, विधायकों, सांसदों और सरकारी दफ्तरों में बधाई देने वालों की भीड़, लेकिन मेहनतकश गरीब की सुध लेने वाला आखिर कौन?
तरुण कौशिक, संपादक सर्वव्यापी
दीपावली को रोशनी, खुशियों, समृद्धि और आपसी प्रेम का पर्व कहा जाता है। मान्यता है कि दीपावली का एक दीपक अंधकार को मिटाकर जीवन में उजाला लाता है, लेकिन आज के बदलते सामाजिक परिवेश में एक बड़ा सवाल खड़ा हो रहा है कि आखिर यह उजाला किसके जीवन में पहुंच रहा है? क्या दीपावली वास्तव में समाज के हर वर्ग का त्योहार रह गई है या फिर इसकी चमक-दमक अब आर्थिक रूप से संपन्न लोगों, रसूखदारों और सुविधाभोगी वर्ग तक सिमटती जा रही है? जिन घरों में मिठाइयों के डिब्बे सजते हैं, बाजारों में महंगे उपहारों की खरीदारी होती है, आतिशबाजी पर हजारों रुपये खर्च किए जाते हैं, उन्हीं शहरों और गांवों में ऐसे परिवार भी रहते हैं, जिनके घर में दो वक्त की रोटी जुटाना भी किसी चुनौती से कम नहीं है। उनके लिए दीपावली का अर्थ नए कपड़े, मिठाइयां और रोशनी नहीं, बल्कि रोज की मजदूरी, घर का राशन, बच्चों की जरूरतें और अगले दिन के भोजन की चिंता है।विडंबना देखिए कि एक ओर दीपावली के नाम पर बाजारों में खरीदारी की होड़ लगी है, दूसरी ओर गरीब और मेहनतकश परिवार महंगाई की मार से जूझ रहे हैं। रोज सुबह काम की तलाश में निकलने वाला मजदूर शाम को जब घर लौटता है तो उसकी सबसे बड़ी खुशी यही होती है कि आज परिवार के लिए भोजन का इंतजाम हो गया। वह भी चाहता है कि उसके बच्चे दीपावली पर नए कपड़े पहनें, घर में मिठाई आए, आंगन में दीये जलें और परिवार के चेहरे पर मुस्कान हो, लेकिन जब आमदनी सीमित हो और जरूरतें लगातार बढ़ती जाएं तो त्योहार की खुशियां भी बजट के हिसाब से तय करनी पड़ती हैं। जिस परिवार की पूरी कमाई भोजन, किराया, बिजली, शिक्षा और इलाज में समाप्त हो जाती हो, वह दीपावली के लिए अतिरिक्त खर्च आखिर कहां से लाए? ऐसे परिवारों के लिए त्योहार खुशियों से ज्यादा आर्थिक दबाव लेकर आता है।महंगाई ने इस स्थिति को और कठिन बना दिया है। खाद्य सामग्री से लेकर मिठाई, तेल, घी, फल, सब्जियां, कपड़े और घरेलू जरूरतों तक, हर वस्तु की कीमत आम आदमी की जेब पर बोझ डालती है। त्योहार आते ही बाजारों में मांग बढ़ती है और कई वस्तुओं के दाम भी आम उपभोक्ता की पहुंच से बाहर होने लगते हैं। सवाल यह है कि त्योहारों की आड़ में आम जनता की जेब पर अतिरिक्त बोझ डालने वालों पर प्रभावी निगरानी कौन रखेगा? क्या बाजार व्यवस्था केवल खरीदने की क्षमता रखने वालों के लिए है? क्या गरीब परिवारों को भी सम्मानपूर्वक त्योहार मनाने का अधिकार नहीं है? जब रोजमर्रा की जरूरतें ही मुश्किल से पूरी हो रही हों, तब दीपावली की अतिरिक्त महंगाई गरीब की खुशियों पर सीधा प्रहार करती है।इस पूरे सामाजिक परिदृश्य का एक दूसरा पहलू भी कम दिलचस्प नहीं है। दीपावली आते ही राजनीतिक गलियारों से लेकर सरकारी कार्यालयों तक बधाई और शुभकामनाओं का दौर तेज हो जाता है। मंत्रियों, विधायकों, सांसदों, जनप्रतिनिधियों और बड़े अधिकारियों के कार्यालयों में मिलने-जुलने वालों की आवाजाही बढ़ जाती है। कहीं फूलों के गुलदस्ते पहुंच रहे हैं, कहीं मिठाइयों के डिब्बे दिए जा रहे हैं, कहीं तस्वीरें खिंचवाई जा रही हैं तो कहीं सोशल मीडिया पर बधाई संदेशों की भरमार दिखाई दे रही है। सरकारी कार्यालयों में भी इन दिनों आम दिनों की तुलना में अलग ही रौनक नजर आती है। जनप्रतिनिधियों और अधिकारियों से मिलने वालों की भीड़ में पत्रकारों की उपस्थिति भी दिखाई देती है। यह दृश्य देखकर सहज ही सवाल उठता है कि आखिर त्योहारों पर इस तरह की औपचारिक मुलाकातों और शुभकामना दौर का उद्देश्य क्या है?