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SIR और मताधिकार पर जजों की टिप्पणियों का हवाला देते हुए चिदंबरम ने सुप्रीम कोर्ट से संविधान व लोकतंत्र की रक्षा की उम्मीद जताई

नई दिल्ली, 5 अक्टूबर 2026: कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और राज्यसभा सांसद पी. चिदंबरम ने विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) तथा मतदाता अधिकारों को लेकर सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश जस्टिस उज्जल भुइयां और पूर्व न्यायाधीश जस्टिस रोहिंटन फली नरिमन की हालिया टिप्पणियों का हवाला दिया है। उन्होंने सुप्रीम कोर्ट से संविधान और लोकतंत्र की रक्षा के लिए हस्तक्षेप की उम्मीद जताई है।

चिदंबरम ने सोमवार को सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर लिखा, “राजकोट में सेवानिवृत्त जस्टिस नरिमन की टिप्पणियां और हैदराबाद में कार्यरत जस्टिस भुइयां की टिप्पणियां पढ़ें। 22 मार्च 2026 को इंडियन एक्सप्रेस और अन्य समाचारपत्रों में छपा मेरा कॉलम ‘मिलियंस ऑफ सिटीजन नॉन-वोटर्स’ भी पढ़ें। मुझे उम्मीद है कि माननीय सुप्रीम कोर्ट इस अवसर पर आगे आएगा और संविधान तथा लोकतंत्र को बचाएगा। यह भी उम्मीद है कि भक्त इस पर चुप्पी साधे रखेंगे।”

यह टिप्पणी ऐसे समय में आई है, जब मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार की कार्यशैली और चुनाव आयोग के निर्णय-प्रक्रिया को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई चल रही है। सोमवार को मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने मुख्य चुनाव आयुक्त को अंतरिम रूप से निलंबित करने से इनकार करते हुए चुनाव आयोग, मुख्य चुनाव आयुक्त और दोनों चुनाव आयुक्तों को नोटिस जारी किया।

जस्टिस भुइयां ने क्या कहा

सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश जस्टिस उज्जल भुइयां ने रविवार, 4 अक्टूबर को हैदराबाद स्थित नालसार यूनिवर्सिटी ऑफ लॉ में 19वीं नालसार-जस्टिस बी. आर. साहनी मेमोरियल मूट कोर्ट प्रतियोगिता के समापन समारोह में संबोधित किया। कई समाचार रिपोर्टों के अनुसार, उन्होंने SIR या किसी विशिष्ट प्राधिकरण का नाम नहीं लिया, लेकिन बड़े पैमाने पर मताधिकार से वंचित करने वाली किसी भी प्रक्रिया पर टिप्पणी की।

उन्होंने कहा कि यदि कोई प्रक्रिया लाखों भारतीय नागरिकों को मताधिकार से वंचित कर उन्हें अपने ही देश में बिना मतदान अधिकार वाले दूसरे दर्जे के नागरिक बनाती है, तो वह मूल रूप से मनमानी है। उन्होंने कहा कि किसी भी प्रकार का ‘व्हाटअबाउटरी’ इसे उचित नहीं ठहरा सकता। ऐसी प्रक्रिया संविधान के मूल पर चोट करती है और संवैधानिक व्यवस्था का निषेध है।

जस्टिस भुइयां के अनुसार, संविधान नागरिकों के दो वर्ग नहीं बनाता—एक मतदान अधिकार वाला और दूसरा उससे वंचित। व्यापक पैमाने पर मताधिकार छीनना अनुच्छेद 326 (वयस्क मताधिकार) और अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार) का उल्लंघन होगा। उन्होंने कहा कि अनुच्छेद 326 से कोई छेड़छाड़ नहीं की जा सकती, कोई प्राधिकरण ऐसा नहीं कर सकता और कोई अदालत इसे माफ नहीं कर सकती। कोई भी संविधान से ऊपर नहीं है।

