‘छत्तीसगढ़’ का संपादकीय : बालभारती से संसद तक, मर्दाना सोच को बलात्कारी बनाने की भरी-पूरी संस्कृति
एक कॉलेज छात्रा के पीछे पड़े हुए एक नौजवान को जब निराशा हुई, तो उसने अपने एक दोस्त की मदद ली, और इस युवती पर तेजाब फिंकवा दिया। अब गंभीर जख्मों के साथ, आंख खो जाने का खतरा उठाते हुए यह युवती अस्पताल में है, और तेजाब फेंकने वाले, फिंकवाने वाले दोनों लोग गिरफ्तार हो चुके हैं। एक ही दिन पहले की बात है कि इसी छत्तीसगढ़ में एक दूसरे शहर में 16 बरस की एक छात्रा ने खुदकुशी कर ली क्योंकि एक नौजवान लगातार उसके पीछे लगा हुआ था, फोन पर उसे परेशान करता था, उसके घर भी पहुंच जाता था, और आते-जाते रास्ते में उसका पीछा करता था। दो दिनों के भीतर की ये दो घटनाएं अनोखी नहीं हैं, देश भर में जगह-जगह हर दिन ऐसी घटनाएं सामने आती हैं, और अधिकतर घटनाएं तो इसलिए सामने नहीं आ पातीं कि लडक़ी और उसका परिवार कमजोर तबके के रहते हैं, सामाजिक बदनामी से डरे हुए रहते हैं, या फिर उनके सामने ऐसी मिसालें रहती हैं कि गुंडे-मवाली गिरफ्तारी के बाद जब जेल से लौटकर आते हैं, तो गाजे-बाजे के साथ उनका जुलूस निकलता है, और वे लडक़ी पर दुबारा बलात्कार करने का हौसला भी रखते हैं। देश में कई प्रदेशों में ऐसी मिसालें सामने आ चुकी हैं कि बलात्कार की शिकायत के बाद भी मुजरिमों का कुछ नहीं बिगड़ता, और थाने के चक्कर लगाते हुए लडक़ी या महिला ही खुदकुशी तक पहुंच जाती हैं।
कहने के लिए तो सुप्रीम कोर्ट ने अभी राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र में बलात्कार, और सामूहिक बलात्कार की कुछ घटनाओं पर फिक्र जाहिर करते हुए कहा है कि आधी रात को भी सार्वजनिक जगह पर लडक़ी सुरक्षित महसूस करे, ऐसी व्यवस्था रहनी चाहिए। लेकिन छत्तीसगढ़ के बालोद में जहां लडक़ी पर राह चलते दिनदहाड़े तेजाब फेंक दिया गया, वहां तो शहर और आबादी के बीच ऐसा हुआ, और यह लडक़ी एक पुलिस कर्मचारी की बेटी भी थी। मतलब यह कि मवालियों को इस बात की भी परवाह नहीं थी कि वे एक स्थानीय पुलिस कर्मचारी या अधिकारी की बेटी पर ऐसा हमला कर रहे हैं, और देश में एसिड-अटैक करने वाले लोगों के खिलाफ अदालत भी बहुत सख्त रूख रखती है। एकतरफा मोहब्बत में जाने कितनी ही लड़कियों की हत्या होती है, और तो और किसी शादीशुदा महिला से भी एकतरफा मोहब्बत का दावा करने वाले लोग उसका कत्ल कर चुके हैं। भारतीय समाज कहने के लिए अपने आपको श्रंृगार रस की परंपरा का समाज मानता है, लेकिन यहां पर प्रेम का मतलब इस रफ्तार से हिंसा में बदल जाता है कि श्रृंगार रस के कवि लिखना भूल जाएं।
भारतीय समाज में इन दिनों लड़कियां और महिलाएं लगातार इस बात को सोशल मीडिया पर, और फुटपाथी पोस्टरों में लिख रही हैं कि किस तरह वे अब लडक़ों और मर्दों की ज्यादतियों को बर्दाश्त नहीं करने वाली हैं। वे गाली-गलौज की जुबान तक भी जाकर अपनी हिकारत को उजागर कर रही हैं, और इसमें कुछ भी अटपटा नहीं हैं। हिन्दुस्तानी लडक़े और मर्द, एक तबके के रूप में हिंसक, महिलाविरोधी, और यौन कुंठाग्रस्त भीड़ साबित हो चुके हैं। सोशल मीडिया पर उनकी जुबान हिंसक और बलात्कारी गालियों से भरी रहती है, और उनकी हरकतें बेकाबू रहती हैं, फिर वे चाहे दर्जनों कैमरों के सामने पुलिस की वर्दी में ही क्यों न हों, जो कि दिल्ली