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सुप्रीम कोर्ट ने ट्रायल जज से मांगी सफाई, जमानत कब दी जाए इस पर बिना मांगी सलाह से जताई नाराजगी

सुप्रीम कोर्ट ने पश्चिम बंगाल के एक ट्रायल जज से सफाई मांगी है। जज ने मुकदमे की सुनवाई पूरी करने के लिए अतिरिक्त समय मांगते हुए शीर्ष अदालत को यह सलाह दी थी कि जमानत कब दी जानी चाहिए और कब नहीं। जस्टिस जे. बी. पारदीवाला और जस्टिस के. विनोद चंद्रन की पीठ ने कहा कि पत्र लिखने के तरीके से वह काफी परेशान है।

मामला अमित घोष नामक आरोपी की जमानत याचिका से जुड़ा है। वह करीब पांच साल से अंडरट्रायल कैदी के रूप में जेल में बंद है। कलकत्ता हाईकोर्ट ने 5 मार्च 2026 के आदेश में जमानत देने से इनकार किया था और गवाहों की गवाही के बाद याचिका दोबारा दायर करने की छूट दी थी। हाईकोर्ट को बताया गया था कि अभियोजन 25 और गवाहों की जांच कराना चाहता है। अदालत ने राज्य को निर्देश दिया था कि 1 मई 2026 तक कम से कम 12 अतिरिक्त गवाहों की गवाही पूरी की जाए।

जब मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा, तब 11 मई 2026 तक एक भी अतिरिक्त गवाह की गवाही दर्ज नहीं हुई थी। जस्टिस जे. बी. पारदीवाला और जस्टिस विजय बिश्नोई की पीठ ने राज्य को अंतिम मौका देते हुए ट्रायल कोर्ट को निर्देश दिया कि सुनवाई तीन महीने में, बिना चूक, पूरी की जाए और निपटारे की रिपोर्ट सुप्रीम कोर्ट को भेजी जाए। आरोपी करीब पांच साल से जेल में था और मुकदमा धीमी गति से चल रहा था।

11 अगस्त के पत्र पर आपत्ति

निर्धारित समय में सुनवाई पूरी न हो पाने पर नॉर्थ 24 परगना, बारासात की तीसरी अदालत के एडिशनल डिस्ट्रिक्ट एंड सेशंस जज ने 11 अगस्त 2026 को सुप्रीम कोर्ट के असिस्टेंट रजिस्ट्रार को पत्र लिखकर अतिरिक्त समय मांगा। पत्र के अंतिम दो पैराग्राफ में पीठासीन अधिकारी ने यह सलाह भी दी कि सुप्रीम कोर्ट को जमानत कब देनी चाहिए और कब नहीं।

पीठ ने पत्र की भाषा पर आपत्ति जताते हुए कहा, “ट्रायल जज ने जिस तरह से इस अदालत को पत्र लिखकर कुछ और समय मांगा है, उससे हम काफी परेशान हैं। पीठासीन अधिकारी का यह काम नहीं है कि वह सलाह दे कि इस अदालत को कब जमानत देनी चाहिए और कब नहीं। पत्र के अंतिम दो पैराग्राफ हमें पसंद नहीं आए।” अदालत ने रजिस्ट्री को निर्देश दिया कि संबंधित पीठासीन अधिकारी से जल्द से जल्द उचित स्पष्टीकरण मंगाया जाए।

सुप्रीम कोर्ट ने पत्र में दी गई सलाह के सटीक शब्द सार्वजनिक नहीं किए। अदालत ने केवल इतना दर्ज किया कि अंतिम दो पैराग्राफ में जमानत देने और न देने के बारे में सलाह दी गई थी, जिसे स्वीकार नहीं किया गया।

अनीता शर्मा

एक संवेदनशील और शांत स्वभाव की महिला हैं। घर-परिवार के बीच रहकर उन्होंने ज़िंदगी के छोटे-छोटे पड़ावों को करीब से देखा है। उन्हें सुबह की सैर, घर के आंगन में बैठकर चाय पीना और पुरानी पत्रिकाएँ पढ़ना पसंद है। वे आसपास के लोगों के सुख-दुख को दिल से महसूस करती हैं। उनकी सोच साफ और सीधी है — जो दिखे, वही कहें, बिना बढ़ा-चढ़ाए।

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