स्मृति की सख्ती का असर या महज बैठने की व्यवस्था में बदलाव? साय कैबिनेट में डिप्टी सीएम की बदली कुर्सियों ने छेड़ी नई सियासी चर्चा!

तरुण कौशिक, संपादक सर्वव्यापी
छत्तीसगढ़ की सियासत में इन दिनों भाजपा प्रदेश प्रभारी स्मृति ईरानी की सक्रियता और सरकार-संगठन के बीच समन्वय को लेकर चर्चाएं तेज हैं। 26 अक्टूबर को भाजपा के प्रदेश संगठन और सरकार के कामकाज की समीक्षा के बाद 27 अक्टूबर को मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय की कैबिनेट बैठक के दौरान एक दृश्य ने राजनीतिक गलियारों का ध्यान खींचा। मुख्यमंत्री के दोनों डिप्टी सीएम अरुण साव और विजय शर्मा इस बार मुख्यमंत्री के बाजू में बैठने के बजाय मंत्रियों की कतार में बैठे नजर आए। बैठने की इस बदली हुई व्यवस्था को अब स्मृति ईरानी की हालिया बैठकों और उनके सख्त रुख से जोड़कर देखा जा रहा है। सवाल उठ रहा है कि क्या यह महज सामान्य बैठक व्यवस्था थी या फिर भाजपा संगठन की ओर से सत्ता के गलियारों में अनुशासन और सामूहिकता का कोई संदेश दिया गया है?गौरतलब है कि भाजपा की राष्ट्रीय महासचिव एवं छत्तीसगढ़ प्रदेश प्रभारी स्मृति ईरानी ने अपने दो दिवसीय छत्तीसगढ़ प्रवास के दौरान 25 और 26 अक्टूबर को पार्टी पदाधिकारियों, विधायकों, सांसदों तथा मंत्रियों के साथ बैठकें की थीं। इन बैठकों में संगठन की मजबूती, जनसंपर्क, सरकार और संगठन के बीच समन्वय तथा आगामी 2028 विधानसभा चुनाव की तैयारियों पर चर्चा हुई। मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक, मंत्रियों के कामकाज की समीक्षा भी की गई और मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय के साथ उनकी अलग से चर्चा हुई।ऐसे में अगले ही दिन कैबिनेट बैठक में दोनों उपमुख्यमंत्रियों की बदली हुई बैठक व्यवस्था ने राजनीतिक अटकलों को हवा दे दी है। हालांकि, केवल बैठने की जगह के आधार पर यह निष्कर्ष निकालना उचित नहीं होगा कि स्मृति ईरानी ने किसी विशेष निर्देश या फटकार के जरिए यह बदलाव कराया है। फिलहाल ऐसी किसी आधिकारिक पुष्टि की जानकारी सामने नहीं आई है। फिर भी, राजनीतिक परिस्थितियों के बीच इस घटनाक्रम को लेकर सवाल उठना स्वाभाविक है।दरअसल, मुख्यमंत्री और दोनों उपमुख्यमंत्रियों की भूमिका सरकार में महत्वपूर्ण है, लेकिन कैबिनेट की बैठक में सभी मंत्री सामूहिक रूप से निर्णय लेने वाली मंत्रिपरिषद के सदस्य होते हैं। ऐसे में मुख्यमंत्री के बाजू में बैठने और मंत्रियों की कतार में बैठने के दृश्य को लेकर राजनीतिक मायने तलाशे जा रहे हैं। क्या भाजपा नेतृत्व सरकार के भीतर सामूहिक नेतृत्व और संगठनात्मक अनुशासन को अधिक स्पष्ट रूप से सामने लाना चाहता है, या फिर यह महज बैठक की सामान्य व्यवस्था थी? इसका जवाब संबंधित नेताओं के बयान अथवा किसी आधिकारिक स्पष्टीकरण से ही स्पष्ट हो सकेगा।स्मृति ईरानी ने अपने छत्तीसगढ़ प्रवास के दौरान पार्टी कार्यकर्ताओं से जमीनी स्तर पर जनता के बीच सक्रिय रहने और जनसमस्याओं के समाधान पर जोर दिया था। ऐसे में अब निगाहें इस बात पर हैं कि उनकी समीक्षा बैठकों के बाद सरकार और संगठन के कामकाज में कोई ठोस बदलाव दिखाई देता है या नहीं।फिलहाल सियासी गलियारों में चर्चा जरूर है, लेकिन असली सवाल कुर्सियों की कतार से कहीं बड़ा है—क्या समीक्षा बैठकों के बाद सरकार की कार्यशैली, मंत्रियों की जवाबदेही और संगठन के साथ तालमेल में भी कोई बदलाव देखने को मिलेगा? क्योंकि राजनीति में बैठने की व्यवस्था सुर्खियां जरूर बटोर सकती है, लेकिन नेतृत्व की वास्तविक परीक्षा फैसलों, कार्यशैली और जनता को मिलने वाले परिणामों से ही होती है।
