छत्तीसगढ़

मैं भी मांझी की बेटी हूं, आदिवासी संस्कृति, परंपराओं से मेरा गहरा जुड़ाव-राष्ट्रपति

शिक्षा-विकास के साथ सांस्कृतिक विरासत और पहचान सुरक्षित रखना जरूरी

जगदलपुर, 23 अक्टूबर। राष्ट्रपति श्रीमती द्रौपदी मुर्मू ने ऐतिहासिक बस्तर दशहरा के अंतर्गत आयोजित मुरिया दरबार में आदिवासी समाज की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत, परंपरागत सामाजिक व्यवस्था और सामूहिक निर्णय प्रणाली की सराहना करते हुए कहा कि आदिवासी समाज की परंपरागत व्यवस्था सामाजिक एकता, न्याय, आपसी सहयोग और सुशासन का उत्कृष्ट उदाहरण है। उन्होंने कहा कि समय के साथ शासन व्यवस्था, नीतियां और कानून बदलते रहते हैं, लेकिन आदिवासी समाज ने अपनी परंपराओं, सामाजिक नियमों और अलिखित संविधान को पीढिय़ों से जीवित रखा है। यह व्यवस्था समाज में सुख-शांति, प्रेम, सद्भाव और सामूहिकता बनाए रखने का महत्वपूर्ण आधार है।

राष्ट्रपति श्रीमती मुर्मू ने मुरिया दरबार में उपस्थित आदिवासी समाज के प्रतिनिधियों और पारंपरिक प्रमुखों को संबोधित करते हुए कहा कि आप सभी ने मुझे एक बार फिर अपनी संस्कृति और परंपराओं से रूबरू होने का अवसर दिया है। इसके लिए मैं आप सभी की आभारी हूं। उन्होंने भावुक होते हुए कहा, मैं भी आप लोगों में से एक हूं। मैं भी इसी आदिवासी संस्कृति और परंपरा से आती हूं। मेरे दादाजी मांझी थे, मेरे पिताजी भी मांझी थे और मेरे भाई भी मांझी हुआ करते थे। मैं एक मांझी की बेटी हूं, गांव के मुखिया की बेटी हूं। उन्होंने कहा कि उनके परिवार के सदस्य आज भले ही उनके बीच नहीं हैं, लेकिन अपनी संस्कृति, सामाजिक व्यवस्था और परंपराओं के प्रति उनका जुड़ाव आज भी उतना ही गहरा है।

राष्ट्रपति ने कहा कि देश में पहले राजाओं का शासन था, इसके बाद अंग्रेजों का शासन आया और आज भारत में लोकतांत्रिक शासन व्यवस्था है। समय के साथ शासन व्यवस्था और कानूनों में परिवर्तन हुआ है, लेकिन आदिवासी समाज की अपनी पारंपरिक व्यवस्था, नियम और अलिखित संविधान आज भी विद्यमान हैं। यह संविधान किसी पुस्तक में नहीं लिखा गया है, लेकिन समाज के लोग पीढिय़ों से इसका पालन करते आ रहे हैं। उन्होंने कहा कि आदिवासी समाज में लोग मिल-जुलकर पूजा-अर्चना करते हैं, विवाह एवं अन्य सामाजिक कार्यक्रम आयोजित करते हैं तथा सामूहिक रूप से पर्व-त्यौहार मनाते हैं। नृत्य, गीत-संगीत और सामूहिक उत्सवों के माध्यम से अपनी सांस्कृतिक विरासत को जीवित रखते हैं। उन्होंने इस समृद्ध विरासत को संरक्षित रखने के लिए समाज के लोगों के प्रति आभार व्यक्त किया। राष्ट्रपति ने कहा कि संस्कृति, परंपरा, संविधान और लोकतांत्रिक शासन व्यवस्था का मूल उद्देश्य समाज में सुख-शांति, आनंद और प्रेम बनाए रखना है। इस दृष्टि से आदिवासी समाज की पारंपरिक व्यवस्था अत्यंत सुंदर और उत्कृष्ट है।

राष्ट्रपति श्रीमती मुर्मू ने आदिवासी समाज की पारंपरिक न्याय व्यवस्था का उल्लेख करते हुए कहा कि गांवों में मांझी और अन्य पारंपरिक प्रमुखों की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण रही है। परिवारों के बीच विवाद, जमीन-जायदाद से संबंधित समस्याएं अथवा आपसी मतभेद होने पर लोग मांझी के पास जाते हैं। मांझी गांव के लोगों को एकत्रित कर सभी पक्षों की बात सुनते हैं और आपसी सहमति से समस्याओं का समाधान करने का प्रयास करते हैं। उन्होंने कहा कि आदिवासी समाज में गांव के प्रमुख व्यक्तियों और बुजुर्गों की सहभागिता से सामूहिक निर्णय लेने की समृद्ध परंपरा रही है। इस व्यवस्था में पीड़ परगना और देश परगना जैसी पारंपरिक संस्थाओं का भी विशेष महत्व रहा है। गांव स्तर पर समाधान नहीं होने पर समस्याओं को पीड़ परगना और आवश्यकता पडऩे पर देश परगना के समक्ष रखा जाता था।