निश्चित रूप से दीपावली पर किसी को शुभकामना देना, आपसी संबंधों को मजबूत करना और एक-दूसरे के सुख-दुख में शामिल होना गलत नहीं है। पत्रकार भी समाज का अभिन्न हिस्सा हैं। उन्हें भी अपने जनप्रतिनिधियों, प्रशासनिक अधिकारियों और परिचितों से मिलने तथा त्योहार की शुभकामनाएं देने का पूरा अधिकार है। लेकिन जब पत्रकारिता का मूल उद्देश्य जनहित के सवाल उठाना, सत्ता और प्रशासन को जवाबदेह बनाना तथा समाज के अंतिम व्यक्ति की आवाज बनना है, तब यह आत्ममंथन भी जरूरी हो जाता है कि कहीं त्योहारों की औपचारिकताएं पत्रकारिता के मूल दायित्व पर हावी तो नहीं हो रही हैं? कहीं सत्ता के गलियारों में बढ़ती आवाजाही के बीच गांव की पगडंडियों पर रहने वाले गरीब, मजदूर, किसान और आम नागरिक के सवाल पीछे तो नहीं छूट रहे हैं?पत्रकारिता केवल सत्ता के दरवाजों तक पहुंच बनाने का माध्यम नहीं है। पत्रकारिता का असली सम्मान किसी मंत्री, विधायक, सांसद या अधिकारी के साथ तस्वीर खिंचवाने में नहीं, बल्कि उस व्यक्ति की आवाज बनने में है, जिसकी आवाज सत्ता के गलियारों तक पहुंच ही नहीं पाती। एक पत्रकार की पहचान उसके संपर्कों से नहीं, बल्कि उसकी निष्पक्षता, निर्भीकता और जनसरोकारों के प्रति प्रतिबद्धता से होनी चाहिए। यदि किसी सरकारी कार्यालय में पत्रकारों का जमावड़ा है तो यह अपने आप में गलत नहीं है, लेकिन यह जरूर विचारणीय है कि क्या वही पत्रकार कभी उस मजदूर की झोपड़ी तक भी पहुंचते हैं, जहां दीपावली की रात दीया जलाने के लिए तेल खरीदने से पहले परिवार को कई बार सोचना पड़ता है? क्या उनकी कलम उस गरीब के दर्द को भी उतनी ही प्रमुखता देती है, जितनी प्रमुखता सत्ता और प्रभावशाली लोगों की तस्वीरों को मिलती है?यहां सवाल किसी एक पत्रकार, अधिकारी या जनप्रतिनिधि पर उंगली उठाने का नहीं, बल्कि पूरे सामाजिक और राजनीतिक परिवेश के आत्ममंथन का है। लोकतंत्र में पत्रकारिता, राजनीति और प्रशासन तीनों की अपनी-अपनी जिम्मेदारियां हैं। राजनीति का उद्देश्य जनसेवा होना चाहिए, प्रशासन का दायित्व आम नागरिक को सुविधाएं उपलब्ध कराना और पत्रकारिता का काम इन दोनों की जवाबदेही सुनिश्चित करना है। जब ये तीनों अपने मूल दायित्वों से भटकते हैं तो सबसे अधिक नुकसान समाज के उस वर्ग को होता है, जिसके पास न तो अपनी बात प्रभावशाली तरीके से रखने का साधन है और न ही अपनी समस्याओं का समाधान कराने के लिए किसी बड़े दरवाजे तक पहुंचने की ताकत।मंत्रियों, विधायकों और सांसदों के लिए भी दीपावली केवल शुभकामना संदेशों और औपचारिक मुलाकातों का अवसर नहीं होना चाहिए। यह उनके लिए अपने क्षेत्र की वास्तविक स्थिति जानने का समय भी होना चाहिए। उन्हें यह देखना चाहिए कि कितने परिवार ऐसे हैं जिनके घरों में आर्थिक तंगी के कारण त्योहार की खुशियां नहीं पहुंच पातीं। कितने मजदूरों को समय पर मजदूरी नहीं मिलती, कितने किसान कर्ज और लागत के दबाव में हैं, कितने गरीब परिवार बच्चों की शिक्षा और भोजन के बीच संतुलन बनाने को मजबूर हैं। यदि जनप्रतिनिधि वास्तव में जनता के सेवक हैं तो उनकी दीपावली की सार्थकता बड़े-बड़े आयोजनों में नहीं, बल्कि जरूरतमंद परिवारों के जीवन में थोड़ी राहत पहुंचाने में दिखाई देनी चाहिए।