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पीएम आवास पर रोक, पूर्व जांच के बावजूद एसडीएम के आदेश पर सवाल!

बिलासपुर, भागवत प्रसाद, ब्यूरो चीफ सर्वव्यापी

प्रधानमंत्री आवास योजना के तहत स्वीकृत मकान के निर्माण पर रोक लगाने के मामले में अब राजस्व विभाग की कार्यप्रणाली पर सवाल उठने लगे हैं। बिलासपुर जिले के ग्राम पंचायत ढेका में सरकारी आबादी भूमि पर मकान निर्माण को लेकर शुरू हुआ विवाद अब तहसीलदार की पूर्व कार्रवाई, एसडीएम के जांच आदेश और जांच के लिए नायब तहसीलदार के चयन तक पहुंच गया है। सबसे बड़ा सवाल यह है कि जब मामले में पहले ही राजस्व जांच हो चुकी थी और तहसीलदार स्तर पर कार्रवाई की जा चुकी थी, तो फिर दोबारा जांच की आवश्यकता क्यों पड़ी? यदि पूर्व जांच प्रतिवेदन में कोई त्रुटि थी, तो उसे स्पष्ट किए बिना नए सिरे से जांच कराने का औचित्य क्या है?ग्राम पंचायत ढेका निवासी शिकायतकर्ता अंबालिका सिंह, विमला सिंह के अनुसार, ग्राम ढेका में खसरा नंबर 41/22 और 41/26 से संबंधित भूमि पर प्रधानमंत्री आवास योजना के अंतर्गत मकान निर्माण को लेकर विवाद सामने आया था। शिकायतकर्ताओं का कहना है कि पूर्व में राजस्व अधिकारियों द्वारा मौके का निरीक्षण किया गया था। इस दौरान पंचनामा तैयार करने और स्थानीय लोगों के बयान लेने की प्रक्रिया भी अपनाई गई थी। शिकायतकर्ताओं के मुताबिक, मौके पर पुराना कब्जा होने की पुष्टि हुई थी।ऐसे में सवाल उठता है कि यदि पूर्व जांच में वस्तुस्थिति का परीक्षण किया जा चुका था, तो बाद में निर्माण कार्य रोकने की कार्रवाई किन नए तथ्यों के आधार पर की गई? क्या पूर्व जांच प्रतिवेदन को गलत माना गया है? यदि हां, तो उसकी त्रुटियों और नए जांच आदेश के आधार को सार्वजनिक रूप से स्पष्ट किया जाना चाहिए।वहीं , इस पूरे प्रकरण में सबसे महत्वपूर्ण सवाल जांच अधिकारी के चयन को लेकर है। यदि संबंधित तहसीलदार न्यायालय में पहले से इस मामले की सुनवाई या कार्रवाई हुई थी, तो दोबारा जांच की आवश्यकता पड़ने पर सक्षम समकक्ष राजस्व अधिकारी अथवा अतिरिक्त तहसीलदार से जांच कराने पर विचार क्यों नहीं किया गया?एसडीएम ने नायब तहसीलदार को ही जांच का जिम्मा किस आधार पर सौंपा? क्या आदेश में जांच का दायरा, पूर्व जांच की समीक्षा और नए सिरे से जांच की आवश्यकता स्पष्ट की गई है? क्या यह नियमित प्रशासनिक प्रक्रिया के तहत लिया गया निर्णय है, अथवा इसके पीछे कोई विशेष कारण है?इन सवालों का जवाब संबंधित राजस्व अधिकारियों को देना चाहिए, ताकि जांच की निष्पक्षता और प्रशासनिक प्रक्रिया की पारदर्शिता पर अनावश्यक संदेह न रहे।वहीं, यदि तहसीलदार स्तर पर पहले ही जांच और कार्रवाई की जा चुकी थी, तो यह स्पष्ट होना चाहिए कि बाद में परिस्थितियां ऐसी क्या बदलीं, जिनके कारण निर्माण पर रोक लगाने की नौबत आई। क्या पूर्व जांच में सामने आए तथ्यों की अनदेखी हुई? क्या नए साक्ष्य मिले? या फिर शिकायत के आधार पर दोबारा जांच का निर्णय लिया गया?इन प्रश्नों का उत्तर दस्तावेजों और आधिकारिक आदेशों के आधार पर सामने आना जरूरी है। केवल दोबारा जांच का आदेश जारी होने से पूर्व जांच को गलत नहीं माना जा सकता। उसी तरह, पूर्व जांच हो जाने मात्र से नए तथ्यों के आधार पर जांच कराने की प्रशासनिक आवश्यकता समाप्त भी नहीं हो जाती। वास्तविक स्थिति जांच आदेश, पूर्व प्रतिवेदन और राजस्व अभिलेखों के परीक्षण के बाद ही स्पष्ट होगी।वहीं, विभागीय सूत्रों के हवाले से इस पूरे मामले में एक विधायक और एक पूर्व मंत्री के हस्तक्षेप की चर्चा भी सामने आ रही है। हालांकि, इस कथित हस्तक्षेप की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है । ऐसे में इस पहलू की सत्यता की जांच होना भी जरूरी है।यदि किसी जनप्रतिनिधि ने शिकायत के आधार पर अधिकारियों से कार्रवाई की मांग की है, तो वह अपने आप में अनुचित नहीं है। लेकिन यदि किसी अधिकारी पर अनुचित दबाव डालकर जांच या कार्रवाई को प्रभावित करने का प्रयास किया गया है, तो इसकी निष्पक्ष पड़ताल होनी चाहिए। इस संबंध में संबंधित विधायक , पूर्व मंत्री और प्रशासन का पक्ष सामने आना भी आवश्यक है।प्रधानमंत्री आवास योजना का उद्देश्य जरूरतमंद परिवारों को पक्का मकान उपलब्ध कराना है। ऐसे में किसी विवाद के कारण निर्माण कार्य रुकने से संबंधित परिवार को परेशानी का सामना करना पड़ सकता है। दूसरी ओर, यदि भूमि के स्वामित्व, कब्जे अथवा सरकारी आबादी भूमि के उपयोग को लेकर वास्तविक विवाद है, तो उसका समाधान राजस्व नियमों और उपलब्ध अभिलेखों के आधार पर किया जाना चाहिए।प्रशासन को यह स्पष्ट करना चाहिए कि पूर्व जांच में क्या निष्कर्ष निकला था, निर्माण रोकने का आधार क्या था, एसडीएम ने दोबारा जांच का आदेश क्यों दिया और नायब तहसीलदार को ही जांच अधिकारी नियुक्त करने के पीछे क्या कारण है।अब निगाहें एसडीएम के जांच आदेश, पूर्व राजस्व प्रतिवेदन और संबंधित अधिकारियों के आधिकारिक पक्ष पर हैं। इन दस्तावेजों से ही स्पष्ट हो सकेगा कि दोबारा जांच प्रशासनिक आवश्यकता थी या इस पूरे प्रकरण में किसी बाहरी प्रभाव की भूमिका की पड़ताल जरूरी है।

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