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सीनियर एडवोकेट दुष्यंत दवे ने सीजेआई सूर्यकांत के रोस्टर आदेश पर उठाए सवाल, कहा- न्यायिक आदेश में हस्तक्षेप अनुचित

नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन के पूर्व अध्यक्ष और सीनियर एडवोकेट दुष्यंत दवे ने एक लेख में भारत के मुख्य न्यायाधीश (सीजेआई) सूर्यकांत के एक प्रशासनिक आदेश पर सवाल उठाया है। दवे का कहना है कि रोस्टर के प्रमुख के रूप में पारित यह आदेश पहले से चल रही न्यायिक प्रक्रिया में हस्तक्षेप जैसा है और इससे शीर्ष अदालत पर लोगों का भरोसा प्रभावित हो सकता है।

मामला केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बलों (सीएपीएफ) में भारतीय पुलिस सेवा (आईपीएस) अधिकारियों की प्रतिनियुक्ति से जुड़ा है। इस संबंध में अवमानना याचिका पहले न्यायमूर्ति उज्ज्वल भुयान और न्यायमूर्ति अतुल चंदूरकर की पीठ के समक्ष सूचीबद्ध थी।

क्या है विवाद

29 सितंबर को यह मामला दैनिक कारण सूची में मद संख्या 32 के रूप में दर्ज था। दोपहर के अंतराल में इसे सूची से हटा दिया गया। उसी दिन न्यायमूर्ति भुयान और न्यायमूर्ति चंदूरकर की पीठ ने हैरानी जताते हुए रजिस्ट्री से स्पष्टीकरण मांगा और निर्देश दिया कि मामला 30 सितंबर को दोबारा उन्हीं के समक्ष सूचीबद्ध किया जाए।

इसके बावजूद सीजेआई सूर्यकांत ने प्रशासनिक आदेश द्वारा अवमानना याचिका की सुनवाई के लिए न्यायमूर्ति मनोज मिश्रा और न्यायमूर्ति उज्ज्वल भुयान की विशेष पीठ गठित कर दी। दवे का तर्क है कि एक बार मामला किसी पीठ को सौंप दिए जाने के बाद उस पीठ का उस पर पूरा अधिकार होता है और मुख्य न्यायाधीश की शक्तियां उस न्यायिक प्रक्रिया में दखल तक नहीं जातीं।

दवे ने सुप्रीम कोर्ट के शांति भूषण बनाम सुप्रीम कोर्ट ऑफ इंडिया फैसले का हवाला दिया। उस फैसले में कहा गया था कि मामले के आवंटन के बाद संबंधित पीठ उस पर पूर्ण नियंत्रण रखती है और मुख्य न्यायाधीश उस पीठ के कामकाज को नियंत्रित नहीं कर सकते।

कोर्ट में क्या हुआ

30 सितंबर को विशेष पीठ के समक्ष मामला आया। रजिस्ट्री का स्पष्टीकरण था कि मामला गलती से 29 सितंबर को सूचीबद्ध हो गया था और सीजेआई से निर्देश मिलने के बाद इसे विशेष पीठ के सामने रखा गया। सरकार की ओर से अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल ऐश्वर्या भाटी ने स्वीकार किया कि उन्होंने सीजेआई के समक्ष मामले का उल्लेख किया था। उन्होंने कहा कि अवमानना याचिका और संबंधित कानून की वैधता वाली याचिका साथ सुनी जानी चाहिए। भाटी ने इस प्रक्रिया के लिए माफी भी मांगी।

सीनियर एडवोकेट श्याम दीवान ने आपत्ति जताते हुए कहा कि मामला एकतरफा उल्लेख के आधार पर सूची से हटाया गया, जिससे संस्थागत विश्वसनीयता का सवाल उठता है। पीठ ने भी कहा कि मूल पीठ को इसकी सूचना दी जानी चाहिए थी। सॉलिसिटर जनरल तुषार मेhta ने भी माफी मांगी, लेकिन दोनों मामलों को साथ सुनाने पर जोर दिया।

अंत में अदालत ने अवमानना याचिका और सीएपीएफ (सामान्य प्रशासन) अधिनियम, 2026 की वैधता को चुनौती देने वाली याचिका को 15 अक्टूबर को साथ सुनने का निर्देश दिया।

मामले की पृष्ठभूमि

यह विवाद मई 2025 के सुप्रीम कोर्ट फैसले से जुड़ा है, जिसमें सीएपीएफ को संगठित ग्रुप ए सेवा माना गया था और सीएजी स्तर तक आईपीएस अधिकारियों की प्रतिनियुक्ति को चरणबद्ध तरीके से कम करने का निर्देश दिया गया था। अवमानना याचिका में आरोप है कि फैसले के बाद भी कई आईपीएस अधिकारियों की नियुक्ति जारी रही।

इसके बाद संसद ने सीएपीएफ (सामान्य प्रशासन) अधिनियम, 2026 पारित किया। इस कानून में आईजी पदों का 50 प्रतिशत, एडीजी पदों का कम से कम 67 प्रतिशत तथा विशेष महानिदेशक और महानिदेशक पदों का 100 प्रतिशत आईपीएस अधिकारियों के लिए आरक्षित करने का प्रावधान है। इसी कानून की वैधता भी सुप्रीम कोर्ट में चुनौती के अधीन है।

दवे का कहना है कि सीएपीएफ अधिकारियों के प्रमोशन के रास्ते लंबे समय से प्रभावित रहे हैं और न्यायिक आदेशों के बावजूद स्थिति नहीं बदली। उन्होंने आशा व्यक्त की कि मुख्य न्यायाधीश इस प्रक्रिया को सुधारेंगे और शीर्ष अदालत में जनता का विश्वास बहाल होगा।

यह लेख दुष्यंत दवे के विचार और 30 सितंबर की अदालती कार्यवाही पर आधारित है। अदालत ने मामले की अगली सुनवाई निर्धारित कर दी है।

रवि कुमार यादव

गाँव और शहर दोनों की ज़िंदगी से जुड़े रहे हैं। परिवार में खेती-बाड़ी और मेहनत का माहौल रहा, जिससे उनमें जमीन से जुड़ाव बना। वे कम बोलते हैं, लेकिन ध्यान से सुनते हैं। यात्रा करना, स्थानीय मेलों में घूमना और पुराने दोस्तों से मिलना उनकी रुचि है। वे साधारण लोगों की रोजमर्रा की जिंदगी को सम्मान की नजर से देखते हैं।

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