राहुल की नौ घंटे की रणनीति, पुलिस की सख़्ती और चुनाव आयोग का जवाब, तीनों को कैसे देखा जा रहा है?

भारत की राजधानी नई दिल्ली में पुलिस ने प्रमुख विपक्षी नेता राहुल गांधी को क़रीब नौ घंटे तक चले गतिरोध को ख़त्म करने के लिए कुछ समय के लिए हिरासत में लिया.
राहुल मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफ़े की मांग को लेकर हो रहे प्रदर्शन में शामिल थे. विरोध प्रदर्शन मतदाता सूचियों के विवादित एसआईआर (स्पेशल इंटेंसिव रिविजन) के ख़िलाफ़ किया जा रहा था.
राहुल गांधी और उनकी बहन प्रियंका गांधी वाड्रा को पुलिस जबरन आकाशवाणी के कैंपस से एक बस की ओर ले गई. इससे पहले मंगलवार को सैकड़ों पुलिसकर्मियों ने उन्हें निर्वाचन आयोग के मुख्यालय की ओर मार्च करने से रोक दिया था. दोनों को शाम में रिहा कर दिया गया.
विपक्षी नेता मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को पद से हटाने और मतदाता सूची में किए गए विवादित बदलाव को रद्द करने की मांग कर रहे हैं. इस प्रक्रिया में मतदाता सूची से 13 करोड़ से ज़्यादा नाम हटाए गए हैं.
विपक्षी समूहों का आरोप है कि इस प्रक्रिया से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सत्तारूढ़ पार्टी को अनुचित लाभ मिला है. चुनाव आयोग और नरेंद्र मोदी की भारतीय जनता पार्टी ने इन आरोपों से इनकार किया है.
राहुल गांधी विरोध प्रदर्शन के दौरान पुलिस अधिकारी से बहस करते भी दिखे. एक पुलिस अधिकारी ने राहुल से कहा कि उन्हें यहाँ से चले जाना चाहिए.
राहुल पर पुलिस की सख़्ती
इस पर राहुल गांधी ने कहा, क्या लोकतंत्र में शांतिपूर्ण विरोध-प्रदर्शन का अधिकार नहीं है? क्या विपक्षी सांसद मुख्य चुनाव आयुक्त से नहीं मिल सकते हैं? इसके जवाब में पुलिस अधिकारी ने कहा कि आपको चुनाव आयोग में अपॉइंटमेंट लेना चाहिए था. जवाब में राहुल ने कहा- मैंने कई बार अपॉइंटमेंट मांगा लेकिन मिला नहीं? दिल्ली में कोई ऐसी जगह बता दो मैं वहीं चला जा रहा हूँ विरोध प्रदर्शन करने.
सु्प्रीम कोर्ट की वरिष्ठ वकील और मानवाधिकार कार्यकर्ता वृंदा ग्रोवर दिल्ली पुलिस की भूमिका पर सवाल उठा रही हैं.
उन्होंने एक्स पर एक पोस्ट में लिखा है, भारत के लोग शांतिपूर्ण प्रदर्शन के लिए जंतर-मंतर नहीं जा सकते. विपक्षी नेता भारत निर्वाचन आयोग तक नहीं जा सकते. दुनिया मोदी-शाह के लोकतंत्र की जननी के विचार को देख रही है! हम, भारत के लोग, अपने लोकतंत्र को फिर से हासिल करेंगे.
मोदी सरकार में मंत्री रहे और पूर्व गृह सचिव आरके सिंह ने भी दिल्ली पुलिस की भूमिका पर सवाल उठाया है.
आरके सिंह ने लिखा है, भारत के नागरिकों को संविधान के अनुच्छेद 19 के तहत शांतिपूर्वक और बिना हथियार के एकत्र होने का मौलिक अधिकार प्राप्त है. ऐसे में दिल्ली के पुलिस आयुक्त जंतर-मंतर पर प्रदर्शन को कैसे रोक सकते हैं?
