सवाई मान सिंह द्वितीय: इसरदा के ठाकुरपुत्र से जयपुर के अंतिम शासक महाराजा तक

जयपुर: सवाई मान सिंह द्वितीय का जन्म किसी साधारण किसान या आम नागरिक परिवार में नहीं हुआ था। वे इसरदा ठिकाने के ठाकुर सवाई सिंह के दूसरे पुत्र थे। यह ठिकाना कछवाहा राजपूतों की राजawat शाखा से जुड़ा हुआ था और जयपुर राजघराने से रक्त-संबंध रखता था। फिर भी उनका जीवन राजपूत रीति-रिवाज की उस परंपरा का उदाहरण बना, जिसमें गोद लेना सिंहासन का द्वार खोल सकता है।
21 अगस्त 1912 को राजपूताना एजेंसी के इसरदा ठिकाने में मोर मुकुट सिंह का जन्म हुआ। पिता ठाकुर सवाई सिंह कछवाहा वंश के सामंत थे। माता सुगन कुंवर उत्तर प्रदेश के कोटला गांव से थीं। कुछ प्रचलित आलेखों में जन्मस्थान कोटला बताया जाता है, जो सही नहीं है। कोटला उनकी माता का गांव था; उनका बचपन इसरदा की दीवारों वाले कस्बे में बीता।
गोद लेने की परंपरा और Madho Singh II
उस समय जयपुर के महाराजा सवाई माधो सिंह द्वितीय स्वयं इसी इसरदा परिवार से गोद लिए गए थे। पांच रानियों के बावजूद उनके वैध पुत्र नहीं थे। प्रचलित विवरण के अनुसार एक साधु की चेतावनी के कारण उन्होंने रानियों से उत्तराधिकारी पैदा करने से परहेज किया। उपपत्नियों से कई संतानें थीं, लेकिन गद्दी के लिए वैध वारिस नहीं था।
24 मार्च 1921 को माधो सिंह द्वितीय ने लगभग नौ-दस वर्ष के मोर मुकुट सिंह को गोद लिया। गोद लेने के बाद उनका नाम मान सिंह रखा गया। 7 सितंबर 1922 को माधो सिंह द्वितीय का निधन हुआ और ग्यारह वर्ष की आयु में मान सिंह जयपुर के महाराजा बने। राज्याभिषेक 18 सितंबर 1922 को हुआ। पूर्ण शासकीय अधिकार उन्हें 14 मार्च 1931 को मिले।
शासन, सेना और स्वतंत्र भारत
वे 1922 से 1948 तक जयपुर रियासत के शासक रहे। स्वतंत्रता के बाद रियासत का भारत में विलय हुआ। 1949 से 1956 तक वे राजस्थान के प्रथम राजप्रमुख रहे। बाद में राज्यसभा सदस्य बने और 1965 में भारत के स्पेन स्थित राजदूत नियुक्त हुए।
सैन्य दृष्टि से उन्होंने जयपुर राज्य सेना का आधुनिकीकरण किया। सवाई मान गार्ड्स का गठन इसी क्रम में हुआ। द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान उन्होंने स्वेच्छा से सेवा दी और बाद में लेफ्टिनेंट जनरल तथा मेजर जनरल जैसे पदों से जुड़े रहे।
पोलो, परिवार और निधन
अंतरराष्ट्रीय स्तर पर वे पोलो के बड़े खिलाड़ी माने गए। जयपुर टीम और भारतीय टीम के साथ उनके प्रदर्शन ने खेल को नई पहचान दी।
उनके तीन विवाह हुए। पहली पत्नी जोधपुर की मरुधर कंवर, दूसरी किशोर कंवर और तीसरी कूचबिहार की गायत्री देवी थीं। पुत्रों में भवानी सिंह, जय सिंह, पृथ्वीराज सिंह और जगत सिंह शामिल रहे। भवानी सिंह बाद में जयपुर के उत्तराधिकारी बने।
24 जून 1970 को इंग्लैंड के साइरेनसेस्टर में पोलो खेलते समय घोड़े से गिरने के बाद उसी दिन उनका निधन हो गया। उस समय उनकी आयु 57 वर्ष थी।
तथ्य और प्रचलित दावे
“साधारण परिवार में जन्म” वाला वाक्य अधूरा और भ्रामक है। वे आम परिवार के नहीं, छोटे लेकिन शाही संबंध रखने वाले ठिकाने के ठाकुरपुत्र थे। किस्मत का मोड़ गोद लेने की राजपूत परंपरा और माधो सिंह द्वितीय के वैध उत्तराधिकारी न होने से आया। जन्मस्थान इसरदा था, कोटला नहीं। जन्म तिथि के कुछ स्रोत 1911 लिखते हैं, किंतु अधिकांश प्रामाणिक विवरण 21 अगस्त 1912 देते हैं।
जयपुर एयरपोर्ट, सवाई मान सिंह अस्पताल, स्टेडियम और अन्य सार्वजनिक निर्माण उनके शासनकाल व प्रभाव से जुड़े माने जाते हैं। स्वतंत्र भारत में भी वे महाराजा की उपाधि, प्रिवी पर्स और कुछ विशेषाधिकार के साथ जीवन के अंत तक जुड़े रहे।



