सुप्रीम कोर्ट ने दवा कीमतों पर केंद्र से पूछा: MRP पर 16% मार्जिन क्यों नहीं?

नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को दवाओं की अधिकतम खुदरा कीमत (MRP) और रिटेलर को मिलने वाली कीमत (PTR) के बीच भारी अंतर पर केंद्र सरकार से सख्त सवाल किए। जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की पीठ ने कहा कि कैंसर जैसी जरूरी दवाओं पर कई गुना मुनाफा मरीजों और करदाताओं पर बोझ बन रहा है।
पीठ ने सुनवाई के दौरान उदाहरण दिया कि एक इंजेक्शन की MRP करीब 22,437 रुपये बताई गई, जबकि रिटेलर कीमत करीब 3,520 रुपये है। इसी तरह एक कैंसर दवा की MRP करीब 27,000 रुपये और PTR करीब 2,700 से 3,000 रुपये के बीच बताई गई। जस्टिस मेहता ने पूछा कि कीमत में इतनी बढ़ोतरी का पैसा आखिर किसकी जेब में जा रहा है और इससे किसे फायदा हो रहा है।
अस्पताल की फार्मेसी पर सवाल
कोर्ट ने प्राइवेट अस्पतालों की इन-हाउस फार्मेसी व्यवस्था पर भी आपत्ति जताई। पीठ ने कहा कि कई कॉर्पोरेट अस्पताल मरीजों को अपनी केमिस्ट या तय फार्मेसी से ही दवा खरीदने के लिए बाध्य करते हैं। अगर मरीज बाहर से सस्ती दवा लाता है तो गुणवत्ता या इलाज को लेकर दबाव की स्थिति बन सकती है।
जस्टिस मेहता ने कहा कि अगर मरीज सरकारी योजना के तहत इलाज करवा रहा है तो खर्च अंततः करदाता उठाता है। ऐसे में सबके लिए एक जैसे नियम क्यों नहीं लागू किए जा सकते।
16 प्रतिशत मार्जिन का सुझाव
पीठ ने पूछा कि ड्रग्स प्राइस कंट्रोल ऑर्डर (DPCO) के तहत निर्धारित 16 प्रतिशत रिटेलर मार्जिन सभी दवाओं पर क्यों नहीं लागू किया जा सकता। कोर्ट ने कहा कि दवाएं और मेडिकल डिवाइस आवश्यक वस्तु अधिनियम के दायरे में आती हैं, फिर कई दवाओं को मूल्य नियंत्रण से बाहर क्यों रखा गया है।
जस्टिस मेहता ने कहा, “जरूरी या गैर-जरूरी का फर्क क्यों? DPCO में जो 16 प्रतिशत मार्जिन है, वह हर चीज पर क्यों नहीं रखा जा सकता? अंत में नुकसान करदाता का होता है। यह carnage है।”
पीठ ने यह भी कहा कि फार्मा कंपनियों को इससे बड़ा फायदा नहीं दिखता, जबकि प्राइवेट अस्पताल MRP पर दवा बेचकर लाभ उठा रहे हैं। सामान्य स्टैटिन की कीमत और एस्पिरिन वाले कॉम्बिनेशन की कीमत के अंतर का भी जिक्र किया गया।
सरकार का रुख
सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि सरकार किसी पक्ष के खिलाफ नहीं है और सभी हितों का संतुलन बनाते हुए समाधान निकालेगी। उन्होंने कहा कि 16 प्रतिशत की समान सीमा तार्किक लगती है और अधिकारीयों से चर्चा के बाद जवाब रखा जाएगा। अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल ऐश्वर्या भाटी ने मौजूदा नियामक व्यवस्था अदालत के समक्ष रखी।
दो याचिकाओं पर सुनवाई
पीठ किशनचंद जैन और डॉ. संजय कुलश्रेष्ठ की याचिकाओं पर सुनवाई कर रही थी। याचिकाओं में कहा गया है कि शेड्यूल्ड दवाओं पर सीलिंग कीमत लगती है, जबकि बाजार की ज्यादातर नॉन-शेड्यूल्ड दवाओं पर निर्माताओं को MRP तय करने की अधिक छूट है। उन पर सालाना 10 प्रतिशत बढ़ोतरी की सीमा लागू होती है।
एक याचिका में जरूरी दवाओं की कथित ज्यादा कीमतें रोकने और दवाएं सस्ती करने की मांग है। दूसरी याचिका में उन डॉक्टरों के खिलाफ कार्रवाई की मांग है जो जेनेरिक दवाएं नहीं लिखते।
इससे पहले 22 सितंबर की सुनवाई में भी पीठ ने कैंसर दवा की करीब 10 गुना कीमत के अंतर को मरीजों के साथ “broad daylight dacoity” करार दिया था और नियामक अधिकारियों की चुप्पी पर हैरानी जताई थी।
मामले की अगली सुनवाई 12 अक्टूबर को होगी। कोर्ट ने कहा कि वह केंद्र का विस्तृत जवाब सुनेगा।



