छत्तीसगढ़

साड़ी में नंगे पैर नौकरी की ट्रायल दौड़ पूरी करने वाली कविता महतो को जानिए

-मोहम्मद सरताज आलम

नंगे पैर साड़ी में एक ग्रामीण महिला के दौड़ने का वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हुआ.

पहली नज़र में किसी फ़िल्म का दृश्य लगने वाला ये वीडियो झारखंड की कविता महतो का है. वह रामगढ़ ज़िले के सिद्धो-कान्हू मैदान में दौड़ी थीं.

यह होमगार्ड भर्ती के लिए आयोजित 16 सौ मीटर दौड़ के फ़्री ट्रायल के दौरान का वीडियो है. इसे देखने के बाद कविता महतो की जमकर तारीफ़ हो रही है. वह एक गृहणी हैं और उनके पति की मौत हो चुकी है.

मॉडर्न स्पोर्ट्स शूज़, ट्रैक सूट और पेशेवर ट्रेनिंग किट के बिना 1600 मीटर की यह दौड़ कविता देवी ने साड़ी पहनकर और नंगे पैर ही पूरी कर ली.

पहली बार दौड़ में लिया हिस्सा

झारखंड के रामगढ़ ज़िले में आगामी 24 अक्तूबर से पाँच नवंबर के बीच होमगार्ड के 284 पदों पर भर्ती की प्रक्रिया प्रस्तावित है.

नियमानुसार इसमें महिलाओं के लिए 50 प्रतिशत पद आरक्षित हैं.

इसके अलावा, जिनके पति की मौत हो चुकी है और तलाक़शुदा महिलाओं के लिए भी पाँच प्रतिशत का अतिरिक्त आरक्षण है. इस भर्ती प्रक्रिया में बड़ी संख्या में महिलाओं के शामिल होने की उम्मीद है.

ऐसे में मुख्य भर्ती प्रक्रिया से पहले, अभ्यर्थियों की तैयारी को परखने और उन्हें अभ्यास का मौक़ा देने के लिए रामगढ़ के स्थानीय मैदान में 1600 मीटर की ट्रायल दौड़ का आयोजन किया गया.

नियमों के मुताबिक़, महिला अभ्यर्थियों के लिए 1600 मीटर की दूरी तय करने के लिए 10 मिनट का समय निर्धारित किया गया.

इस ट्रायल में चार अक्तूबर को हिस्सा लेने कविता देवी भी पहुंची थीं.

यह ट्रायल कविता महतो के जीवन का पहला अवसर था, जब वह सोसो गांव से सोलह किलोमीटर दूर मैदान में दौड़ने उतरी थीं.

उन्होंने किसी पेशेवर धाविका की तरह नहीं, बल्कि एक आम ग्रामीण गृहणी की वेशभूषा में साड़ी पहनकर नंगे पांव ही दौड़ना शुरू कर दिया.

उन्होंने इस कठिन चुनौती को लगभग नौ मिनट में ही पूरा कर दिखाया.

इस प्रदर्शन पर ट्रायल का आयोजन करने वाले ट्रेनर अंकित अग्रवाल कहते हैं संसाधनहीनता कभी भी सपनों के आड़े नहीं आ सकती, कविता ने यही साबित किया है.

कविता ने बीबीसी न्यूज़ हिन्दी से कहा कि दौड़ते समय उनके ज़हन में यह चल रहा था कि तय समय पर वह 16 सौ मीटर की दूरी तय कर पाएंगी या नहीं.

वह कहती हैं, लेकिन जब मैं आगे निकली तो कुछ दीदी पीछे छूट गईं, ऐसे में हौसला बढ़ा और मैंने प्रयास तेज़ कर दिया और मुझे ये सफलता मिल गई.

सास और देवरानी ने दौड़ का हौसला दिया

मैदान में दौड़ती कविता के क़दम जितने तेज़ थे, उनकी ज़िंदगी का सफ़र उतना ही संघर्षों से भरा रहा है. पाँच साल की लंबी बीमारी के बाद कविता के पति की मौत साल 2023 में हो गई.

कविता बताती हैं कि मौत के पांच साल पहले पति को लिवर में परेशानी हुई मगर फिर इलाज पर ध्यान नहीं दिया और उनकी तबीयत बिगड़ती चली गई. वे गुजरात की एक फ़ैक्ट्री में सुपरवाइज़र थे.

कविता 12वीं तक पढ़ी हैं. उनकी उम्र 31 साल है.

उनके पति की मौत के बाद परिवार की ज़िम्मेदारी उनके देवर संभाल रहे थे, मगर देवर की भी दो साल बाद 2025 में लंबी बीमारी के बाद मौत हो गई.

कविता के 13 साल की एक बेटी और 11 साल का एक बेटा है. वे सोसो गांव में अपने बुज़ुर्ग सास-ससुर के साथ रहती हैं.

जबकि उनकी देवरानी सरिता रामगढ़ स्थित अपने मायके में रहकर मज़दूरी करती हैं.

