मक्का रक्षा समझौते से फिलहाल बाहर है मिस्र, भारत से रणनीतिक साझेदारी बढ़ाने पर जोर

सऊदी अरब, तुर्की और पाकिस्तान के बीच 7 अगस्त 2026 को मक्का में हुए संयुक्त रक्षा समझौते में मिस्र अब तक शामिल नहीं हुआ है। काहिरा का आधिकारिक रुख यह है कि समझौते की समीक्षा जारी है। जानकारों का कहना है कि यह दूरी सिर्फ भारत के कारण नहीं, बल्कि मिस्र की गैर-गुट नीति, इजरायल के साथ शांति संधि, संयुक्त अरब अमीरात और ग्रीस-साइप्रस से संबंधों तथा संवैधानिक सीमाओं से भी जुड़ी है।
समझौता क्या है
मक्का संयुक्त रक्षा समझौते पर सऊदी क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान, तुर्की के राष्ट्रपति रेजेप तैयप एर्दोगन और पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने हस्ताक्षर किए। समझौते में सामूहिक रक्षा का प्रावधान है। इसके तहत किसी एक सदस्य पर सशस्त्र हमले को तीनों पर हमला माना जाएगा। यह व्यवस्था नेटो के अनुच्छेद 5 जैसी मानी जा रही है। समझौता सितंबर 2025 में हुए सऊदी-पाकिस्तान रणनीतिक पारस्परिक रक्षा समझौते का विस्तार है, जिसमें अब तुर्की भी शामिल है।
मिस्र पहले से सऊदी अरब, तुर्की और पाकिस्तान के साथ चार देशों के परामर्श ढांचे का हिस्सा रहा है। जून 2026 में इन देशों के विदेश मंत्रियों की बैठक काहिरा में हुई थी। इसके बावजूद मिस्र founding सदस्य नहीं बना।
मिस्र और तुर्की ने क्या कहा
मिस्र के विदेश मंत्री बद्र अब्देलअत्ती ने कहा है कि काहिरा इस मामले को गंभीरता से देख रहा है। उन्होंने कहा कि रक्षा दायित्वों पर फैसला मिस्र के संविधान और कानूनी प्रतिबद्धताओं की समीक्षा के बाद ही हो सकता है। तुर्की के विदेश मंत्री हाकान फिदान ने मिस्र को स्वाभाविक साझेदार बताया है और कहा है कि कुछ तकनीकी मुद्दे सुलझने के बाद काहिरा बाद के चरण में शामिल हो सकता है।
मीडिया रिपोर्टों में स्थिति को लेकर अलग-अलग दावे हैं। कुछ रिपोर्टों के अनुसार मिस्र को आमंत्रण मिला, लेकिन उसने हस्ताक्षर नहीं किए। कुछ अन्य रिपोर्टों में सऊदी स्रोतों का हवाला देकर कहा गया कि रियाद शुरू में मिस्र को शामिल करने के पक्ष में नहीं था। मिस्र की ओर से समझौते को स्थायी रूप से खारिज करने का कोई आधिकारिक बयान सार्वजनिक नहीं हुआ है।
भारत से संबंध और बैठक
इकोनॉमिक टाइम्स ने सूत्रों के हवाले से बताया कि ब्रिक्स शिखर सम्मेलन के मौके पर मिस्र के राष्ट्रपति अब्देल फत्ताह अल-सीसी और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की बैठक में मक्का समझौते और उसके क्षेत्रीय असर पर भी बात हुई। रिपोर्ट के अनुसार दोनों पक्ष द्विपक्षीय रणनीतिक साझेदारी बढ़ाने पर सहमत हुए। मिस्र 2024 में ब्रिक्स का सदस्य बना था।
रिपोर्ट में यह भी कहा गया कि मिस्र ने तुर्की के सुझावों के बावजूद समझौते से दूरी बनाए रखी है। इसमें पक्ष न लेने की नीति और भारत से बढ़ते संबंधों को वजहों में गिना गया है। सूत्रों के अनुसार काहिरा ने भारतीय संवेदनाओं को अन्य कारकों के साथ ध्यान में रखा।
विशेषज्ञ दूरी को कैसे देखते हैं
चैथम हाउस समेत कई विश्लेषणों में मिस्र की अनुपस्थिति को राष्ट्रपति सीसी के कार्यकाल की सतर्क विदेश नीति से जोड़ा गया है। काहिरा खुद को मध्यस्थ की भूमिका में रखता है और सैन्य गुटों में बंधने से बचता है।
भारत को एक कारक माना जा रहा है, लेकिन एकमात्र कारक नहीं। भारत टुडे और फर्स्टपोस्ट की रिपोर्टों में पूर्व राजनयिकों और विशेषज्ञों के हवाले से कहा गया है कि पाकिस्तान वाले रक्षा समझौते में शामिल होने की धारणा भी नई दिल्ली के साथ रक्षा और व्यापार संबंधों पर असर डाल सकती है। बीबीसी हिंदी से बात करने वाले विशेषज्ञ इंद्राणी बागची ने भारत को वजहों में से एक बताया, लेकिन अंतिम वजह नहीं।
अन्य बाधाओं में इजरायल के साथ 1979 की शांति संधि, संयुक्त अरब अमीरात पर आर्थिक निर्भरता, ग्रीस और साइप्रस के साथ पूर्वी भूमध्यसागर में ऊर्जा-रक्षा सहयोग तथा वाशिंगटन से सहायता संबंध शामिल हैं। पश्चिम एशिया के पर्यवेक्षकों का यह भी कहना है कि तीनों सदस्यों के बीच साझा दुश्मन या एक नेतृत्व नहीं है, इसलिए समझौते की व्यावहारिक उपयोगिता सीमित रह सकती है। भारत-पाकिस्तान युद्ध की स्थिति में सऊदी अरब के सैन्य हस्तक्षेप की संभावना भी कम आंकी जा रही है।
भारत के लिए क्या मायने रखता है
मिस्र अरब देशों की सबसे बड़ी सेना रखता है और स्वेज नहर के जरिए व्यापार मार्ग पर उसकी स्थिति अहम है। काहिरा का फिलहाल समझौते से बाहर रहना नई दिल्ली के लिए राहत माना जा रहा है, क्योंकि इससे पाकिस्तान वाले सामूहिक रक्षा ढांचे में एक और बड़ा देश नहीं जुड़ा है। साथ ही भारत-मिस्र साझेदारी को और चौड़ा करने की गुंजाइश बनी हुई है।
यह स्थिति अंतिम नहीं है। तुर्की मिस्र के बाद में शामिल होने की उम्मीद जता रहा है और काहिरा समीक्षा की बात कर रहा है। फैसला संविधान, कानूनी समीक्षा और क्षेत्रीय संतुलन पर निर्भर करेगा।



