छत्तीसगढ़

दहेज केस में बरी होने के बाद भी मुकदमे जारी रखना मानसिक क्रूरता

हाईकोर्ट ने विवाह खत्म किया

छत्तीसगढ़ संवाददाता

बिलासपुर, 7 अक्टूबर। छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने एक वैवाहिक विवाद में अहम फैसला सुनाते हुए कहा है कि केवल शिकायत करना मानसिक क्रूरता नहीं है, लेकिन जब पति और उसके परिवार के लोग मुकदमे में बरी हो जाएं और इसके बाद भी लगातार कानूनी लड़ाई जारी रखी जाए तो पूरे घटनाक्रम को वैवाहिक रिश्ते के संदर्भ में देखना होगा। कोर्ट ने ऐसी परिस्थितियों में पति को हुई मानसिक पीड़ा और तनाव को मानसिक क्रूरता माना।

जस्टिस पार्थ प्रतिम साहू और जस्टिस सुषमा सावंत की डिवीजन बेंच ने जांजगीर निवासी 29 वर्षीय विषंभर प्रसाद राठौर की याचिका मंजूर करते हुए कोरबा निवासी 30 वर्षीय मनीषा राठौर के साथ उसका विवाह समाप्त करने का आदेश दिया।

दोनों की शादी 2 जून 2015 को हुई थी। पति ने तलाक की मांग करते हुए पत्नी पर वैवाहिक जीवन में विवाद पैदा करने, दुर्व्यवहार और अपमानजनक व्यवहार के आरोप लगाए थे। उसने पत्नी की मानसिक बीमारी की जानकारी शादी से पहले छिपाए जाने का दावा भी किया था।

फैमिली कोर्ट ने 8 अगस्त 2019 को पति की तलाक याचिका खारिज कर दी थी। बाद में अपील के दौरान पति ने पत्नी की ओर से शुरू किए गए दूसरे कानूनी मामलों के फैसले भी हाईकोर्ट के सामने रखे।

पत्नी की शिकायत पर पति और उसके परिवार के छह अन्य सदस्यों के खिलाफ दहेज प्रताड़ना का मुकदमा चला। सभी सात आरोपितों को 14 दिसंबर 2023 को बरी कर दिया गया। पत्नी की ओर से दायर अपील भी 7 मार्च 2025 को खारिज हो गई।

इसी तरह घरेलू हिंसा अधिनियम के तहत की गई कार्रवाई भी खारिज हुई और उसके खिलाफ अपील 23 अगस्त 2024 को भी निरस्त कर दी गई।

हाईकोर्ट ने कहा कि किसी महिला का शिकायत करना अपने आप में मानसिक क्रूरता नहीं माना जा सकता। लेकिन जब शिकायत मुकदमे में बदल जाए, पति और उसके परिवार के लोग बरी हो जाएं और उसके बाद भी लगातार उन फैसलों को चुनौती दी जाती रहे, तो इससे पैदा होने वाली मानसिक पीड़ा और तनाव को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।

बेंच ने सुप्रीम कोर्ट के रानी नरसिम्हा शास्त्री और राकेश रमन मामलों में दिए गए फैसलों का भी उल्लेख किया। कोर्ट ने माना कि इस मामले में लगातार चलती कानूनी प्रक्रिया ने पति को मानसिक परेशानी और तनाव दिया।

हालांकि हाईकोर्ट ने पति की ओर से पत्नी की मानसिक बीमारी को तलाक का आधार बनाने की दलील स्वीकार नहीं की। मेडिकल रिकॉर्ड में बीमारी को उपचार योग्य बताया गया था और यह भी माना गया था कि इलाज के बाद पत्नी सामान्य वैवाहिक जीवन जी सकती है।

कोर्ट को यह साबित करने के लिए पर्याप्त सबूत नहीं मिले कि बीमारी शादी से पहले मौजूद थी या इतनी गंभीर थी कि पति के साथ रहना संभव ही नहीं था।

इन परिस्थितियों में हाईकोर्ट ने फैमिली कोर्ट का 8 अगस्त 2019 का आदेश रद्द करते हुए 2015 में हुआ विवाह समाप्त कर दिया।

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