दिवंगत कर्मचारी की दोनों पत्नियों को कानूनी दर्जा नहीं, पर तीनों बच्चों को मिलेगी बराबर संपत्ति

छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट का अहम फैसला
छत्तीसगढ़ संवाददाता
बिलासपुर, 15 अक्टूबर।छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने राजनांदगांव के दिवंगत सरकारी कर्मचारी सुखीदास कुर्रे की संपत्ति को लेकर चल रहे विवाद में अहम फैसला सुनाया है। कोर्ट ने कहा कि सुखीदास की मौत के समय दोनों में से किसी भी महिला को उनकी कानूनी पत्नी नहीं माना जा सकता। हालांकि, दोनों महिलाओं से जन्मे उनके तीनों बच्चों को अचल संपत्ति में बराबर हिस्सा मिलेगा। वहीं, करीब 17 लाख रुपये के वेतन, पेंशन, जीपीएफ और ग्रेच्युटी जैसे सेवा संबंधी बकाये के लिए उत्तराधिकार प्रमाणपत्र लेना होगा।
13 अक्टूबर को जस्टिस पार्थ प्रतिम साहू और जस्टिस सुषमा सावंत की डिवीजन बेंच ने दोनों महिलाओं की याचिकाओं का निपटारा करते हुए निचली अदालत के फैसले में बदलाव किया।
पशु चिकित्सा विभाग में असिस्टेंट फील्ड ऑफिसर रहे सुखीदास कुर्रे की 12 अगस्त 2015 को मौत हो गई थी। उनकी पहली पत्नी शोभा साहू से बेटा अविनाश और अशोक लता कुर्रे से बेटियां लक्ष्मी तथा बेबी उर्फ दीपिका हैं। तीनों के बीच संपत्ति और सेवा संबंधी लाभों पर अधिकार को लेकर विवाद था।
अशोक लता और उनकी बेटियों का कहना था कि शोभा ने 10 जुलाई 2000 को आपसी सहमति से अलग होने का समझौता किया था और बाद में अरुण साहू से शादी कर ली थी। दूसरी ओर, शोभा ने पहली शादी के कानूनी रूप से खत्म होने पर सवाल उठाया। उन्होंने यह भी कहा कि अशोक लता का अपने पहले पति धनेश कोसले से तलाक नहीं हुआ था।
हाईकोर्ट ने पाया कि सुखीदास के सर्विस रिकॉर्ड में शोभा के पति के रूप में अरुण साहू का नाम दर्ज था। सर्विस बुक में अरुण की तस्वीर भी थी और सेवा संबंधी लाभों के लिए उन्हें नॉमिनी बनाया गया था। कोर्ट ने इन तथ्यों को महत्वपूर्ण माना।
वहीं, अशोक लता ने स्वीकार किया कि उनके पहले पति से कानूनी तलाक नहीं हुआ था। ऐसे में सुखीदास से उनकी शादी को वैध नहीं माना जा सकता। अदालत ने परिस्थितियों और दस्तावेजों के आधार पर कहा कि सुखीदास की मौत के समय दोनों में से कोई भी उनकी कानूनी पत्नी होने का दर्जा नहीं रखती थी।
अदालत ने स्पष्ट किया कि तीनों बच्चे सुखीदास की संतान हैं और इस तथ्य पर किसी पक्ष को आपत्ति नहीं है। इसलिए उनकी वैवाहिक स्थिति को लेकर विवाद का बच्चों के संपत्ति अधिकार पर असर नहीं पड़ेगा।
कोर्ट ने जमीन और मकान सहित अचल संपत्ति में अविनाश, लक्ष्मी और बेबी उर्फ दीपिका को बराबर हिस्सा देने का फैसला बरकरार रखा। दोनों महिलाओं की ओर से पूरी संपत्ति पर एकाधिकार के दावे स्वीकार नहीं किए गए।
वेतन, पेंशन, जीपीएफ, ग्रेच्युटी और अन्य सेवा लाभों के करीब 17 लाख रुपये के भुगतान के मामले में कोर्ट ने अलग कानूनी प्रक्रिया अपनाने को कहा। केवल संपत्ति में हिस्सेदारी घोषित हो जाने से इन रकमों पर भुगतान का अधिकार अपने आप साबित नहीं होगा। इसके लिए सक्षम अदालत से उत्तराधिकार प्रमाणपत्र लेना होगा और निर्धारित कोर्ट फीस जमा करनी होगी।
इसी आधार पर हाईकोर्ट ने सेवा संबंधी बकाये पर अधिकार घोषित करने वाले निचली अदालत के आदेश को निरस्त कर दिया।



