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सिंधु जल संधि पर पाकिस्तान की गलतफहमी दूर हो चुकी है, पूर्व अधिकारी बोले—80 प्रतिशत पानी के बावजूद सिर्फ नकारात्मक फायदा उठाया

नई दिल्ली। सिंधु जल संधि पर काम कर चुके भारतीय अधिकारियों का कहना है कि पाकिस्तान दशकों से इस समझौते को लेकर गलतफहमी फैलाता रहा, जबकि संधि के आंकड़े और प्रावधान साफ हैं। उनके मुताबिक, पाकिस्तान को सिंधु प्रणाली का करीब 80 प्रतिशत पानी मिला, फिर भी उसने भारत की सीमित परियोजनाओं पर लगातार आपत्तियां लगाकर समझौते का सिर्फ नकारात्मक फायदा उठाने की कोशिश की। अब जब भारत ने आतंकवाद के मद्देनजर संधि को स्थगित रखा है, तो वही पानी-प्रबंधन की कमजोरियां पाकिस्तान की आने वाली पीढ़ियों पर भारी पड़ सकती हैं।

सिंधु जल संधि 19 सितंबर 1960 को कराची में भारत और पाकिस्तान के बीच हुई थी। विश्व बैंक ने मध्यस्थता की थी। संधि के तहत पूर्वी नदियां—रावी, ब्यास और सतलुज—भारत को मिलीं, जिनका औसत वार्षिक बहाव करीब 33 मिलियन एकड़ फीट (एमएएफ) है। पश्चिमी नदियां—सिंधु, झेलम और चिनाब—पाकिस्तान को मिलीं, जिनका औसत बहाव करीब 135 एमएएफ है। भारत ने पूर्वी नदियों पर निर्भर पाकिस्तानी नहरों के विकल्प के लिए करीब 6.2 करोड़ पाउंड का भुगतान भी किया था।

संधि भारत को पश्चिमी नदियों पर सीमित गैर-उपभोगी इस्तेमाल की इजाजत देती है। इसमें रन-ऑफ-द-रिवर पनबिजली परियोजनाएं और अधिकतम 3.6 एमएएफ भंडारण शामिल है। संधि भारत पर यह दायित्व नहीं डालती कि वह पश्चिमी नदियों का कोई तय मात्रा में पानी पाकिस्तान को पहुंचाए। पानी का बहाव प्राकृतिक प्रवाह और संधि में लिखी सीमाओं के अधीन है।

संधि संभाल चुके अधिकारी क्या कह रहे हैं

सिंधु जल मामलों के पूर्व भारतीय आयुक्त पी. के. सक्सेना ने हाल के विश्लेषण में कहा है कि पाकिस्तान की शिकायत जलविज्ञान से ज्यादा घरेलू राजनीति पर टिकी है। उनके अनुसार, पाकिस्तान को कुल प्रवाह का 80 प्रतिशत से अधिक हिस्सा मिलता है, जबकि कृषि संकट की जड़ पाकिस्तान के अंदर पानी बांटने की कठोर व्यवस्था और खराब प्रबंधन है। रन-ऑफ-द-रिवर बांध पानी को स्थायी रूप से नहीं रोकते। ये नदी की गति से बिजली बनाकर पानी वापस धारा में छोड़ देते हैं, इसलिए शुद्ध मात्रा में नुकसान नहीं होता।

सक्सेना ने यह भी कहा कि भारत ने संधि के तहत पश्चिमी नदियों पर मिले भंडारण का बहुत छोटा हिस्सा ही इस्तेमाल किया है। यानी पाकिस्तान के पास बड़ा हिस्सा होने के बावजूद घरेलू कमी को ऊपरी धारा की परियोजनाओं पर डालना तथ्यों से मेल नहीं खाता। बागलीहार विवाद में न्यूट्रल एक्सपर्ट ने भी भारत के डिजाइन को मोटे तौर पर सही माना था और सिर्फ मामूली बदलाव सुझाए थे।

नकारात्मक इस्तेमाल और आज की स्थिति

भारतीय पक्ष का तर्क है कि पाकिस्तान ने किशनगंगा, रातले और अन्य परियोजनाओं पर बार-बार आपत्ति लगाकर निर्माण रोकने या डिजाइन सीमित करने की कोशिश की, जबकि संधि भारत को ये सीमित अधिकार देती है। इसी दौरान पाकिस्तान ने अपने हिस्से के पानी के भंडारण, नहर दक्षता और प्रांतीय बंटवारे पर पर्याप्त सुधार नहीं किया। विशेषज्ञों के अनुसार, यही दीर्घकालिक नुकसान है, जिसकी कीमत खेती और शहरी आपूर्ति पर आने वाली पीढ़ियां चुकाएंगी।

22 अप्रैल 2025 को पहलगाम आतंकी हमले में 26 लोगों की मौत के अगले दिन भारत ने संधि को स्थगित (abeyance) कर दिया। विदेश सचिव ने कहा था कि यह स्थिति तब तक रहेगी, जब तक पाकिस्तान सीमा पार आतंक के समर्थन से विश्वसनीय और अपरिवर्तनीय रूप से पीछे नहीं हटता। भारत का रुख है कि जब तक आतंक पर लगाम नहीं लगती, संधि पुराने रूप में बहाल नहीं होगी।

31 अगस्त 2026 को हेग की मध्यस्थता अदालत ने सर्वसम्मति से कहा कि संधि लागू बनी हुई है और भारत एकतरफा उसे स्थगित नहीं कर सकता। अदालत ने रातले परियोजना के कुछ निर्माण पर अंतरिम रोक भी लगाई। भारत ने इस पीठ को अवैध रूप से गठित बताकर फैसले को खारिज कर दिया और कार्यवाही में हिस्सा नहीं लिया। भारत का कहना है कि आतंक के मद्देनजर लिया गया फैसला कायम है।

व्यावहारिक असर अभी सीमित है। सितंबर 2026 की रिपोर्टों के अनुसार, स्थगन के 17 महीने बाद भी भारत पश्चिमी नदियों से बड़ा अतिरिक्त पानी नहीं खींच पाया है, क्योंकि बड़े भंडारण अभी बने नहीं हैं। भारतीय मंत्रियों ने भविष्य में पानी के बेहतर इस्तेमाल की बात कही है, जबकि पाकिस्तान किसी भी कटौती को युद्ध का आधार बता रहा है।

संधि पर काम कर चुके लोगों का निष्कर्ष यह है कि गलतफहमी अब आंकड़ों से नहीं टिकती। पाकिस्तान को बड़ा हिस्सा मिला, भारत को सीमित अधिकार मिले, और विवाद का बड़ा हिस्सा आपत्तियों तथा घरेलू कुप्रबंधन से उपजा। आतंक के कारण संधि स्थगित रहने और अपने पानी के बेहतर इस्तेमाल न होने की दोहरी कीमत, विशेषज्ञों के शब्दों में, पाकिस्तान की अगली पीढ़ियों पर पड़ेगी।

राजेश कुमार

उत्तर भारत के एक छोटे शहर में पले-बढ़े। बचपन से ही लोगों की बातें सुनना और आसपास की ज़िंदगी को ध्यान से देखना उनकी आदत रही है। परिवार में सादगी और मेहनत को हमेशा महत्व दिया गया। खाली समय में किताबें पढ़ना, पुरानी डायरियाँ पलटना और सड़क किनारे चाय की दुकान पर बैठकर आम लोगों से बात करना उन्हें अच्छा लगता है। वे मानते हैं कि हर इंसान की अपनी एक कहानी होती है, बस उसे सुनने वाला कोई होना चाहिए।

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