राष्ट्रपति ने कहा कि पहले लगभग 50 से 52 गांवों को मिलाकर एक पीड़ की व्यवस्था हुआ करती थी। बड़ी समस्याओं के समाधान के लिए समाज के लोग कई दिनों तक सामूहिक बैठकें करते थे। कभी-कभी सात से आठ दिनों तक लगातार विचार-विमर्श चलता था और समाधान निकलने तक प्रयास जारी रहते थे। यह परंपरा आदिवासी समाज की एकता, सामूहिक जिम्मेदारी और आपसी विश्वास को दर्शाती है।

राष्ट्रपति ने कहा कि आधुनिक न्यायिक व्यवस्था में समस्याओं के समाधान के लिए पुलिस, थाना और न्यायालयों का सहारा लिया जाता है। कई मामलों में न्याय प्राप्त करने की प्रक्रिया लंबी हो जाती है और इसमें समय तथा धन दोनों खर्च होते हैं। उन्होंने कहा कि कुछ विवादों के समाधान में दस-बीस या तीस वर्ष तक लग जाते हैं। उन्होंने आग्रह किया कि जहां संभव हो और कानून के अनुरूप हो, वहां समाज के लोग आपसी बातचीत, सहमति और पारंपरिक सामाजिक व्यवस्था के माध्यम से विवादों का समाधान करने का प्रयास करें। उन्होंने मुरिया दरबार की इस ऐतिहासिक परंपरा को बनाए रखने और आने वाली पीढिय़ों तक पहुंचाने की आवश्यकता बताई।

राष्ट्रपति ने कहा कि वर्तमान लोकतांत्रिक शासन व्यवस्था में कार्यपालिका, न्यायपालिका और विधायिका के अलग-अलग दायित्व हैं, जबकि आदिवासी समाज की पारंपरिक व्यवस्था में मांझी सामाजिक नेतृत्व, विवाद समाधान और सामुदायिक निर्णयों से जुड़ी अनेक जिम्मेदारियों का निर्वहन करते हैं।

आदिवासी समाज की आध्यात्मिकता और सामूहिक आस्था उसकी विशेष पहचान

राष्ट्रपति श्रीमती मुर्मू ने कहा कि आदिवासी समाज की संस्कृति में आध्यात्मिकता, सामूहिकता और प्रकृति के प्रति आस्था का विशेष स्थान है। गांवों में ग्राम देवी-देवताओं की पूजा-अर्चना की प्राचीन परंपरा रही है। समाज के लोग एकजुट होकर गांव की सुख-समृद्धि, खुशहाली, स्वास्थ्य और कल्याण की कामना करते हैं। उन्होंने कहा कि आदिवासी समाज के पर्व-त्यौहार केवल धार्मिक आयोजन नहीं हैं, बल्कि सामाजिक एकता, आपसी सहयोग और सांस्कृतिक पहचान को मजबूत करने के महत्वपूर्ण माध्यम भी हैं। समाज के लोग सामूहिक रूप से नाचते-गाते हैं, उत्सव मनाते हैं और खुशियां बांटते हैं। यही सामूहिकता आदिवासी संस्कृति की सबसे बड़ी शक्ति है।

नक्सलवाद जैसी चुनौतियों से निपटने के लिए सामाजिक एकजुटता जरूरी

राष्ट्रपति ने नक्सलवाद की समस्या का उल्लेख करते हुए समाज के लोगों से एकजुट रहने का आह्वान किया। उन्होंने कहा कि हमें यह समझना होगा कि नक्सलवाद की समस्या कैसे उत्पन्न हुई और इससे समाज के लोग किस प्रकार प्रभावित हुए। उन्होंने आदिवासी समाज के गौरवशाली इतिहास का उल्लेख करते हुए कहा कि अंग्रेजी शासन और राजाओं के समय आदिवासी समाज ने अपने अधिकारों, सम्मान और अस्तित्व की रक्षा के लिए संघर्ष किया था। राष्ट्रपति ने कहा कि समाज के लोगों को दूसरों के बहकावे में आने के बजाय अपने गांव, समाज और अपने भविष्य के संबंध में स्वयं निर्णय लेना चाहिए। यदि कोई बाहरी व्यक्ति समाज में अशांति फैलाने का प्रयास करता है, तो सभी को एकजुट होकर उसका सामना करना चाहिए। उन्होंने कहा कि अकेले कठिन कार्य करना मुश्किल हो सकता है, लेकिन मिल-जुलकर प्रयास करने से बड़ी से बड़ी चुनौती का सामना किया जा सकता है। संगठित और मजबूत समाज को कोई भी बुरी ताकत कमजोर नहीं कर सकती।

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