जस्टिस उज्ज्वल भुइयां पर रूसो वाले बयान की पुष्टि नहीं, उपलब्ध रिपोर्टों में मताधिकार पर टिप्पणी दर्ज

सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश जस्टिस उज्ज्वल भुइयां के नाम से यह दावा प्रसारित हो रहा है कि उन्होंने स्विस-फ्रांसीसी दार्शनिक ज्यां-जाक रूसो की सामाजिक अनुबंध सिद्धांत का हवाला देते हुए कहा कि कानून बनाने का अधिकार केवल लोगों की सामूहिक इच्छा, यानी जन-इच्छा, को है। उपलब्ध समाचार रिपोर्टों, विधि समाचार पोर्टलों और सार्वजनिक व्याख्यानों की जाँच में इस विशिष्ट उद्धरण की पुष्टि नहीं हुई।
जस्टिस भुइयां 14 जुलाई 2023 से सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश हैं। इससे पहले वे तेलंगाना उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश रह चुके हैं। हाल के सार्वजनिक संबोधनों में उनकी टिप्पणियाँ मुख्य रूप से मतदान के अधिकार, बड़े पैमाने पर मताधिकार से वंचित करने की प्रक्रिया, संविधान के अनुच्छेद 14 और 326, न्यायिक समीक्षा तथा व्यक्तिगत स्वतंत्रता पर केंद्रित रही हैं। इनमें रूसो या सामाजिक अनुबंध का उल्लेख नहीं मिला।
हालिया पुष्ट टिप्पणी
4 अक्टूबर 2026 को हैदराबाद की नालसार विधि विश्वविद्यालय में 19वीं जस्टिस बोध राज साहनी स्मृति मूट कोर्ट प्रतियोगिता के समापन संबोधन में जस्टिस भुइयां ने कहा कि यदि कोई प्रक्रिया लाखों भारतीय नागरिकों को मताधिकार से वंचित कर उन्हें अपने ही देश में बिना मत के नागरिक बना दे, तो ऐसी प्रक्रिया मूलतः मनमानी है। उन्होंने कहा कि किसी भी प्रकार का बहाना इसे जायज नहीं ठहरा सकता।
उन्होंने यह भी कहा कि भारतीय संविधान नागरिकों की दो श्रेणियाँ नहीं बनाता—एक जिनके पास मतदान का अधिकार हो और दूसरी जिनके पास न हो। उनके अनुसार ऐसी प्रक्रिया संविधान के हृदय पर प्रहार है और संवैधानिक व्यवस्था को नकारने जैसी है। उन्होंने मतदान के अधिकार को केवल जनप्रतिनिधित्व अधिनियम से निकलने वाला वैधानिक अधिकार नहीं, बल्कि लोकतंत्र का अभिन्न संवैधानिक अधिकार बताया और अनुच्छेद 326 को छेड़छाड़ से परे रखा।
रूसो का सिद्धांत अलग विषय है
ज्यां-जाक रूसो का जन्म 1712 में जिनेवा में हुआ था। उनकी 1762 की पुस्तक सोशल कॉन्ट्रैक्ट में सामान्य इच्छा को संप्रभु बताया गया है और कानून को उसी इच्छा की अभिव्यक्ति कहा गया है। यह राजनीतिक दर्शन का स्थापित विचार है, लेकिन जस्टिस भुइयां के हालिया दर्ज भाषणों से इसे जोड़ना फिलहाल प्रमाणित नहीं है।
जब तक मूल भाषण, आधिकारिक प्रतिलेख या विश्वसनीय रिपोर्ट में यह उद्धरण नहीं मिलता, इसे जस्टिस भुइयां का बयान मानकर प्रसारित नहीं किया जाना चाहिए। उनकी पुष्ट टिप्पणियाँ मताधिकार, समानता और संविधान की सर्वोच्चता पर हैं।



