छत्तीसगढ़

जनपद पंचायत कर्मचारी सरकारी सेवक नहीं, पेंशन का हक भी नहीं

हाईकोर्ट ने21याचिकाएं खारिज कीं
छत्तीसगढ़ संवाददाता

बिलासपुर, 6अक्टूबर।छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने जनपद पंचायतों से रिटायर कर्मचारियों को राज्य सरकार के कर्मचारियों के बराबर पेंशन देने की मांग खारिज कर दी है। जस्टिस बिभू दत्ता गुरु ने21से ज्यादा याचिकाओं पर फैसला सुनाते हुए साफ किया कि जनपद पंचायत के कर्मचारी राज्य सरकार के कर्मचारी नहीं हैं। उनके सेवा संबंध अलग नियमों से तय होते हैं और उनके लिए वैधानिक पेंशन का प्रावधान नहीं है।

बस्तर,दंतेवाड़ा,बीजापुर,रायगढ़,बिलासपुर,मुंगेली,धमतरी,सक्ती,कांकेर,दुर्ग,सुकमा और कोरबा समेत कई जिलों के रिटायर्ड कर्मचारियों ने पेंशन के लिए हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया था।

याचिकाकर्ताओं का कहना था कि उन्होंने लंबे समय तक स्थायी कर्मचारी के तौर पर काम किया और कई की नियुक्ति पंचायत राज अधिनियम, 1993लागू होने से पहले हुई थी। उनका तर्क था कि अधिनियम की धारा131पुराने वेतन,भत्ते और सेवानिवृत्ति संबंधी अधिकारों को सुरक्षित रखती है।

हाईकोर्ट ने इस तर्क को स्वीकार नहीं किया। कोर्ट ने कहा कि धारा131केवल पहले से मौजूद अधिकारों को बचाती है। अगर पहले से पेंशन का अधिकार ही नहीं था तो इस धारा के सहारे नया पेंशन अधिकार पैदा नहीं किया जा सकता।

याचिकाकर्ताओं की ओर से यह भी बताया गया कि गुंडरदेही और तखतपुर जनपद पंचायतों में समान पदों पर काम कर चुके कुछ कर्मचारियों को पेंशन मिल रही है। इसे समानता के अधिकार का आधार बताया गया।

सरकार ने जवाब दिया कि संबंधित कर्मचारियों को1976के नियमों के तहत पेंशन के बजाय भविष्य निधि की सुविधा थी। बाद के1999के पंचायत सेवा नियमों में भी पेंशन का प्रावधान नहीं किया गया। याचिकाकर्ताओं को अंशदायी भविष्य निधि (सीपीएफ)का लाभ भी मिल चुका है।

सरकार ने बताया कि गुंडरदेही के तीन और तखतपुर के तीन कर्मचारियों को जनपद पंचायत की सामान्य प्रशासन समितियों के प्रस्ताव के आधार पर स्थानीय फंड से पेंशन दी जा रही है। यह राज्य की किसी वैधानिक पेंशन योजना का हिस्सा नहीं है।

पंचायत एवं ग्रामीण विकास विभाग ने इस व्यवस्था को लेकर संबंधित अधिकारियों को27और31अगस्त2026को कारण बताओ नोटिस भी जारी किए हैं।

हाईकोर्ट ने कहा कि किसी जगह नियमों के खिलाफ या विवादित तरीके से मिला लाभ दूसरे व्यक्ति के लिए कानूनी अधिकार नहीं बन सकता। केवल इसलिए समान लाभ की मांग नहीं की जा सकती कि किसी अन्य कर्मचारी को वह लाभ मिल रहा है।

कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि जब कानून किसी खास लाभ का अधिकार नहीं देता तो अदालत सरकार को नई नीति या नियम बनाने के लिए मजबूर नहीं कर सकती।

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