स्कूलों में प्राचार्यों का टोटा, दफ्तरों में अफसरों का जमावड़ा; आखिर शिक्षा विभाग की प्राथमिकता क्या है?
तरुण कौशिक, संपादक सर्वव्यापी
छत्तीसगढ़ की शिक्षा व्यवस्था में अजब तस्वीर सामने आ रही है। कहीं स्कूल प्राचार्यों की कमी से जूझ रहे हैं, तो कहीं विभागीय कार्यालयों में अधिकारियों की पदस्थापना को लेकर सवाल उठ रहे हैं। आखिर स्कूलों में शैक्षणिक व्यवस्था मजबूत करना प्राथमिकता है या दफ्तरों में अधिकारियों की तैनाती?प्राप्त जानकारी के अनुसार, प्रदेश के कई स्कूलों में प्राचार्यों के पद रिक्त हैं। वहीं, बिलासपुर स्थित संयुक्त संचालक शिक्षा कार्यालय में पांच प्राचार्य पद के अधिकारियों की पदस्थापना की बात सामने आई है। इनमें अनिल तिवारी, जेके शास्त्री, एसके पाटिल, एलपी डाहिरे और प्रशांत राय के नाम शामिल हैं। बताया गया है कि इन अधिकारियों की पदस्थापना विभागीय आदेश के तहत की गई है।मामले का दूसरा पहलू यह है कि कार्यालय में सहायक संचालक के दो स्वीकृत पदों के विरुद्ध सात अधिकारियों की पदस्थापना होने का दावा किया गया है। यदि यह जानकारी सही है, तो विभाग को स्वीकृत पदों, वास्तविक कार्यभार और अधिकारियों की तैनाती के औचित्य पर स्थिति स्पष्ट करनी चाहिए।*जेडी ने कहा—शासन का निर्णय, सभी को सौंपे गए कार्य*बिलासपुर के संयुक्त संचालक अश्वनी भारद्वाज ने कार्यालय में पांच प्राचार्य पद के अधिकारियों की पदस्थापना की पुष्टि की है। उनके अनुसार, इन अधिकारियों की पदस्थापना शासन स्तर से की गई है और सभी को कार्यों का बंटवारा कर दिया गया है।अब सवाल यह है कि जब स्कूलों में प्राचार्यों की आवश्यकता महसूस की जा रही है, तब अनुभवी अधिकारियों की सेवाएं विद्यालयों के बजाय संभागीय कार्यालय में लेने के पीछे क्या प्रशासनिक आवश्यकता है? क्या विभाग ने रिक्त पदों और कार्यालयों के कार्यभार का तुलनात्मक आकलन किया है?शिक्षा व्यवस्था की मजबूती केवल आदेशों और दावों से नहीं, बल्कि स्कूलों में पर्याप्त नेतृत्व, शिक्षकों की उपलब्धता और विद्यार्थियों को बेहतर शैक्षणिक वातावरण देने से सुनिश्चित होगी। इसलिए शिक्षा विभाग और लोक शिक्षण संचालनालय को इस मामले में स्थिति स्पष्ट करनी चाहिए।आखिर सवाल वही—स्कूलों में प्राचार्य कब पहुंचेंगे और विभागीय पदस्थापनाओं की जवाबदेही कौन तय करेगा?
