कानून-व्यवस्था पर सवाल, थानों में बार-बार फेरबदल से कैसे सुधरेगी व्यवस्था? डीजीपी और प्रमुख सचिव की कार्यप्रणाली पर उठ रहे सवालों के बीच पुलिस प्रशासन में स्थिरता और जवाबदेही की मांग।
तरुण कौशिक, संपादक सर्वव्यापी
छत्तीसगढ़ में कानून-व्यवस्था और पुलिस प्रशासन की कार्यप्रणाली को लेकर कई सवाल खड़े हो रहे हैं। थानों में थाना प्रभारियों की बार-बार अदला-बदली, कुछ ही महीनों में जिम्मेदारियों में बदलाव और एक ही थाना प्रभारी को बार-बार उसी थाने में पदस्थ किए जाने जैसे मामलों को लेकर पुलिस विभाग की स्थानांतरण एवं पदस्थापना व्यवस्था पर चर्चा जरूरी हो गई है।सवाल यह है कि आखिर पुलिस थानों में स्थिरता के बिना बेहतर कानून-व्यवस्था की अपेक्षा कैसे की जा सकती है? यदि किसी थाना प्रभारी को चार-पांच महीने के भीतर ही बदल दिया जाता है, तो क्या उसे अपने क्षेत्र की आपराधिक गतिविधियों को समझने, अपराधियों के नेटवर्क पर प्रभावी कार्रवाई करने और कानून-व्यवस्था को मजबूत करने के लिए पर्याप्त समय मिल पाता है?बार-बार तबादले, लेकिन व्यवस्था में सुधार कितना?पुलिस प्रशासन में स्थानांतरण एक सामान्य प्रशासनिक प्रक्रिया है। परिस्थितियों, कार्यप्रदर्शन और विभागीय आवश्यकताओं के आधार पर अधिकारियों की पदस्थापना बदलना भी जरूरी हो सकता है। लेकिन यदि तबादलों की प्रक्रिया बार-बार दोहराई जाए और उसके पीछे स्पष्ट प्रशासनिक कारण सामने न आएं, तो पारदर्शिता और निर्णयों की निरंतरता को लेकर सवाल उठना स्वाभाविक है।विशेष रूप से, यदि किसी थाना प्रभारी को हटाने के बाद कुछ समय पश्चात फिर उसी थाने में पदस्थ किया जाता है, तो इस निर्णय के पीछे के कारणों को स्पष्ट किया जाना चाहिए। क्या यह प्रशासनिक आवश्यकता है, अधिकारियों की कमी है या पदस्थापना नीति में किसी प्रकार की विसंगति? इन सवालों का जवाब विभागीय स्तर पर सामने आना चाहिए।डीजीपी और प्रमुख सचिव की भूमिका पर निगाहेंप्रदेश के पुलिस महानिदेशक अरुण कुमार गौतम और विभाग की प्रमुख सचिव निहारिका सिंह बारिक के समक्ष पुलिस प्रशासन में स्थिरता, जवाबदेही और बेहतर समन्वय सुनिश्चित करने की महत्वपूर्ण चुनौती है।ऐसे में सवाल उठता है कि थानों में बार-बार होने वाले फेरबदल की समीक्षा किस स्तर पर की जा रही है? क्या पदस्थापना के निर्णयों का कानून-व्यवस्था पर पड़ने वाले प्रभाव का आकलन किया जा रहा है? क्या यह सुनिश्चित किया जा रहा है कि थाना प्रभारियों की नियुक्ति स्पष्ट मानदंडों और प्रशासनिक जरूरतों के अनुरूप हो?हालांकि, केवल तबादलों की संख्या के आधार पर किसी अधिकारी की कार्यक्षमता या प्रशासनिक विफलता का निष्कर्ष निकालना उचित नहीं होगा। इसके लिए अपराध के आंकड़ों, पुलिस की प्रतिक्रिया, लंबित मामलों, जनशिकायतों और पदस्थापना संबंधी आधिकारिक रिकॉर्ड का परीक्षण भी जरूरी है।पुलिस व्यवस्था में स्थिरता और जवाबदेही जरूरीकानून-व्यवस्था मजबूत करने के लिए केवल अधिकारियों की नियुक्ति और तबादला पर्याप्त नहीं है। जरूरी है कि थाना प्रभारियों को अपने क्षेत्र में अपराध नियंत्रण, अपराधियों के विरुद्ध कार्रवाई, आम नागरिकों की शिकायतों के निराकरण और पुलिसिंग में सुधार के लिए पर्याप्त अवसर मिले।साथ ही, जहां किसी अधिकारी को बार-बार बदला जा रहा है या उसी थाने में दोबारा पदस्थ किया जा रहा है, वहां निर्णय के कारणों की समीक्षा होनी चाहिए। इससे न केवल प्रशासनिक पारदर्शिता बढ़ेगी, बल्कि पुलिस विभाग के भीतर जवाबदेही की व्यवस्था भी मजबूत होगी।अब जवाबदेही तय करने का समयछत्तीसगढ़ की जनता पुलिस प्रशासन से बेहतर सुरक्षा, त्वरित कार्रवाई और निष्पक्ष पुलिसिंग की अपेक्षा करती है। ऐसे में थाना प्रभारियों की बार-बार बदलती पदस्थापना व्यवस्था को लेकर उठ रहे सवालों का जवाब तथ्यों और आधिकारिक आंकड़ों के आधार पर सामने आना चाहिए।सबसे बड़ा सवाल यही है—क्या पुलिस थानों में बार-बार होने वाले फेरबदल के पीछे कोई ठोस प्रशासनिक रणनीति है, और यदि है तो उसका लाभ कानून-व्यवस्था में कितना दिखाई दे रहा है?पुलिस मुख्यालय और संबंधित विभाग के वरिष्ठ अधिकारियों को इस विषय पर स्थिति स्पष्ट करनी चाहिए, ताकि प्रदेश में पुलिस प्रशासन की कार्यप्रणाली को लेकर उठ रही शंकाओं का समाधान हो सके और कानून-व्यवस्था को अधिक प्रभावी बनाने की दिशा में ठोस कदम उठाए जा सकें।
