संपादक की कलम से…*पद आते-जाते रहते हैं, पर कद हमेशा कायम रहता है!*कुर्सी का अहंकार नहीं, व्यक्तित्व की विनम्रता ही इंसान की असली पहचान है.
तरुण कौशिक, संपादक सर्वव्यापी
सत्ता, पद और प्रतिष्ठा जीवन के ऐसे पड़ाव हैं, जो समय के साथ बदलते रहते हैं। आज जो व्यक्ति किसी ऊंचे पद पर बैठा है, कल वह उस पद से विदा भी हो सकता है। आज जिसके एक आदेश पर पूरा प्रशासन सक्रिय हो जाता है, कल उसी व्यक्ति को सामान्य नागरिक की तरह अपनी बात रखने के लिए प्रतीक्षा करनी पड़ सकती है। यही जीवन का शाश्वत सत्य है। इसलिए कहा जाता है कि पद आते-जाते रहते हैं, लेकिन व्यक्ति का कद उसके व्यवहार, विचार, संस्कार और कर्मों से तय होता है।छत्तीसगढ़ में इन दिनों पद, प्रतिष्ठा और अधिकारों को लेकर अफसरशाही तथा जनप्रतिनिधियों के एक वर्ग के व्यवहार पर गंभीर सवाल उठने लगे हैं। ऐसा प्रतीत होता है कि कुछ लोगों के लिए पद अब जनसेवा और जनकल्याण का माध्यम न रहकर अपनी श्रेष्ठता प्रदर्शित करने का साधन बनता जा रहा है। कुर्सी मिलते ही व्यवहार में बदलाव, बातचीत में अहंकार, आम नागरिकों से दूरी और अपने अधिकारों का जरूरत से ज्यादा प्रदर्शन जैसी प्रवृत्तियां लोकतांत्रिक व्यवस्था की मूल भावना के अनुकूल नहीं हैं। हालांकि यह स्थिति सभी अधिकारियों और जनप्रतिनिधियों पर लागू नहीं होती, लेकिन जहां भी ऐसी प्रवृत्तियां दिखाई देती हैं, वहां आत्ममंथन की आवश्यकता अवश्य है।कुर्सी बड़ी हो सकती है, व्यक्ति नहीं!लोकतंत्र में किसी अधिकारी को प्रशासनिक जिम्मेदारी इसलिए दी जाती है, ताकि वह कानून के अनुसार व्यवस्था संचालित करे, जनता की समस्याओं का समाधान करे और शासन की योजनाओं को अंतिम व्यक्ति तक पहुंचाए। इसी प्रकार जनप्रतिनिधियों को जनता अपने विश्वास और उम्मीदों के साथ चुनकर विधानसभा, संसद अथवा अन्य लोकतांत्रिक संस्थाओं तक पहुंचाती है। दोनों की भूमिका अलग-अलग हो सकती है, लेकिन दोनों का मूल उद्देश्य जनहित ही है।विडंबना तब पैदा होती है, जब जिम्मेदारी को अधिकार समझ लिया जाता है और अधिकार को अहंकार में बदल दिया जाता है। पद मिलते ही कुछ लोगों की भाषा बदल जाती है, व्यवहार बदल जाता है और पुराने परिचितों से लेकर आम नागरिकों तक के प्रति उनका नजरिया बदलने लगता है। मानो कुर्सी पर बैठते ही वे स्वयं को दूसरों से अधिक महत्वपूर्ण समझने लगे हों।लेकिन सवाल यह है कि आखिर पद की वास्तविक ताकत क्या है? क्या किसी सरकारी पद पर बैठ जाने से व्यक्ति के संस्कार बदल जाते हैं? क्या किसी संवैधानिक जिम्मेदारी को प्राप्त कर लेने से व्यक्ति समाज से बड़ा हो जाता है? क्या किसी जनप्रतिनिधि की राजनीतिक हैसियत उसे जनता के प्रति जवाबदेही से मुक्त कर देती है?इन सवालों का जवाब स्पष्ट है। पद किसी व्यक्ति को जिम्मेदारी देता है, लेकिन उसका वास्तविक कद उसके आचरण से निर्धारित होता है।अफसरशाही में विनम्रता की जरूरतप्रशासनिक व्यवस्था किसी भी राज्य की रीढ़ होती है। अधिकारियों के निर्णयों से विकास योजनाओं की दिशा तय होती है, सरकारी सेवाओं का संचालन होता है और आम जनता को न्याय तथा सुविधाएं उपलब्ध कराने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई जाती है। ऐसे में अधिकारियों का संवेदनशील, जवाबदेह और विनम्र होना केवल व्यक्तिगत गुण नहीं, बल्कि प्रशासनिक दायित्व का भी महत्वपूर्ण हिस्सा है।यदि कोई आम नागरिक अपनी समस्या लेकर सरकारी कार्यालय पहुंचता है, तो वह किसी अधिकारी पर एहसान मांगने नहीं आता। वह अपने अधिकार, अपनी समस्या और अपनी उम्मीद लेकर आता है। उसकी बात सुनना, उचित मार्गदर्शन देना और नियमानुसार समाधान की पहल करना प्रशासनिक जिम्मेदारी है।