उन्होंने यह भी कहा कि मृत मतदाता के मामले को छोड़कर, एक बार मतदाता सूची में दर्ज नाम बिना सूचना और सुनवाई के नहीं हटाया जा सकता। नागरिक के व्यक्तित्व से मतदान का अधिकार या मतदाता सूची में शामिल होने का अधिकार अलग नहीं किया जा सकता। यह शरीर से आत्मा निकालने जैसा होगा।

जस्टिस नरिमन की टिप्पणी

पूर्व सुप्रीम कोर्ट न्यायाधीश जस्टिस रोहिंटन फली नरिमन ने राजकोट के राजकुमार कॉलेज में ‘संविधान और आम आदमी’ विषय पर बोलते हुए पश्चिम बंगाल में लगभग 90 लाख मतदाताओं के नाम हटाए जाने को “आश्चर्यजनक आंकड़ा” बताया। उन्होंने सवाल किया कि इतनी बड़ी संख्या सुप्रीम कोर्ट को SIR प्रक्रिया पर रोक लगाने के लिए क्यों नहीं प्रेरित कर सकी।

उन्होंने कहा कि आम नागरिक का मतदान का अधिकार, जो संविधान और लोकतंत्र का मूल है, बड़े खतरे में है। नाम हटाए जाने को उन्होंने “पूरी तरह गैरकानूनी तरीके से आम आदमी, भारत के नागरिक को बाहर करना” बताया, ताकि सरकार जो चाहे वह हासिल कर सके। उन्होंने पश्चिम बंगाल में अपीलों का जिक्र करते हुए कहा कि जिन मामलों का निपटारा हुआ, उनमें से अधिकांश में मतदाताओं के पक्ष में फैसला आया। जिन लोगों ने अपील नहीं की, उनके पास न्याय तक पहुंच का साधन न होना संभव है।

जस्टिस नरिमन ने चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति प्रक्रिया पर भी चिंता जताई और कहा कि यह प्रक्रिया अभी सरकार के हाथ में है। उन्होंने उम्मीद जताई कि सुप्रीम कोर्ट इस मसले पर उठेगा और व्यवस्था की गलतियों को सुधारेगा।

SIR विवाद का संदर्भ

चुनाव आयोग के विशेष गहन पुनरीक्षण को लेकर विपक्षी दल बड़े पैमाने पर नाम हटाए जाने, नोटिस और सुनवाई की पर्याप्तता तथा अपीलों के लंबित रहने पर सवाल उठा रहे हैं। कांग्रेस का दावा है कि तीन चरणों में करीब 13.30 करोड़ नाम हटाए गए। चुनाव आयोग का पक्ष रहा है कि प्रक्रिया कानून के अनुसार है और मई 2026 में सुप्रीम कोर्ट ने बिहार में SIR को संवैधानिक रूप से वैध ठहराया था।

पश्चिम बंगाल में अपीलीय ट्रिब्यूनलों के आंकड़ों का हवाला देते हुए विपक्ष कहता है कि निपटाए गए मामलों के बड़े हिस्से में नाम बहाल हुए। दिल्ली समेत कई राज्यों में ड्राफ्ट सूची से नाम बाहर होने और ‘नो मैपिंग’ या ‘लॉजिकल डिस्क्रेपेंसी’ के आधार पर नोटिस जारी होने की भी खबरें हैं।

चिदंबरम पहले भी SIR पर सवाल उठा चुके हैं। 22 मार्च 2026 के अपने कॉलम में उन्होंने वयस्क आबादी और पंजीकृत मतदाताओं के बीच अंतर तथा ‘सिटीजन नॉन-वोटर्स’ की स्थिति पर चिंता जताई थी। सितंबर में उन्होंने कांग्रेस कार्यसमिति की तीन मांगों—मुख्य चुनाव आयुक्त का इस्तीफा, SIR पर रोक और हटाए गए नामों की बहाली—को दोहराया था।

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