छत्तीसगढ़

‘मैं खुलकर ग़ुस्सा जताती हूँ, मुझे परवाह नहीं’ महिलाएं अब अपना ग़ुस्सा क्यों नहीं दबा रहीं?

-एलेनोर लॉरी

म्यूज़िक आर्टिस्ट चेस गैलिया पहले अपने ग़ुस्से को दबाकर रखती थीं. उन्हें डर था कि लोग उन्हें हद से ज़्यादा जज़्बाती या साथ काम करने में मुश्किल महिला कहेंगे.

गैलिया कहती हैं कि घर चलाने की हर बात याद रखने और संभालने के मानसिक बोझ से लेकर काम की जगह पर महिलाओं के साथ भेदभाव और इससे भी गंभीर, महिलाओं के ख़िलाफ़ हिंसा तक, हमें एहसास ही नहीं होता कि हम कितना कुछ सह लेते हैं और कितनी बार चुप रह जाते हैं.

लेकिन अब वह अपना ग़ुस्सा खुलकर ज़ाहिर करती हैं. वह कहती हैं, अगर सड़क पर कोई मुझ पर भद्दी टिप्पणी करता है, तो मैं खुलकर ग़ुस्सा जताती हूं. मुझे परवाह नहीं.

34 साल की गैलिया ब्रिटेन की उन महिलाओं में शामिल हैं, जो कहती हैं कि उन्हें अब पहले से कहीं ज़्यादा ग़ुस्सा आता है. ऐसी महिलाओं की संख्या बढ़ रही है.

हर 5 में से एक महिला को पहले से ज़्यादा ग़ुस्सा

साल 2024 में ब्रिटेन की हर पांच में से एक महिला ने कहा कि सर्वे से एक दिन पहले उसने दिन के काफ़ी बड़े हिस्से में ग़ुस्सा महसूस किया था. साल 2020 में हर 10 में से एक महिला ने ऐसा कहा था.

दुनिया भर में करीब दो दशकों से पुरुषों के मुक़ाबले ज़्यादा महिलाएं कहती रही हैं कि उन्हें हर दिन ग़ुस्सा आता है. महिलाओं और पुरुषों के बीच यह अंतर लगातार बढ़ रहा है.

तो क्या महिलाओं को सच में पहले से ज़्यादा ग़ुस्सा आ रहा है? इस बदलाव की वजह क्या है? या अब वे अपने ग़ुस्से के बारे में पहले से ज़्यादा खुलकर बात कर रही हैं?

मनोचिकित्सा विशेषज्ञ जेनिफ़र कॉक्स के मुताबिक़, दोनों बातें कुछ हद तक सही हैं. वह लेखिका हैं और वीमेन आर मैड पॉडकास्ट की होस्ट भी हैं.

उन्होंने ग़ुस्से पर शोध तब शुरू किया, जब उन्हें लगा कि उनकी महिला मरीज़ों की ग़ुस्सा दबाने की आदत उनकी कुछ शारीरिक समस्याओं की वजह हो सकती है.

वह कहती हैं, मेरे पास आने वाली महिलाओं में एक जैसा सिलसिला दिखाई दे रहा था. किसी को माइग्रेन था, किसी को पेट की समस्या थी और किसी को मांसपेशियों, हड्डियों या शरीर की बीमारियों से लड़ने की क्षमता से जुड़ी परेशानी थी. आख़िर में इसे नज़रअंदाज़ करना मुश्किल हो गया.

वे अपने बच्चों को संभालने, अपनी मानसिक सेहत का ध्यान रखने और किसी तरह अपना काम भी करने की कोशिश कर रही थीं.

बाद में कॉक्स ने महिलाओं के साथ समूह में सेशन किए. इन सेशन में कई महिलाओं ने लंबे समय से दबाकर रखा अपना ग़ुस्सा खुलकर ज़ाहिर किया.

वह कहती हैं, हमें बचपन से अच्छी लड़की बनने की यह बेतुकी बात सिखाई गई है. हमारे भीतर यह सोच बैठा दी गई है कि हमें अच्छा, विनम्र, दयालु, समझदार और दूसरों का ख़याल रखने वाला होना चाहिए.