किसी अधिकारी की योग्यता का प्रमाण उसके कार्यालय के बाहर खड़ी गाड़ियों की कतार, उसके कक्ष की भव्यता या उसके अधीनस्थ कर्मचारियों की संख्या नहीं है। उसकी असली पहचान इस बात से होती है कि उसके कार्यकाल में आम आदमी को कितनी राहत मिली, गरीब और कमजोर व्यक्ति की कितनी सुनवाई हुई तथा सरकारी व्यवस्था पर जनता का विश्वास कितना मजबूत हुआ।एक संवेदनशील अधिकारी अपनी कार्यशैली से सम्मान अर्जित करता है, जबकि अहंकारी अधिकारी अपने व्यवहार से लोगों के मन में दूरी पैदा करता है। पद की शक्ति से भय पैदा किया जा सकता है, लेकिन सम्मान केवल अच्छे आचरण से ही अर्जित किया जा सकता है।जनप्रतिनिधियों को भी समझना होगा जनता का विश्वासराजनीति का उद्देश्य केवल चुनाव जीतना, सत्ता प्राप्त करना और पद हासिल करना नहीं है। राजनीति का वास्तविक अर्थ समाज की समस्याओं को समझना, जनता की आवाज बनना और जनहित में निर्णय लेने के लिए संघर्ष करना है।जब कोई जनप्रतिनिधि चुनाव के दौरान जनता के बीच जाकर हाथ जोड़ता है, लोगों से समर्थन मांगता है और उनकी समस्याओं के समाधान का आश्वासन देता है, तब वह लोकतंत्र की शक्ति को स्वीकार करता है। लेकिन चुनाव जीतने के बाद यदि वही जनप्रतिनिधि जनता से दूरी बनाने लगे, अपने पद का अहंकार दिखाने लगे अथवा आम लोगों को तुच्छ समझने लगे, तो यह केवल उसके व्यवहार की समस्या नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक मूल्यों के प्रति उसकी जिम्मेदारी पर भी प्रश्नचिह्न है।जनता किसी व्यक्ति को इसलिए अपना प्रतिनिधि नहीं चुनती कि वह सत्ता में पहुंचकर दूसरों पर अपना प्रभाव जमाए। जनता उसे इसलिए चुनती है, ताकि वह उनकी समस्याओं को सदन, सरकार और प्रशासन के सामने मजबूती से उठा सके।राजनीति में पद स्थायी नहीं होता। जनता का विश्वास भी बिना शर्त हमेशा के लिए किसी के पास सुरक्षित नहीं रहता। चुनाव में मिला जनादेश एक जिम्मेदारी है, व्यक्तिगत श्रेष्ठता का प्रमाणपत्र नहीं।जो जनप्रतिनिधि जनता के बीच रहकर उसकी पीड़ा को समझता है, वही राजनीतिक जीवन में अपनी अलग पहचान बनाता है। इसके विपरीत, जो व्यक्ति पद मिलने के बाद जनता को ही भूल जाता है, उसे समय आने पर जनता के फैसले का सामना भी करना पड़ सकता है।इतिहास गवाह है, अहंकार का अंत पतन में होता हैइतिहास में ऐसे अनेक उदाहरण मिलते हैं, जब शक्तिशाली पदों पर बैठे व्यक्तियों ने अपने अधिकारों को स्थायी मान लिया। उन्हें लगा कि उनकी सत्ता, प्रतिष्ठा और प्रभाव कभी समाप्त नहीं होंगे। लेकिन समय ने बार-बार यह साबित किया कि कोई भी पद, कोई भी कुर्सी और कोई भी सत्ता हमेशा के लिए नहीं होती।समय बदलता है, परिस्थितियां बदलती हैं और जिम्मेदारियां भी बदल जाती हैं। जो व्यक्ति कभी निर्णय लेने की सर्वोच्च स्थिति में होता है, वह एक दिन स्वयं दूसरों के निर्णयों के दायरे में आ सकता है। यही जीवन का चक्र है।इसलिए समझदार व्यक्ति पद मिलने पर विनम्र होता है, क्योंकि वह जानता है कि यह अवसर स्थायी नहीं है। वह अपने व्यवहार को बेहतर बनाता है, क्योंकि उसे मालूम होता है कि पद से मिलने वाली पहचान अस्थायी है, लेकिन कर्मों से बनने वाली छवि लंबे समय तक लोगों की स्मृतियों में बनी रहती है।