सर्बिया में बेचेहरा, बिन-नेता छात्र आंदोलन की ऐतिहासिक जीत, लंबे वक्त से सत्तारूढ़ पार्टी बाहर

भ्रष्टाचार के खिलाफ करीब 2 साल से चल रहे आंदोलन को मिला जनादेश, निवर्तमान राष्ट्रपति की पार्टी को करारी शिकस्त
छत्तीसगढ़ एआई न्यूज डेस्क
बेलग्रेड, 27 अक्टूबर। यूरोप के बाल्कन क्षेत्र के देश सर्बिया में छात्र आंदोलन के समर्थन से चुनाव मैदान में उतरे उम्मीदवारों ने संसदीय चुनाव में ऐतिहासिक जीत हासिल की है। करीब 2 साल से भ्रष्टाचार और सरकार की कार्यशैली के खिलाफ चल रहे आंदोलन ने लंबे समय से देश की राजनीति पर हावी राष्ट्रपति अलेक्जेंडर वुचिच और उनकी सर्बियन प्रोग्रेसिव पार्टी के गठबंधन को सत्ता से बाहर कर दिया है। चुनाव में हार स्वीकार करते हुए वुचिच ने कहा कि उनकी पार्टी यह चुनाव हार गई है। इस नतीजे को सर्बिया की राजनीति में एक बड़े बदलाव के रूप में देखा जा रहा है।
लगभग 99 प्रतिशत मतों की गिनती के बाद उपलब्ध शुरुआती आंकड़ों के मुताबिक, छात्र आंदोलन समर्थित उम्मीदवारों की सूची को 52.7 प्रतिशत मत मिले हैं और उसे 250 सदस्यीय संसद में करीब 139 सीटें मिलने का अनुमान है। इसके मुकाबले वुचिच की सर्बियन प्रोग्रेसिव पार्टी के नेतृत्व वाले गठबंधन को 39.2 प्रतिशत मत और लगभग 97 सीटें मिलने की संभावना है। अंतिम परिणामों के बाद सीटों की संख्या में बदलाव हो सकता है। चुनाव में मतदान का स्तर भी ऊंचा रहा। नतीजे सामने आने के बाद राजधानी बेलग्रेड समेत कई शहरों में लोगों ने सडक़ों पर उतरकर जीत का जश्न मनाया।
इस आंदोलन की सबसे अनोखी बात यह है कि इसके पीछे कोई एक चेहरा या सर्वमान्य नेता नहीं है। ये छात्र अपनी पहचान को लेकर इतने सतर्क हैं कि कई लोग मीडिया को इंटरव्यू देते समय अपना पूरा नाम तक नहीं बताते। बीबीसी की रिपोर्टों में भी इस बात का उल्लेख है कि पत्रकारों को आंदोलन से जुड़े छात्रों से बातचीत तो हो सकी, लेकिन उन्होंने अपने पारिवारिक नाम उजागर नहीं किए। आंदोलन का संचालन किसी एक केंद्रीय नेतृत्व के बजाय विश्वविद्यालयों की छात्र सभाओं और सामूहिक निर्णयों के जरिए हुआ। छात्रों ने खुद चुनाव लडऩे के बजाय डॉक्टरों, शिक्षाविदों, वकीलों, कलाकारों और अन्य क्षेत्रों की ऐसी हस्तियों को उम्मीदवार बनाया, जिन्हें वे अपेक्षाकृत निष्कलंक मानते थे। इस तरह यह आंदोलन किसी नेता के इर्द-गिर्द जुटी भीड़ नहीं, बल्कि एक विकेंद्रीकृत जन-राजनीतिक प्रयोग बन गया, और अब उसकी चुनावी जीत के बाद भी यही सवाल कायम है कि बिना किसी स्थापित नेता के यह सरकार कैसे चलाएगा।
बीबीसी के पॉडकास्ट में एक छात्र ने आंदोलन की ताकत बताते हुए कहा कि उनकी सबसे बड़ी उपलब्धि अपने बीच नेताओं को खड़ा करना नहीं, बल्कि नेताओं की जरूरत से आगे निकल जाना थी।
रेलवे स्टेशन हादसे से शुरू हुआ आंदोलन
सर्बिया में छात्र आंदोलन की शुरुआत नवंबर 2024 में नोवी साद शहर के रेलवे स्टेशन पर एक छतरीदार ढांचे के ढहने की घटना के बाद हुई थी। इस हादसे में 16 लोगों की मौत हो गई थी। स्टेशन का हाल ही में नवीनीकरण किया गया था। हादसे के बाद निर्माण कार्यों में भ्रष्टाचार, सरकारी निगरानी की विफलता और जिम्मेदार लोगों के खिलाफ कार्रवाई न होने के आरोप लगे। छात्रों ने घटना से जुड़े दस्तावेज सार्वजनिक करने, दोषियों पर कार्रवाई करने और सरकारी संस्थाओं में जवाबदेही सुनिश्चित करने की मांग की।
धीरे-धीरे यह आंदोलन विश्वविद्यालयों से निकलकर देशव्यापी विरोध में बदल गया। शिक्षकों, किसानों, पेशेवरों और आम नागरिकों ने भी इसका समर्थन किया। प्रदर्शनकारियों का आरोप था कि सरकारी तंत्र में भ्रष्टाचार और राजनीतिक हस्तक्षेप के कारण जवाबदेही कमजोर हो गई है। सरकार और वुचिच की पार्टी ने भ्रष्टाचार तथा दमन के आरोपों को खारिज किया था।
इसके बावजूद आंदोलन जारी रहा और अंतत: छात्रों ने समय से पहले संसदीय चुनाव कराने की मांग को राजनीतिक चुनौती में बदल दिया।
कौन हैं अलेक्जेंडर वुचिच?
अलेक्जेंडर वुचिच सर्बिया की राजनीति के सबसे प्रभावशाली नेताओं में रहे हैं। वे 2014 में प्रधानमंत्री बने और 2017 में राष्ट्रपति का पद संभाला। उनकी सर्बियन प्रोग्रेसिव पार्टी और उसके सहयोगी दलों का एक दशक से अधिक समय तक देश की राजनीति पर दबदबा रहा। उनके समर्थक उन्हें स्थिरता और आर्थिक विकास का पक्षधर बताते हैं, जबकि आलोचक उन पर सत्ता के केंद्रीकरण, स्वतंत्र मीडिया पर दबाव और लोकतांत्रिक संस्थाओं को कमजोर करने के आरोप लगाते रहे हैं।
वुचिच ने चुनाव से पहले राष्ट्रपति पद छोड़ दिया था, क्योंकि संविधान उन्हें तीसरी बार राष्ट्रपति बनने की अनुमति नहीं देता। वे अब प्रधानमंत्री बनने की कोशिश कर रहे थे। लेकिन छात्र आंदोलन समर्थित उम्मीदवारों की जीत ने उनकी राजनीतिक योजना को बड़ा झटका दिया है। उनकी पार्टी ने भी चुनावी अभियान में छात्रों के आंदोलन को चुनौती दी थी और उस पर विदेशी समर्थन मिलने के आरोप लगाए थे, लेकिन इसके समर्थन में सार्वजनिक रूप से प्रमाण प्रस्तुत नहीं किए गए।