पिछली पीढ़ियों के मुक़ाबले सबसे बड़ा बदलाव यह है कि अब हमसे हर काम करने की उम्मीद की जाती है.

ब्रिटेन के ऑफ़िस फ़ॉर नेशनल स्टैटिस्टिक्स के मुताबिक़, काम करने वाली महिलाओं की संख्या लगभग पुरुषों के बराबर है. इसके बावजूद महिलाएं घर के काम और दूसरों की देखभाल जैसे बिना पैसे वाले कामों में पुरुषों के मुक़ाबले हर दिन करीब एक घंटा ज़्यादा बिताती हैं.

इसके अलावा घर चलाने का मानसिक बोझ भी है. यह ऐसा काम है, जो दिखाई नहीं देता, लेकिन घर को ठीक तरह से चलाने के लिए ज़रूरी होता है. अक्सर इसकी ज़िम्मेदारी भी महिलाओं पर होती है.

सोच कैसे बदल रही है?

मीडिया में अब ग़ुस्से में दिखाई जाने वाली महिलाओं को पहले से ज़्यादा सकारात्मक तरीक़े से पेश किया जा रहा है.

पहले फ़ेटल अट्रैक्शन की एलेक्स फ़ॉरेस्ट जैसे किरदार को अक्सर मानसिक रूप से अस्थिर और ख़तरनाक दिखाया जाता था. इस किरदार को ग्लेन क्लोज़ ने निभाया था. इसी तरह स्टीफ़न किंग की मशहूर हॉरर कहानी कैरी में सिसी स्पेसक के किरदार को भी दिखाया गया था.

लेकिन अब महिलाओं के ग़ुस्से को ऐसी भावना के रूप में दिखाया जा रहा है, जिसकी वजह समझी जा सकती है और जो उन्हें आज़ादी का एहसास भी करा सकती है.

इसका एक उदाहरण लिली एलन का साल 2025 में आया एल्बम वेस्ट एंड गर्ल है. इसमें उन्होंने अभिनेता डेविड हार्बर के साथ अपनी शादी टूटने के बारे में खुलकर बताया.

चार्ली एक्ससीएक्स, ओलिविया रोड्रिगो और चैपल रोआन जैसे कलाकारों ने भी ऐसे गाने जारी किए हैं, जिनमें हिंसा से जुड़ी बातें और ग़ुस्से से भरी चीख़ें तक शामिल हैं.

पर्दे पर भी साल 2023 की बेहद कामयाब फ़िल्म बार्बी में इस मशहूर गुड़िया को अपनी दुनिया से निराशा जताते दिखाया गया. उसकी यह दुनिया बाहर से एकदम सही दिखाई देती है.

कॉक्स कहती हैं कि महिलाओं के ग़ुस्से को इस तरह दिखाया जाना मददगार और स्वस्थ है.

लेकिन असल ज़िंदगी में जब महिलाएं अपने ग़ुस्से के कारण कोई क़दम उठाती हैं, तो उन्हें समाज में इसकी क़ीमत चुकानी पड़ सकती है.

साल 2020 के एक अध्ययन में पाया गया कि काम की जगह पर ग़ुस्सा जताने वाली महिलाओं को ऊंचा पद और ज़्यादा प्रभाव पाने के कम योग्य माना गया. वहीं, ग़ुस्सा जताने वाले पुरुषों के बारे में ऐसी राय नहीं बनाई गई.

तो क्या महिलाएं काम की जगह पर अपना ग़ुस्सा ज़ाहिर करने के बाद भी आगे बढ़ सकती हैं?

लाइफ़ कोच यान डैंग कहती हैं कि ऐसा हो सकता है. वह उन क्षेत्रों में बड़े पदों पर काम करने वाली महिलाओं को प्रशिक्षण देती हैं, जहां पुरुषों की संख्या ज़्यादा है.

उनका कहना है कि जो महिलाएं हमेशा दूसरों को ख़ुश रखने की कोशिश करती हैं और अपनी नाराज़गी नहीं दिखातीं, वे करियर में एक स्तर तक आगे बढ़ सकती हैं. लेकिन सबसे ऊंचे पद तक पहुंचने के लिए उन्हें बने-बनाए तरीक़ों को चुनौती देनी होगी.

