छत्तीसगढ़

पत्नी को घायल हालत में ओडिशा छोड़ आया पति, हाईकोर्ट ने तलाक देने से किया इनकार

छत्तीसगढ़ संवाददाता

बिलासपुर, 3नवंबर।पत्नी पर मारपीट,गाली-गलौज और मानसिक प्रताड़ना का आरोप लगाकर तलाक मांगने वाले पति को हाईकोर्ट से राहत नहीं मिली। अदालत ने कहा कि पति अपने आरोपों के समर्थन में कोई ठोस सबूत पेश नहीं कर सका। इसके उलट,रिकॉर्ड से सामने आया कि ओडिशा में विवाद के दौरान पत्नी के सिर में चोट लगने के बाद पति उसे वहीं छोड़कर अपने गांव लौट आया था। उसने दो-तीन महीने तक पत्नी की तबीयत जानने की भी कोशिश नहीं की।

जस्टिस पार्थ प्रतिम साहू और जस्टिस सुषमा सावंत की डिवीजन बेंच ने पति तुलेश्वर प्रसाद चंद्र की अपील खारिज कर दी। इसके साथ ही सक्ती फैमिली कोर्ट के15सितंबर2023के उस फैसले को बरकरार रखा,जिसमें तलाक की मांग ठुकरा दी गई थी। हाईकोर्ट ने अपील का खर्च भी पति को उठाने का निर्देश दिया।

मामले के अनुसार,तुलेश्वर प्रसाद चंद्र और रानू चंद्र की शादी21मई2002को हुई थी। उनके दो बेटे गौरव और तरुण हैं। पति भारतीय सेना में कार्यरत था। उसने आरोप लगाया था कि पत्नी अक्सर उसके और परिवार के सदस्यों के साथ झगड़ा करती थी। गाली-गलौज और मारपीट के साथ मानसिक प्रताड़ना भी देती थी। पति ने यह भी दावा किया कि अमृतसर में रहने के दौरान पत्नी ने जहर खाकर आत्महत्या की कोशिश की थी।

उसका कहना था कि15मई2014को एक सामाजिक बैठक में पत्नी ने100रुपये के स्टांप पेपर पर लिखित आश्वासन दिया था कि वह भविष्य में ऐसा व्यवहार नहीं करेगी। इसके बावजूद स्थिति नहीं सुधरी और15दिसंबर2015से पत्नी अलग रहने लगी।

पत्नी ने पति के आरोपों को गलत बताया। उसका कहना था कि उसने न तो कोई लिखित समझौता किया था और न ही पति या बच्चों को छोड़कर गई थी। इसके उलट पति ने ही उसे और बच्चों को छोड़ दिया था और अपनी एक महिला सहकर्मी के साथ रहने लगा था।

पत्नी ने यह भी कहा कि पति बच्चों की पढ़ाई और देखभाल के लिए पर्याप्त व्यवस्था नहीं करता था। उसके एक बेटे के दिव्यांग होने के बावजूद उसकी जरूरतों का ध्यान नहीं रखा गया।

हाईकोर्ट ने पाया कि पति ने खुद के अलावा मनीराम चंद्र को गवाह बनाया था,लेकिन जिरह में मनीराम ने स्वीकार किया कि उसे कथित घटनाओं की प्रत्यक्ष जानकारी नहीं थी। इसलिए उसकी गवाही पति के आरोपों को साबित नहीं कर सकी।

जिस स्टांप पेपर को पति ने पत्नी के लिखित आश्वासन का आधार बताया था,उसे भी विधिवत साक्ष्य के रूप में साबित नहीं किया गया। पत्नी ने उस पर हस्ताक्षर करने से इनकार किया था। कोर्ट ने यह भी कहा कि पत्नी के जहर खाने की घटना को अपने आप पति के प्रति क्रूरता का प्रमाण नहीं माना जा सकता। इसके पीछे की परिस्थितियों के संबंध में भी ठोस साक्ष्य नहीं दिए गए।

सुनवाई के दौरान पति की जिरह से सामने आया कि ओडिशा के बालिंगा में विवाद के दौरान पत्नी के सिर में चोट लगी थी। इसके बाद पति उसे वहीं छोड़कर अपने गांव लौट आया। उसने दो से तीन महीने तक पत्नी की तबीयत की जानकारी तक नहीं ली।

कोर्ट ने यह भी पाया कि फैमिली काउंसलिंग सेंटर और हिंदू विवाह अधिनियम की धारा9के तहत दांपत्य जीवन बहाल करने की कार्यवाही के दौरान पति पत्नी को वापस लाने के लिए तैयार नहीं हुआ। बच्चे के बीमार होने पर उसके इलाज की व्यवस्था नहीं करने की बात भी सामने आई।

डिवीजन बेंच ने स्पष्ट किया कि पति-पत्नी का अलग रहना अपने आप परित्याग यानी डेजर्शन नहीं माना जा सकता। इसके लिए साबित करना जरूरी है कि संबंधित पक्ष ने बिना उचित कारण और दूसरे की इच्छा के विरुद्ध स्थायी रूप से वैवाहिक संबंध खत्म करने का फैसला किया था।

इस मामले में पति यह साबित नहीं कर सका कि पत्नी ने उसे छोड़ा था। उलटे साक्ष्यों से अलगाव के लिए पति का व्यवहार जिम्मेदार नजर आया। हाईकोर्ट ने फैमिली कोर्ट के फैसले में कोई कानूनी गलती नहीं पाई और तलाक की अपील खारिज कर दी।

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