इसी तरह सरकारी अधिकारियों के लिए भी त्योहारों का अवसर जनसेवा की संवेदनशीलता को परखने का समय होना चाहिए। सरकारी दफ्तरों में फूलों और मिठाइयों के साथ शुभकामनाएं देने वालों का स्वागत हो, इसमें कोई आपत्ति नहीं, लेकिन उन लोगों की समस्याओं को भी प्राथमिकता मिलनी चाहिए जो महीनों से अपने काम के लिए कार्यालयों के चक्कर लगा रहे हैं। किसी गरीब की पेंशन अटकी हो, किसी मजदूर का भुगतान लंबित हो, किसी किसान को सरकारी योजना का लाभ न मिला हो या किसी जरूरतमंद परिवार को राशन संबंधी परेशानी हो तो क्या दीपावली की शुभकामनाओं से पहले इन समस्याओं का समाधान अधिक महत्वपूर्ण नहीं है?समाज को यह भी समझना होगा कि त्योहारों की वास्तविक सुंदरता दिखावे और खर्च में नहीं, बल्कि संवेदना और सहभागिता में होती है। किसी जरूरतमंद परिवार को राशन उपलब्ध कराना, किसी गरीब बच्चे को कपड़े देना, किसी बुजुर्ग के घर में दीपक जलाना, किसी मजदूर के परिवार के साथ मिठाई बांटना और किसी बेसहारा व्यक्ति के चेहरे पर मुस्कान लाना ही दीपावली की असली सार्थकता है। हजारों रुपये की आतिशबाजी कुछ क्षणों के लिए आसमान को रोशन कर सकती है, लेकिन किसी भूखे परिवार के लिए भोजन की व्यवस्था उसके जीवन में लंबे समय तक याद रहने वाली रोशनी बन सकती है।आज आवश्यकता इस बात की है कि हम दीपावली को केवल बाजार और उपभोग का पर्व न बनाएं, बल्कि इसे सामाजिक समानता, मानवीय संवेदना और जरूरतमंदों की सहायता का अवसर बनाएं। त्योहारों की खुशी तभी संपूर्ण मानी जा सकती है, जब समाज का अंतिम व्यक्ति भी उसमें सहभागी बन सके। यदि किसी शहर के बड़े-बड़े घरों में हजारों दीपक जल रहे हों और उसी शहर की किसी झोपड़ी में भूख के कारण चूल्हा न जल पाए तो हमें अपनी सामाजिक व्यवस्था पर गंभीरता से विचार करना चाहिए।अंततः सवाल फिर वही है कि दीपावली किसके लिए है? क्या केवल उनके लिए जिनके पास महंगी मिठाइयां खरीदने, महंगे कपड़े पहनने और बड़े-बड़े आयोजन करने की क्षमता है? या उन गरीब परिवारों के लिए भी, जो दिनभर पसीना बहाकर समाज की अर्थव्यवस्था को गति देते हैं, लेकिन त्योहार आने पर अपनी जरूरतों में कटौती करने को मजबूर हो जाते हैं? क्या दीपावली केवल मंत्रियों, विधायकों, सांसदों, अधिकारियों और प्रभावशाली लोगों के कार्यालयों में शुभकामनाओं की भीड़ तक सीमित रह जाएगी, या इसकी रोशनी उन घरों तक भी पहुंचेगी जहां जीवन की सबसे बड़ी लड़ाई दो वक्त की रोटी के लिए लड़ी जा रही है?दीपावली पर दीये तो हर घर में जलने चाहिए, लेकिन उससे पहले समाज के भीतर संवेदना का दीपक जलना जरूरी है। क्योंकि जिस त्योहार की रोशनी गरीब की आंखों में खुशी न ला सके, जिस पर्व में भूखे परिवार की थाली खाली रह जाए और जिस उत्सव में मेहनतकश इंसान अपनी ही खुशियों से वंचित रह जाए, उस उत्सव की चमक पर सवाल उठना स्वाभाविक है। याद रखिए, दीपावली की असली रोशनी महंगे झालरों और आतिशबाजी में नहीं, बल्कि किसी गरीब के घर में जलने वाले उस छोटे से दीपक में है, जो उसे यह भरोसा दिलाए कि समाज में आज भी इंसानियत जिंदा है।