उन्हें वहीं पर होम गार्ड की इस नौकरी के बारे में पता लगा. तब उन्होंने दौड़ की तैयारी शुरू की और अपनी जेठानी कविता को भी ये फॉर्म भरने को कहा.

सास ससुर और देवरानी की कोशिशों के बाद कविता देवी ने ऑनलाइन होमगार्ड का फॉर्म भरा.

कविता कहती हैं कि गांव के लोगों ने आवासीय और जाति प्रमाण पत्र बनवा दिए. जिससे मुझे हौसला मिला और मैंने ख़ुद ही शारीरिक परीक्षा की तैयारी के लिए गांव के बाहर सुबह चार बजे दौड़ना शुरू कर दिया.

पति की मौत के बाद संघर्ष का दौर

कविता की सास फुलको देवी कहती हैं कि संपत्ति के नाम पर बस यही दो कमरों का घर है, जिसे उनके दोनों बेटों ने अपनी शादी से पहले गुजरात में कमाई करके बनवाया था.

फुलको देवी से सहमत उनके पड़ोसी सचिन कुमार का मानना है कि जो भी जमापूंजी फुलको देवी के बेटों ने काम कर बनाई थी, दोनों की लंबी बीमारी के इलाज में ख़त्म हो गई.

वह कहते हैं कि ऐसे में परिवार की आर्थिक स्थिति बेहद दयनीय है, पहले परिवार ठीक स्थिति में था. अब इस परिवार पर क़र्ज़ का बोझ भी है.

विधवा और वृद्धा पेंशन पर निर्भर इस परिवार के लिए कमाने की ज़िम्मेदारी अब कविता के ऊपर है.

कविता कहती हैं कि घर चलाने के लिए हम गाय का दूध बेचने के अलावा अपने गांव में धान, मकई, मूंगफली के खेतों में मज़दूरी करते हैं.

गर्मियों में ईंट के भट्ठे में भी काम मिल जाता है.

कविता की सास फुलको देवी ने कहा खेत तो ज़्यादा नहीं है. उससे गुज़ारा नहीं हो सकता. बहू कविता ही हमारे बुढ़ापे की सहारा है.

फुलको कहती हैं, मेरी दोनों बहू विधवा हैं, ऐसे में दोनों होमगार्ड की नौकरी से जुड़ जाएं तो मेरे पोता-पोती की बेहतर परवरिश के साथ हमारा बुढ़ापा भी आराम से गुज़रेगा.

कविता कहती हैं, किसी ज़रूरी काम से बाहर जाना हो, रिश्तेदारी में शादी हो या किसी के यहां कोई दुखद घटना हो जाए तो परिवार की तरफ़ से मुझे ही जाना पड़ता है.

नौकरी की तैयारी के लिए गांव में दौड़ शुरू की

मुख्य दौड़ से पहले इसका ट्रायल आयोजित कराने वाले ट्रेनर अंकित अग्रवाल ने कविता को अब फ़्री ट्रायल देना शुरू कर दिया है. वे अन्य महिला अभ्यार्थियों को भी यह मदद दे रहे हैं.

उन्होंने कविता की प्रतिभा को ट्रायल दौड़ के दौरान देखा था.

हालांकि इस ट्रेनिंग के लिए पहुंचना भी कविता के लिए आसान नहीं है. वह बताती हैं कि हर दिन सुबह जल्दी उठकर भूखे पेट ही वे लगभग 16 किलोमीटर का सफ़र तय करके रामगढ़ स्थित मैदान पहुंचती हैं.

जहां अन्य महिला अभ्यर्थियों के साथ वह दस बजे तक अभ्यास करने के बाद वापस अपने गांव सोसो जाती हैं.

कविता ने बताया कि ट्रायल रन वाले दिन भी वह भूखे पेट ही मैदान में दौड़ी थीं.

वह कहती हैं कि मुझे बिल्कुल अंदाज़ा नहीं था कि मैं 1600 मीटर की दौड़ पूरी कर पाऊंगी. लेकिन ईश्वर की कृपा हुई और वीडियो वायरल होने के बाद मुझे मुफ़्त सिखाने वाले ट्रेनर मिल गए.

कविता की दौड़ का वीडियो वायरल होने के बाद ट्रेनर ने उन्हें रनिंग के लिए ट्रैक सूट और जूते भी उपबल्ध करवाए हैं.

लेकिन दौड़ का वीडियो वायरल होने के बाद होने वाली चर्चा से कविता असहज भी हैं. कविता को इस बात की चिंता है कि भविष्य में अगर वे असफल हुईं तो लोग क्या कहेंगे.

कविता कहती हैं, वीडियो वायरल होने के बाद हमको बहुत अजीब सा महसूस हो रहा है. हम यही सोच रहे हैं कि 25 अक्तूबर की दौड़ में अगर हम सफल नहीं हुए तो मेरे गांव के लोग मेरा मज़ाक उड़ाएंगे, यह सोच कर हम डर जाते हैं.

बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.(bbc.com/hindi)

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