आठ लोगों पर दर्ज आत्महत्या के लिए उकसाने का केस हाईकोर्ट ने रद्द किया

छत्तीसगढ़ संवाददाता
बिलासपुर, 3नवंबर।बालोद जिले के जुंगेरा गांव में पंचायत जैसी बैठक के बाद एक व्यक्ति की आत्महत्या के मामले में हाईकोर्ट ने आठ आरोपियों को बड़ी राहत दी है। कोर्ट ने उनके खिलाफ दर्ज आपराधिक कार्रवाई रद्द कर दी है। अदालत ने कहा कि उपलब्ध साक्ष्यों से ऐसा कोई ठोस तथ्य सामने नहीं आता जिससे यह साबित हो कि आरोपियों ने आत्महत्या के लिए उकसाया या जानबूझकर इसमें मदद की। केवल गांव की बैठक में मौजूद रहने से सभी लोगों को सामूहिक रूप से आपराधिक जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता।
मामले के मुताबिक,मृतक ओमप्रकाश भुआर्य की पत्नी ईश्वरी भुआर्य और बेटे अमित भुआर्य ने विशेष अदालत में निजी परिवाद दायर किया था। आरोप था कि10मई2024को जुंगेरा गांव में हुई बैठक में ओमप्रकाश पर गांव की लड़कियों के बारे में अपमानजनक बातें कहने और समिति के सदस्यों से गाली-गलौज करने का आरोप लगाया गया। इसके बाद उस पर30हजार रुपये का जुर्माना लगाया गया। रकम नहीं देने पर परिवार को गांव से बाहर करने की धमकी भी दी गई।
परिजनों के अनुसार,इस अपमान और दबाव से परेशान होकर ओमप्रकाश ने16और17मई2024की दरमियानी रात घर में फांसी लगाकर आत्महत्या कर ली।
विशेष अदालत ने23अप्रैल2025को शिकायत पर सुनवाई के बाद आठ आरोपियों के खिलाफ आईपीसी की धारा500, 306और149के साथ एससी-एसटी अत्याचार निवारण अधिनियम की धारा3(2)(वी)के तहत अपराध दर्ज करने का आदेश दिया था। आरोपियों ने इस आदेश को हाईकोर्ट में चुनौती दी।6फरवरी2026को हाईकोर्ट की डिवीजन बेंच ने निचली अदालत की कार्रवाई पर रोक लगा दी थी।
आरोपियों की ओर से दलील दी गई कि बैठक में तय की गई30हजार रुपये की राशि किसी व्यक्ति के निजी लाभ के लिए नहीं,बल्कि शीतला मंदिर में चंदे के रूप में देने के लिए थी। ओमप्रकाश ने बैठक में अपनी गलती स्वीकार की थी और रजिस्टर में हस्ताक्षर भी किए थे। आरोपियों ने आत्महत्या के लिए उकसाने या जानबूझकर दबाव बनाने से इनकार किया। पुलिस जांच में भी आत्महत्या के पीछे व्यक्तिगत और पारिवारिक कारण सामने आने की बात कही गई।
जस्टिस नरेश कुमार चंद्रवंशी की सिंगल बेंच ने पाया कि बैठक और आत्महत्या के बीच करीब छह दिन का अंतर था। शिकायत में किसी आरोपी की ऐसी विशिष्ट भूमिका नहीं बताई गई जिससे आत्महत्या के लिए उकसाने का अपराध बनता हो। न ही किसी विशेष धमकी या जानबूझकर किए गए ऐसे कृत्य का स्पष्ट विवरण है जिसका आत्महत्या से सीधा संबंध स्थापित हो सके।
कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि मृतक का अनुसूचित जनजाति से होना अपने आप एससी-एसटी एक्ट लागू करने का आधार नहीं है। यह साबित करना जरूरी है कि अपराध उसकी जातीय पहचान के कारण किया गया था। इसी तरह किसी विशेष आरोपी के मानहानिकारक बयान देने का प्रमाण नहीं होने से आईपीसी की धारा500के तहत अपराध भी नहीं बनता।
इन आधारों पर हाईकोर्ट ने आठों आरोपियों के खिलाफ आपराधिक कार्रवाई रद्द कर दी।