पुलिस मैनुअल के तहत पुलिस को सभाओं और जुलूसों को नियंत्रित करने का अधिकार है, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं हो सकता कि लोगों के एकत्र होने या प्रदर्शन करने पर पूरी तरह रोक लगा दी जाए. ऐसा करना संविधान का उल्लंघन होगा. पुलिस आयुक्त यह तर्क भी नहीं दे सकते कि जंतर-मंतर पर प्रदर्शन से लोगों को असुविधा होगी, क्योंकि वहां पहले भी नियमित रूप से प्रदर्शन होते रहे हैं. पुलिस आयुक्त को संविधान और क़ानूनों के अनुसार, काम करना चाहिए, न कि किसी राजनेता के कथित अवैध निर्देशों के अनुसार.
चुनाव आयोग
चुनाव आयोग की कार्यशैली पर सवाल केवल विपक्ष ही नहीं उठा रहा है बल्कि इस संस्थान में शीर्ष पर रहे लोग भी उठा रहे हैं.
चुनाव आयोग के पूर्व आयुक्त अशोक लवासा मानते हैं कि ईसी ने ख़ुद को बहुत ही मुश्किल स्थिति में पहुँचा दिया है और अफ़सोस की बात है कि यहाँ तक पहुँचने में उसकी अपनी भूमिका भी रही है.
अशोक लवासा ने प्रमुख अंग्रेज़ी अख़बार इंडियन एक्सप्रेस में छह अक्तूबर को लिखा था, वर्षों से अपने सहज और मैत्रीपूर्ण रवैये के कारण लोगों का विश्वास जीतने वाला यह संस्थान आज लगभग पूरी तरह अकेला पड़ गया है.
उसका एकमात्र मित्र, सत्तारूढ़ दल, जब भी उसके बचाव में सामने आता है, आयोग को और ज़्यादा मुश्किल स्थिति में धकेल देता है. ईसीआई के भीतर चल रही जंग अब सार्वजनिक हो चुकी है. दो चुनाव आयुक्तों की ओर से लिखे गए 14 आपत्तियों ने मुख्य चुनाव आयुक्त को विवाद के केंद्र में ला दिया है, भले ही यह तूफ़ान उनकी अपनी स्थिति को भी प्रभावित कर सकता है.
चुनाव आयोग का जवाब
देर शाम इस मामले में चुनाव आयोग का जवाब भी आया. चुनाव आयोग ने कहा कि उसने प्रदर्शन कर रहे सांसदों से ज्ञापन लेने के लिए प्रस्तावित बैठक स्थल पर ड्यूटी पर मौजूद सबसे वरिष्ठ अधिकारी भेजने की पेशकश की थी. आयोग के मुताबिक़, यह अपने आप में एक अभूतपूर्व क़दम होता. हालांकि, प्रदर्शन कर रहे नेताओं ने यह प्रस्ताव भी ठुकरा दिया.
राजधानी में ऑल इंडिया रेडियो के मुख्यालय आकाशवाणी भवन के अंदर प्रदर्शन स्थल से राहुल गांधी को हिरासत में लिए जाने के बाद जारी आधिकारिक बयान में चुनाव आयोग ने कहा कि शाम चार बजे तक उसे मीडिया के ज़रिए ही यह जानकारी मिली थी कि कुछ सांसद मुख्यालय की ओर मार्च के दौरान अपने प्रतिनिधिमंडल के साथ आयोग से मिलना चाहते हैं.
आयोग ने कहा, आज शाम चार बजे तक किसी भी राजनीतिक दल ने अपने प्रतिनिधियों के ज़रिए चुनाव आयोग से मुलाक़ात के लिए समय नहीं मांगा था.
हालांकि, क़रीब चार बजे दिल्ली पुलिस से जानकारी मिली कि राहुल गांधी के नेतृत्व में सांसदों का एक प्रतिनिधिमंडल आयोग से मिलना और ज्ञापन सौंपना चाहता है.
इसके बाद जब चुनाव आयोग इस अनुरोध पर विचार कर रहा था, तब दिल्ली पुलिस के डिप्टी कमिश्नर ऑफ पुलिस ने बताया कि प्रतिनिधिमंडल में 240 सांसद शामिल हैं और प्रस्तावित बैठक स्थल संसद भवन एनेक्सी है.
आयोग ने अपने बयान में कहा, चुनाव आयोग ने इस अनुरोध को असामान्य माना और इसलिए इसे स्वीकार नहीं किया जा सका, क्योंकि ईसीआई के प्रोटोकॉल के अनुसार, ऐसी बैठकें केवल भारत निर्वाचन आयोग के परिसर में ही होती हैं.
