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अकाल तख्त जत्थेदार और एसजीपीसी प्रमुख ने पटियाला जेल में बलवंत सिंह राजोआणा से मुलाकात की

अमृतसर। श्री अकाल तख्त साहिब के जत्थेदार ज्ञानी कुलदीप सिंह गड़गज्ज, तख्त श्री दमदमा साहिब के जत्थेदार ज्ञानी टेक सिंह और शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी (एसजीपीसी) के अध्यक्ष एडवोकेट हरजिंदर सिंह धामी ने मंगलवार को केंद्रीय जेल पटियाला पहुंचकर सजा-ए-मौत का सामना कर रहे बलवंत सिंह राजोआणा से विशेष मुलाकात की। इस मौके पर एसजीपीसी सदस्य सुरजीत सिंह गढ़ी भी मौजूद रहे।

राजोआणा को 1995 में पंजाब के तत्कालीन मुख्यमंत्री बेअंत सिंह की हत्या के मामले में मौत की सजा सुनाई गई है। वे लंबे समय से पटियाला केंद्रीय जेल में बंद हैं। मुलाकात के दौरान जत्थेदारों और एसजीपीसी अध्यक्ष ने उनकी सेहत और मौजूदा हालात के बारे में जानकारी ली।

मुलाकात के बाद पत्रकारों से बातचीत करते हुए जत्थेदार ज्ञानी कुलदीप सिंह गड़गज्ज ने कहा कि सिख इतिहास में सिखों ने कभी भी शासकों के आगे जान बख्शी के लिए घुटने नहीं टेके हैं, बल्कि शहादत का मार्ग चुना है। उन्होंने कहा कि बलवंत सिंह राजोआणा भी इसी परंपरा पर कायम हैं और उन्होंने साफ कह दिया है कि उन्हें किसी से दया की भीख नहीं चाहिए।

जत्थेदार गड़गज्ज ने कहा कि केंद्र सरकार ने 2019 में श्री गुरु नानक देव जी के 550वें प्रकाश पर्व के अवसर पर राजोआणा के मामले में की गई घोषणा अभी तक लागू नहीं की है। उन्होंने कहा कि मामला लंबे समय से लंबित है और सरकार को शीघ्र निर्णय लेना चाहिए। उन्होंने यह भी कहा कि यदि समय पर कोई फैसला नहीं होता है, तो पंज सिंह साहिबान की बैठक बुलाई जाएगी, ताकि राजोआणा की भावनाओं के अनुरूप आगे की कार्रवाई तय की जा सके।

एसजीपीसी अध्यक्ष हरजिंदर सिंह धामी ने कहा कि राजोआणा लगभग 32 वर्षों से जेल में हैं और लंबे समय से फांसी की सजा के इंतजार में हैं। उन्होंने बताया कि राजोआणा ने एसजीपीसी द्वारा दायर याचिका पर शीघ्र फैसला करने की बात कही है। धामी के अनुसार, राजोआणा ने कहा कि वे माफी नहीं मांग रहे हैं और लंबित मामले का आर-पार फैसला होना चाहिए।

मुलाकात के बाद जत्थेदार गड़गज्ज ने राजोआणा के हौसले को बुलंद बताया और कहा कि वे गुरु के प्रति समर्पित हैं। एसजीपीसी ने दोहराया कि वह राजोआणा समेत अन्य सिख बंदियों के मामलों को लगातार उठाती रहेगी।

रवि कुमार यादव

गाँव और शहर दोनों की ज़िंदगी से जुड़े रहे हैं। परिवार में खेती-बाड़ी और मेहनत का माहौल रहा, जिससे उनमें जमीन से जुड़ाव बना। वे कम बोलते हैं, लेकिन ध्यान से सुनते हैं। यात्रा करना, स्थानीय मेलों में घूमना और पुराने दोस्तों से मिलना उनकी रुचि है। वे साधारण लोगों की रोजमर्रा की जिंदगी को सम्मान की नजर से देखते हैं।

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