में अभी सामने आया है। यह पूरा सिलसिला भारत को एक महिलाविरोधी संस्कृति से भरा हुआ साबित करता है जिसमें भारतमाता और देवियों के प्रतीकों का तो सम्मान किया जाता है, लेकिन जैसे ही यह भारतमाता या देवी जिंदा होकर किसी भी तरह के हक मांगने लगती हैं, उनको कुचलना शुरू हो जाता है। हिन्दुस्तानी मर्दों का बर्दाश्त तस्वीरों, और प्रतिमाओं में तो लड़कियों-महिलाओं को झेल लेता है, लेकिन उसके आगे तो फिर उसके दांत-नाखून बड़े होने लगते हैं, और उसे गुफाकाल की वे काल्पनिक तस्वीरें याद आने लगती हैं जिनमें मर्द अपने बाहुबल से किसी महिला को उसके बाल पकडक़र घसीटकर ले जाते हुए दिखाए जाते थे। दुनिया 21वीं सदी के दूसरे चौथाई हिस्से में पहुंच गई है, लेकिन हिन्दुस्तानी मर्द की सोच अब तक गुफा से नहीं निकल पाई है।
समाज को यह सोचना होगा कि मर्द जिस परवरिश से होकर ऐसी सोच तक पहुंचे रहते हैं, उस परवरिश में क्या-क्या गलत है। हम शायद इस कॉलम में दर्जनभर बार पहले भी लिख चुके हैं कि अभी कुछ बरस पहले तक हिन्दी की प्राथमिक शिक्षा की बालभारती में यह लिखा रहता था कि अमर घर चल, कमला नल पर जल भर। जहां पर सोच बचपन से ही लडक़े-लड़कियों के बीच इस किस्म के भेदभाव की रहती है, वहां बड़े होकर लडक़े जब मर्द बनते हैं, तो उन्हें लड़कियां, और महिलाएं मातहत से अधिक दर्जे की नहीं लगती हैं। वे ना सुनने के आदी नहीं रहते हैं। चाहे साथ में पढऩे वाली लडक़ी हो, काम की जगह पर सहकर्मी हो, परिवार में रिश्तेदार हो, या घरेलू कामगार हो, किसी लडक़ी या महिला के पास मनाही के हक की बात भी मर्दों की सोच में नहीं घुस पाती है। वे जहां चाहे वहां हाथ डालने को अपना हक मानकर चलते हैं, फिर चाहे वे पुलिस की वर्दी में ही क्यों न हों, और लड़कियां या महिलाएं आंदोलनकारी हों, या पत्रकार हों। फिर गलत परवरिश से बनी हिंसक सोच को आगे बढ़ाने का काम हिन्दुस्तान में सोशल मीडिया पर लगातार हिंसा की बातें लिखने वालों ने अपने जिम्मे ले लिया है। जिस लडक़ी से पुलिस बदसलूकी करती है, उसके बारे में सोशल मीडिया पोस्ट पर सौ-सौ लोग खुलकर यह लिखते हैं कि वह इसी बात के लिए तो वहां गई थी, और वे उसके साथ ज्यादती की कल्पना को बलात्कार तक ले जाते हैं। जब देश का कानून, उसे लागू करने की जिम्मेदार सरकारें, इनमें से किसी को भी यह परवाह नहीं रहती कि लोग सोशल मीडिया पर अपने नाम, अपने चेहरे, अपने धर्म की तस्वीरों के साथ इस तरह की हिंसक बातें लिख रहे हैं, तब फिर ऐसे जुर्म से किसी को परहेज नहीं रह जाता। आज हिन्दुस्तान में मर्दों की सोच बलात्कारी होने के पीछे एक बड़ी वजह यह भी है कि वे सोशल मीडिया पर खुलेआम, साइबर-सुबूत छोड़ते हुए भी सौ-सौ लोगों को हजार-हजार बार बलात्कार की धमकी दे सकते हैं, और देश का कानून उनका कुछ भी नहीं बिगाड़ सकता। जब कानून को बनाकर फाइलों और किताबों में कैद छोड़ दिया जाता है, तो उसका कोई अच्छा असर होने के बजाय उसका नुकसान बहुत बड़ा होता है। अमल न होने वाले कागजी कानून के मुकाबले तो कानून न होना बेहतर होता है। जिस तरह डॉक्टरी इलाज में एंटीबायोटिक की आधी-अधूरी खुराक से फायदा कुछ नहीं होता, बल्कि बदन में उसके खिलाफ प्रतिरोधक शक्ति विकसित हो जाती है, उसी तरह अमल से परे रखे गए कानूनों से कानून के खिलाफ हिकारत बढ़ती चलती है।