चुनाव आयोग ने कहा कि इसके बजाय उसने ड्यूटी पर मौजूद सबसे वरिष्ठ अधिकारी को भेजकर ज्ञापन लेने की पेशकश की थी, लेकिन विपक्षी सांसदों ने इस प्रस्ताव को ख़ारिज कर दिया.
आयोग ने आगे कहा कि 2025 में उसने राजनीतिक दलों के साथ बैठक के लिए एक प्रक्रिया निर्धारित की थी और सभी राजनीतिक दलों को इसकी जानकारी दी गई थी.
आयोग ने कहा, इस प्रक्रिया के तहत, जब किसी राजनीतिक दल का प्रतिनिधिमंडल या कई दलों का संयुक्त प्रतिनिधिमंडल चुनाव आयोग से मिलना चाहता है, तो उसे अपने अधिकृत प्रतिनिधि के जरिए मुलाक़ात के लिए समय मांगना होता है. इसके बाद बैठक का समय दोनों पक्षों की आपसी सहमति से तय किया जाता है.
इंडिया गठबंधन की रणनीति
कांग्रेस पार्टी के नेतृत्व में क़रीब 300 सांसदों ने मंगलवार को संसद से सेंट्रल नई दिल्ली स्थित निर्वाचन आयोग के मुख्यालय तक 800 मीटर की दूरी तक मार्च किया.
राहुल गांधी के हाथ में एक तख्ती थी, जिस पर लिखा था, ज्ञानेश, इट्स डन ब्रो. इससे पहले गांधी ने मुख्य चुनाव आयुक्त पर बीजेपी की मदद करने के लिए अपने पद का दुरुपयोग करने का आरोप लगाया था.
गांधी ने कहा, लोकतंत्र पर इस आपराधिक हमले में शामिल हर व्यक्ति जवाबदेह ठहराया जाएगा.
पिछले हफ़्ते द हिन्दू ग्रुप के प्रमुख एन राम ने बीबीसी हिन्दी से कहा था कि मोदी सरकार के पिछले क़रीब 13 वर्षों के कार्यकाल में विपक्ष के लिए इतना अच्छा समय कभी नहीं था क्योंकि लोगों का असंतोष सार्वजनिक रूप से दिख रहा है.
मतदाता सूची में बदलाव की इस प्रक्रिया को स्पेशल इंटेंसिव रिविजन के नाम से जाना जाता है. इसकी शुरुआत पिछले साल बिहार से हुई थी, जहाँ बीजेपी ने आराम से जीत हासिल की थी. इसके बाद इसे पूरे देश में लागू किया गया. अनुमान है कि करीब 13 करोड़ नाम, यानी कुल मतदाताओं के लगभग 13 फीसदी नाम, मतदाता सूची से हटा दिए गए हैं.
निर्वाचन आयोग ने इस प्रक्रिया का बचाव करते हुए कहा है कि हटाए गए नाम डुप्लीकेट, मृत लोगों या अप्रवासियों के थे. हालांकि, आलोचकों का आरोप है कि आयोग ने ग़लत तरीक़े से करोड़ों मतदाताओं के नाम हटा दिए, जिनमें ख़ास तौर पर मुस्लिम मतदाता शामिल हैं, और यह सब मोदी सरकार के दबाव में किया गया.
पिछले एक साल में बीजेपी ने कई राज्यों में जीत हासिल की है, जिनमें विपक्ष के क़ब्ज़े वाला पश्चिम बंगाल भी शामिल है. अब बीजेपी और उसके सहयोगियों का नियंत्रण ऐसे राज्यों पर है, जिनमें देश की 70 फ़ीसदी से अधिक आबादी रहती है. यह स्थिति 1970 के दशक में इंदिरा गांधी के नेतृत्व वाली कांग्रेस के प्रभुत्व के क़रीब मानी जा रही है.
बीजेपी फ़रवरी में उत्तर प्रदेश में भी अपना नियंत्रण बनाए रखने की कोशिश कर रही है. उत्तर प्रदेश भारत का सबसे अधिक आबादी वाला राज्य है और यहाँ बड़ी मुस्लिम आबादी रहती है.
