दिल्ली हाईकोर्ट का बड़ा फैसला: लीज खत्म होने के बाद भी प्रॉपर्टी न खाली करने पर किराएदार को ₹3.27 करोड़ मेस्ने प्रॉफिट चुकाने का आदेश

दिल्ली हाईकोर्ट ने एक लंबे समय से चले आ रहे किराएदारी विवाद में महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। कोर्ट ने कहा है कि लीज एग्रीमेंट की अवधि समाप्त होने और बेदखली नोटिस के बावजूद प्रॉपर्टी खाली न करने वाले किराएदार को मेस्ने प्रॉफिट यानी अनधिकृत कब्जे के मुआवजे के रूप में करीब ₹3.27 करोड़ चुकाने होंगे। साथ ही इस रकम पर 6 प्रतिशत सालाना ब्याज भी लगाया गया है।
मामला डिफेंस कॉलोनी मार्केट स्थित एक व्यावसायिक संपत्ति से जुड़ा है। किराएदार स्टेट बैंक ऑफ इंडिया (एसबीआई) था और मकान मालकिन श्रीमती राज कुमारी गर्ग थीं। संपत्ति का कुल क्षेत्रफल करीब 2,800 वर्ग फुट बताया गया है।
लोन की अंडरटेकिंग ने बदली गणना की तारीख
मूल किराएदारी एग्रीमेंट की अवधि खत्म होने के बाद मकान मालकिन ने मई 2008 में लीगल नोटिस जारी कर किराएदारी समाप्त करने की मांग की थी। हालांकि किराएदार बैंक ने संपत्ति खाली नहीं की और लंबे समय तक कब्जा बनाए रखा। संपत्ति अंततः 31 दिसंबर 2017 को खाली की गई।
मामले में सबसे अहम मोड़ फरवरी 2007 का वह लोन था, जब मकान मालकिन ने किराएदार बैंक से ₹25 लाख का ऋण लिया। इस लोन के साथ उन्होंने नोटरीकृत अंडरटेकिंग दी कि ऋण पूरी तरह चुकता होने तक किराएदारी जारी रहेगी। किराए की राशि से ईएमआई समायोजित करने का भी प्रावधान था। यह ऋण मई 2012 में चुकाया गया।
हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि 2008 का नोटिस उस बाध्यकारी अंडरटेकिंग पर भारी नहीं पड़ सकता, जो मकान मालकिन ने खुद दी थी। इसलिए बैंक को मई 2012 तक अनधिकृत कब्जेदार नहीं माना जा सकता। मेस्ने प्रॉफिट की गणना मई 2012 से शुरू मानी गई, न कि 2008 से। 2008 से मई 2012 तक की अवधि का दावा खारिज कर दिया गया।
मेस्ने प्रॉफिट की दर और कुल रकम
जुलाई 2026 के आदेश में कोर्ट ने मई 2012 से दिसंबर 2015 तक ₹163 प्रति वर्ग फुट प्रति माह की दर से मेस्ने प्रॉफिट तय किया। जनवरी 2016 से 31 दिसंबर 2017 तक इस दर में 15 प्रतिशत की बढ़ोतरी लागू की गई। इन दरों के आधार पर कुल मेस्ने प्रॉफिट करीब ₹3,26,78,240 यानी लगभग ₹3.27 करोड़ बैठता है। इस राशि पर 6 प्रतिशत वार्षिक ब्याज भी देय होगा।
कोर्ट ने ट्रायल कोर्ट के 2022 के फैसले को बरकरार रखते हुए दोनों पक्षों की अपील खारिज कर दी। यह आदेश तब तक अंतिम माना जाएगा जब तक किसी उच्च न्यायालय में चुनौती न दी जाए।
यह फैसला उन मामलों के लिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है जहां लीज समाप्त होने के बाद भी किराएदार कब्जा बनाए रखते हैं। साथ ही यह भी साफ होता है कि पक्षों के बीच बाद में हुए समझौते या अंडरटेकिंग अनधिकृत कब्जे की तारीख तय करने में निर्णायक भूमिका निभा सकते हैं।



