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IRCTC बुकिंग क्राइसिस: दिल्ली हाई कोर्ट ने केंद्र को थमाया नोटिस, सिस्टम के ‘स्वतंत्र ऑडिट’ की मांग

नई दिल्ली: हर दिन लाखों भारतीय एक ऐसे मुकाबले में उतरते हैं, जहां टाइमिंग ही सबकुछ है—IRCTC पर ट्रेन टिकट की बुकिंग। लेकिन क्या हो जब आप सही समय पर क्लिक करें, आपके बैंक खाते से पैसे कट जाएं, और अंत में स्क्रीन पर ‘लॉगिन फेल’ या ‘सेशन समाप्त’ का एरर आ जाए? भारतीय रेलवे के यात्रियों के लिए यह रोजमर्रा का संघर्ष अब सीधे अदालत पहुंच गया है।

दिल्ली हाई कोर्ट (Delhi High Court) ने IRCTC के ई-टिकटिंग सिस्टम में लगातार आ रही तकनीकी खामियों और यात्रियों के साथ हो रहे इस डिजिटल धोखे को लेकर सख्त रुख अपनाया है। अदालत ने एक अहम याचिका पर सुनवाई करते हुए केंद्र सरकार और संबंधित विभागों को नोटिस जारी कर जवाब मांगा है।

मुद्दे की जड़: ‘पैसे कटे, टिकट नहीं मिला’

याचिका में उस दर्द को सामने रखा गया है, जिसे भारत का लगभग हर मिडिल-क्लास यात्री महसूस कर चुका है। अहम मौकों पर, खासकर तत्काल (Tatkal) बुकिंग के दौरान, IRCTC का सर्वर अक्सर दम तोड़ देता है।

याचिकाकर्ता ने अदालत के सामने जो मुख्य तकनीकी बाधाएं रखी हैं, वे इस प्रकार हैं:

  • लॉगिन फेलियर (Login Failure): ऐन वक्त पर सिस्टम का क्रैश होना या अकाउंट का लॉग आउट हो जाना।
  • सेशन टाइम आउट (Session Out): पेमेंट गेटवे तक पहुंचते-पहुंचते सेशन का अचानक खत्म हो जाना।
  • पैसों की कटौती (Unjust Deductions): खाते से पैसे कट जाने के बावजूद पीएनआर (PNR) जेनरेट न होना और टिकट बुक न होना।

यह सिर्फ एक तकनीकी खामी (Glitch) नहीं है, बल्कि करोड़ों यात्रियों के समय और मेहनत का नुकसान है।

बॉट्स और बल्क बुकिंग: असली विलेन?

जैसे खेलों में कुछ लोग गलत तरीके से फायदा उठाते हैं, ठीक वैसे ही ई-टिकटिंग की इस रेस में भी कुछ ‘डिजिटल खिलाड़ी’ सिस्टम को मात दे रहे हैं। याचिका में स्पष्ट रूप से बॉट्स (Bots) और अवैध सॉफ्टवेयर के जरिए होने वाली बल्क बुकिंग (Bulk Booking) का मुद्दा उठाया गया है।

आम यात्री जहां कैप्चा (Captcha) भरने और ओटीपी (OTP) का इंतजार करने में सेकंड्स गंवाता है, वहीं ऑटोमेटेड स्क्रिप्ट्स और बॉट्स पलक झपकते ही दर्जनों टिकट बुक कर लेते हैं। हाई कोर्ट में दायर इस जनहित याचिका (PIL) ने मांग की है कि इन अवैध सॉफ्टवेयर और टिकट दलालों के गठजोड़ को तोड़ने के लिए तत्काल और कठोर कदम उठाए जाएं।

अदालत में मांग: एक स्वतंत्र तकनीकी ऑडिट (Independent Tech Audit)

शायद इस पूरे मामले का सबसे बड़ा ‘गेम-चेंजर’ वह मांग है, जिसमें सिस्टम के स्वतंत्र तकनीकी ऑडिट (Independent Technical Audit) की बात कही गई है।

याचिकाकर्ता का तर्क सीधा है: यदि भारत की सबसे बड़ी ई-टिकटिंग वेबसाइट इस तरह की खामियों से ग्रस्त है, तो इसकी जांच किसी बाहरी, निष्पक्ष और विशेषज्ञ तकनीकी एजेंसी द्वारा होनी चाहिए। यह ऑडिट इस बात का पर्दाफाश कर सकता है कि सिस्टम में खामियां स्वाभाविक हैं, या फिर किसी खास वर्ग (दलालों) को फायदा पहुंचाने के लिए बैकएंड से कोई छेड़छाड़ की गई है।

आगे क्या? (What’s Next?)

अब गेंद केंद्र सरकार और रेलवे मंत्रालय के पाले में है। दिल्ली हाई कोर्ट ने उन्हें यह समझाने का मौका दिया है कि दुनिया के सबसे बड़े रेल नेटवर्क्स में से एक का डिजिटल फ्रंट-एंड इतनी कमजोरियों से क्यों जूझ रहा है।

बॉटम लाइन (The Bottom Line): जब तक अदालत के इस नोटिस का कोई ठोस नतीजा नहीं निकलता और IRCTC अपने सर्वर और सुरक्षा प्रोटोकॉल को अपग्रेड नहीं करता, तब तक यात्रियों को अपनी बुकिंग के दौरान धैर्य और अच्छी किस्मत, दोनों की जरूरत पड़ेगी। इस मामले की अगली सुनवाई यह तय करेगी कि भारतीय रेलवे के डिजिटल टिकट सिस्टम में पारदर्शिता आएगी या यह पुराना खेल ऐसे ही चलता रहेगा।

कविता मिश्रा

घर-गृहस्थी के बीच पली-बढ़ीं। परिवार, रिश्ते और रोजमर्रा के काम उनकी जिंदगी का बड़ा हिस्सा रहे। उन्हें किचन में समय बिताना, त्योहारों की तैयारी और पड़ोसियों से बात करना अच्छा लगता है। वे चुपचाप देखती हैं और मन में बातें रखती हैं। उनकी सोच घर और आसपास के जीवन से निकली हुई है।

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