अहंकार व्यक्ति को यह विश्वास दिलाता है कि उसके बिना व्यवस्था नहीं चल सकती। जबकि वास्तविकता यह है कि व्यवस्थाएं व्यक्तियों से बड़ी होती हैं। सरकारें बदलती हैं, अधिकारी सेवानिवृत्त होते हैं, जनप्रतिनिधियों के कार्यकाल समाप्त होते हैं और कुर्सियों पर नए लोग बैठते हैं। व्यवस्था चलती रहती है, लेकिन किसी व्यक्ति ने अपने कार्यकाल में समाज के लिए क्या किया, इसका मूल्यांकन उसके जाने के बाद भी होता रहता है।सम्मान मांगने से नहीं, व्यवहार से मिलता हैआज आवश्यकता इस बात की है कि छत्तीसगढ़ में सार्वजनिक जीवन से जुड़े प्रत्येक व्यक्ति को अपने आचरण का मूल्यांकन करना चाहिए। अधिकारी हों या जनप्रतिनिधि, सभी को यह समझना होगा कि पद की गरिमा बनाए रखने और पद का अहंकार दिखाने में बहुत बड़ा अंतर है।गरिमा का अर्थ है अपने दायित्वों का ईमानदारी से निर्वहन करना, कानून का सम्मान करना, जनता के प्रति जवाबदेह रहना और संस्थाओं की मर्यादा बनाए रखना। इसके विपरीत, पद के नाम पर दूसरों को अपमानित करना, अपनी शक्ति का अनावश्यक प्रदर्शन करना और स्वयं को सामान्य लोगों से श्रेष्ठ समझना अहंकार का लक्षण है।विनम्रता कमजोरी नहीं है। किसी की बात ध्यान से सुनना, असहमति का सम्मान करना, अपनी गलती स्वीकार करना और जरूरतमंद व्यक्ति की सहायता करना किसी बड़े पद की प्रतिष्ठा कम नहीं करता, बल्कि उसे और अधिक विश्वसनीय बनाता है।किसी अधिकारी का वास्तविक सम्मान उसके पदनाम से नहीं, बल्कि उसके निष्पक्ष निर्णयों से होता है। किसी जनप्रतिनिधि का वास्तविक कद उसके काफिले से नहीं, बल्कि जनता के बीच उसकी स्वीकार्यता से तय होता है। इसी प्रकार किसी व्यक्ति की महानता उसके आसपास मौजूद लोगों की संख्या से नहीं, बल्कि संकट के समय उसके साथ खड़े रहने वाले लोगों के विश्वास से मापी जाती है।अंत में…छत्तीसगढ़ की सामाजिक और राजनीतिक संस्कृति में सरलता, आत्मीयता और आपसी सम्मान की परंपरा को मजबूत बनाए रखना आवश्यक है। यहां की पहचान केवल प्राकृतिक संपदा, विकास योजनाओं और राजनीतिक गतिविधियों से नहीं, बल्कि यहां के लोगों के व्यवहार, संस्कार और सामाजिक संबंधों से भी बनती है।यदि पद पर बैठे लोग ही अहंकार को प्रतिष्ठा समझने लगेंगे, तो आम नागरिकों और व्यवस्था के बीच दूरी बढ़ेगी। इसके विपरीत, यदि अधिकारी अपनी जिम्मेदारियों को सेवा का माध्यम मानें और जनप्रतिनिधि जनता के विश्वास को सर्वोच्च प्राथमिकता दें, तो शासन व्यवस्था अधिक संवेदनशील और प्रभावी बन सकती है।हर अधिकारी को याद रखना चाहिए कि उसकी कलम से निकला आदेश किसी नागरिक के जीवन को प्रभावित कर सकता है। हर जनप्रतिनिधि को याद रखना चाहिए कि उसकी कुर्सी जनता के विश्वास से मिली है। दोनों को यह भी समझना होगा कि आज जो लोग सम्मानपूर्वक उन्हें सलाम कर रहे हैं, उनका सम्मान पद से अधिक व्यक्ति के व्यवहार के प्रति भी हो सकता है।कुर्सी पर बैठकर बड़ा दिखना आसान है, लेकिन कुर्सी से उतरने के बाद भी लोगों के दिलों में बड़ा बने रहना ही वास्तविक उपलब्धि है।इसलिए समय रहते आत्ममंथन जरूरी है। पद को अपनी पहचान मत बनाइए, बल्कि अपने व्यक्तित्व को ऐसा बनाइए कि पद की पहचान आपसे हो। अधिकारों का प्रदर्शन करने के बजाय जिम्मेदारियों का निर्वहन कीजिए। लोगों से सम्मान की अपेक्षा करने से पहले स्वयं दूसरों को सम्मान देना सीखिए।क्योंकि अंततः इतिहास यह नहीं पूछता कि कोई व्यक्ति कितने वर्षों तक किस कुर्सी पर बैठा रहा। इतिहास यह याद रखता है कि उस व्यक्ति ने अपने पद, अधिकार और अवसरों का उपयोग समाज के लिए कितना किया।याद रखिए, पद आज है, कल नहीं भी हो सकता; लेकिन आपका व्यवहार, आपके कर्म और आपकी बनाई हुई पहचान लंबे समय तक आपके साथ चलते हैं। पद आते-जाते रहते हैं, पर कद हमेशा कायम रहता है!