वह कहती हैं, जब हमें नियम पता होते हैं, तो महिलाएं उन्हें सीखने में बहुत अच्छी होती हैं. लेकिन कंपनियों की दुनिया के नियम बिल्कुल अलग हैं.

उनके मुताबिक़, यह समझना ज़रूरी है कि अपने ग़ुस्से का इस्तेमाल इस तरह कैसे किया जाए कि वह बनावटी न लगे.

मुझे लगता है कि हम लंबे समय से गुस्से में हैं
लाइफ़ कोच यान डैंग महिलाओं को अपने लिए खड़े होने की आदत डालने की सलाह देती हैं.

डैंग महिलाओं को साफ़ और सीधी भाषा इस्तेमाल करने की सलाह देती हैं. जैसे, इसके लिए मेरा जवाब साफ़ तौर पर नहीं है, मुझे यह पसंद नहीं है और मैं भी निराश हूं.

वह महिलाओं से अपने लिए खड़े होने की आदत डालने को भी कहती हैं, भले ही उस समय उनके पास पूरी तरह सोच-समझकर तैयार किया गया जवाब न हो.

रोज़मर्रा के लैंगिक भेदभाव के साथ-साथ पीछा किए जाने, परेशान किए जाने और घरेलू हिंसा जैसे लगातार बने रहने वाले ख़तरे भी महिलाओं को ग़ुस्से और विरोध में एकजुट करने की बड़ी वजह हैं.

इंग्लैंड और वेल्स में दर्ज किए गए कुल अपराधों में लगभग 20 फ़ीसदी अपराध महिलाओं और लड़कियों के ख़िलाफ़ हिंसा से जुड़े हैं. इसके बावजूद ऐसे बहुत से अपराधों की शिकायत दर्ज नहीं होती.

गैलिया के मुताबिक़, संगीत की दुनिया में महिलाओं के प्रति नफ़रत से जुड़े अपने अनुभव और अपने साथ हुए यौन हमले के बारे में दूसरी महिलाओं से खुलकर बात करने के बाद वह अपनी निराशा को ज़्यादा साफ़ तौर पर समझ पाई हैं.

वह कहती हैं, मुझे लगता है कि हम लंबे समय से ग़ुस्से में हैं. लेकिन अब सोशल मीडिया की वजह से हम दूसरी महिलाओं तक पहुंच सकते हैं.

ग़ुस्से का सही इस्तेमाल
फ़ेटल अट्रैक्शन में ग्लेन क्लोज़ का निभाया एलेक्स फ़ॉरेस्ट जैसा किरदार अक्सर मानसिक रूप से अस्थिर और ख़तरनाक दिखाया जाता था.

मनोवैज्ञानिक डॉक्टर तारा ब्रैक भी मानती हैं कि ग़ुस्से की अपनी जगह है.

वह कहती हैं, सबसे अहम बात यह है कि जब हमें ग़ुस्सा आता है, तो उसके पीछे कोई ऐसी बात होती है जिसकी हमें परवाह होती है. ग़ुस्सा हमें कुछ बताता है. यह हमें अपनी रक्षा करने, अन्याय के ख़िलाफ़ खड़े होने, अपनी सीमाएं तय करने और बदलाव लाने की ताक़त देता है.

लेकिन जब ग़ुस्सा हम पर हावी हो जाता है या हम इसके कारण किसी को नुक़सान पहुंचाने वाला काम करते हैं, तो यह हमारे लिए ठीक नहीं रहता.

ग़ुस्से का सही इस्तेमाल करने के लिए ब्रैक अपने मन और भावनाओं पर ध्यान देने की सलाह देती हैं.

वह ख़ास तौर पर रेन तरीक़ा अपनाने को कहती हैं. इसमें अपनी भावना को पहचानना, ख़ुद को उसे महसूस करने देना, उसके पीछे की वजह समझना और अपने भीतर समझ का भाव बढ़ाना शामिल है.

बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.(bbc.com/hindi)

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