चुनाव आयोग
पिछले महीने इंडियन एक्सप्रेस में प्रकाशित एक रिपोर्ट के बाद चुनाव आयोग को लेकर नाराज़गी और बढ़ी है. रिपोर्ट में एसआईआर की प्रक्रिया में अनियमितताओं और निर्वाचन आयोग के दो अन्य आयुक्तों की ओर से उठाई गई दर्जनों आंतरिक आपत्तियों का आरोप लगाया गया था.
निर्वाचन आयोग ने कहा कि इस तरह के मतभेद निर्णय लेने की प्रक्रिया में होने वाले सामान्य विचार-विमर्श का हिस्सा हैं और उसके अंतिम फ़ैसले सर्वसम्मत थे. शुक्रवार को आयोग ने अधिकारियों को निर्देश दिया कि जिन योग्य मतदाताओं के नाम ग़लती से सूची से छूट गए हैं, उनके नाम वापस जोड़े जाएं.
पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त एसवाई क़ुरैशी ने इन स्पष्टीकरणों को बिल्कुल बकवास बताया. उन्होंने ज्ञानेश कुमार पर देश के साथ खिलवाड़ करने का आरोप लगाया है.
भारत के सुप्रीम कोर्ट ने इस सप्ताह निर्वाचन आयोग और सरकार से मतदाता सूची से नाम हटाए जाने को लेकर स्पष्टीकरण मांगा.
ज्ञानेश कुमार 2029 में अपने पद से हटने वाले हैं. उन्होंने अपने इस्तीफ़े की मांगों पर कोई प्रतिक्रिया नहीं दी है और निर्वाचन आयोग की स्वतंत्रता का बचाव किया है. पिछले महीने अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने भी ज्ञानेश कुमार की प्रशंसा की थी, जब उन्होंने भारतीय मतदाताओं से अपनी पहचान साबित करने पर ज़ोर दिया था.
बीजेपी सांसद और पार्टी के राष्ट्रीय प्रवक्ता सुधांशु त्रिवेदी ने मंगलवार को विपक्ष को चुनौती देते हुए पूछा कि बिना किसी जांच के अनुपस्थित, स्थानांतरित, मृत और डुप्लीकेट मतदाताओं को मतदान का अधिकार देने से किसे फ़ायदा होगा.
राहुल की रणनीति
2024 के लोकसभा चुनाव में बीजेपी को केवल 240 सीटें मिलीं, जिसके कारण नरेंद्र मोदी को सरकार बनाने के लिए तेलुगु देशम पार्टी और जनता दल (यूनाइटेड) जैसे सहयोगी दलों पर निर्भर रहना पड़ा. कांग्रेस ने 99 सीटें जीतीं, जिससे राहुल गांधी औपचारिक रूप से लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष की भूमिका संभाल सके और संसद में विपक्ष पहले की तुलना में अधिक मुखर नज़र आ रहा है.
हालांकि, 2024 के आम चुनाव के बाद कांग्रेस और उसके सहयोगियों को हरियाणा, महाराष्ट्र और बिहार जैसे राज्यों में बीजेपी के हाथों लगातार चुनावी हार का सामना करना पड़ा. इन हार को निष्पक्ष चुनावी मुक़ाबलों का नतीजा मानने से इनकार करते हुए राहुल गांधी ने बार-बार बीजेपी पर चुनावी हेरफेर और वोट चोरी का आरोप लगाया. उन्होंने आरोप लगाया कि भारत निर्वाचन आयोग राजनीतिक दबाव में काम कर रहा है.
अब मुख्य सवाल यह है कि राहुल गांधी इन मुद्दों के इर्द-गिर्द एक विश्वसनीय और मतदाताओं के बीच प्रभाव पैदा करने वाली राजनीतिक कहानी तैयार करने के लिए कौन-सी रणनीति अपनाएंगे. राहुल अब एसआईआर के मुद्दे को संसद से बाहर सड़क पर भी उठा रहे हैं.
2024 में लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष की भूमिका संभालने के बाद से राहुल गांधी की संसद में मौजूदगी पहले की तुलना में कहीं अधिक टकरावपूर्ण और मुखर रही है.
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.(bbc.com/hindi)



