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25 साल पहले विमान हादसे में मारे गए माधवराव सिंधिया: ग्वालियर के महाराजा से कांग्रेस के संभावित प्रधानमंत्री चेहरे तक का सफर

30 सितंबर 2001 को उत्तर प्रदेश के मैनपुरी जिले के मोटा गांव के पास एक निजी विमान दुर्घटनाग्रस्त हो गया। उस विमान में सवार पूर्व केंद्रीय मंत्री और कांग्रेस नेता माधवराव सिंधिया सहित सभी आठ लोगों की मौत हो गई। वे कानपुर में पार्टी की रैली को संबोधित करने जा रहे थे। उस समय उनकी उम्र 56 वर्ष थी।

यह हादसा कांग्रेस के उस नेता का राजनीतिक करियर समय से पहले खत्म कर गया, जिन्हें 1990 के दशक के अंत में प्रधानमंत्री पद के संभावित दावेदारों में गिना जाता था। खासकर 1999 लोकसभा चुनाव से पहले सोनिया गांधी के विदेशी मूल को लेकर उठे विवाद के बाद उनकी भूमिका और बढ़ गई थी।

शाही परिवार से चुनावी राजनीति तक

माधवराव सिंधिया का जन्म 10 मार्च 1945 को ग्वालियर के पूर्व शासक परिवार में हुआ था। वे ग्वालियर के अंतिम महाराजा जीवाजीराव सिंधिया और राजमाता विजयाराजे सिंधिया के पुत्र थे। उन्होंने ग्वालियर के सिंधिया स्कूल और बाद में ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय से शिक्षा प्राप्त की।

शाही पृष्ठभूमि के बावजूद उन्होंने युवा उम्र में चुनावी राजनीति चुनी। 1971 में महज 26 वर्ष की आयु में उन्होंने गुना लोकसभा सीट से चुनाव लड़ा और जीते। उस समय वे जनसंघ के समर्थन वाले स्वतंत्र उम्मीदवार थे। इसके बाद उन्होंने लगातार नौ बार लोकसभा चुनाव जीता और अपने पूरे राजनीतिक जीवन में कोई चुनाव नहीं हारे।

1977 में वे ग्वालियर से स्वतंत्र उम्मीदवार के रूप में फिर जीते। 1980 के आसपास वे भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस में शामिल हो गए, जबकि उनकी मां विजयाराजे सिंधिया जनसंघ और बाद में भाजपा से जुड़ी रहीं। परिवार के अंदर यह राजनीतिक विभाजन लंबे समय तक चर्चा का विषय बना रहा।

1984 में अटल बिहारी वाजपेयी को हराना

माधवराव सिंधिया की चुनावी राजनीति का सबसे चर्चित अध्याय 1984 का लोकसभा चुनाव रहा। उस चुनाव में कांग्रेस ने अंतिम समय में उन्हें ग्वालियर सीट से उम्मीदवार बनाया। भाजपा के अटल बिहारी वाजपेयी उसी सीट से चुनाव लड़ रहे थे। माधवराव सिंधिया ने वाजपेयी को करीब 1.75 लाख वोटों के अंतर से हराया। यह वाजपेयी की लोकसभा चुनाव में एकमात्र हार मानी जाती है।

इसके बाद सिंधिया ग्वालियर या गुना से चुनाव लड़ते रहे और हर बार जीतते रहे। 1999 के चुनाव में वे गुना से कांग्रेस के उम्मीदवार के रूप में जीते और लोकसभा में कांग्रेस के उपनेता बने।

मंत्रालय और कांग्रेस में बढ़ती भूमिका

1984 के चुनाव के बाद राजीव गांधी सरकार में उन्हें रेल मंत्रालय मिला। पहले राज्य मंत्री और फिर स्वतंत्र प्रभार के रूप में उन्होंने रेलवे के आधुनिकीकरण और कंप्यूटरीकरण की दिशा में काम किया। शताब्दी एक्सप्रेस जैसी तेज ट्रेनों की शुरुआत उनके कार्यकाल से जुड़ी मानी जाती है।

पी. वी. नरसिम्हा राव सरकार में वे नागरिक उड्डयन एवं पर्यटन मंत्री बने। एक विमान हादसे के बाद उन्होंने नैतिक जिम्मेदारी लेते हुए इस्तीफा दे दिया। 1995 में उन्हें मानव संसाधन विकास मंत्री बनाया गया।

1996 में हवाला मामले के बाद कांग्रेस ने उन्हें टिकट नहीं दिया। तब उन्होंने मध्य प्रदेश विकास कांग्रेस बनाई और ग्वालियर से चुनाव जीत गए। 1998 में वे कांग्रेस में वापस लौटे। सोनिया गांधी के कांग्रेस अध्यक्ष बनने के बाद वे उनके करीबी और संसदीय राजनीति में भरोसेमंद सहयोगी माने जाने लगे।

विमान दुर्घटना और उसके बाद

30 सितंबर 2001 को दिल्ली से कानपुर जा रहा दस सीटर बीचक्राफ्ट किंग एयर सी-90 विमान खराब मौसम में मैनपुरी के पास दुर्घटनाग्रस्त हो गया। विमान में माधवराव सिंधिया के अलावा उनके निजी सचिव, चार पत्रकार और दो पायलट सवार थे। सभी की मौत हो गई।

शवों की पहचान मुश्किल थी। परिवार ने उनके गले में पहने दुर्गा माता के लocket से उनकी पहचान की। तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने विशेष भारतीय वायुसेना के विमान से शव दिल्ली मंगवाए।

उनकी मृत्यु के बाद गुना सीट खाली हुई। 2002 के उपचुनाव में उनके पुत्र ज्योतिरादित्य सिंधिया ने कांग्रेस के टिकट पर यह सीट जीती।

माधवराव सिंधिया की मृत्यु कांग्रेस के लिए एक बड़ी क्षति मानी गई। शाही परिवार से निकलकर चुनावी राजनीति में अपनी अलग पहचान बनाने वाले इस नेता का सफर विमान दुर्घटना के साथ अधूरा रह गया।

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